चर्चा में क्यों ?
नवीकरणीय ऊर्जा की गिरती कीमतें और तकनीक में सुधार ने इसे न केवल पर्यावरण के लिए, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी सबसे बेहतर विकल्प बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि जीवाश्म ईंधन को छोड़कर स्वच्छ ऊर्जा अपनाना आगामी दशकों में खरबों डॉलर की बचत कर सकता है।

'लर्निंग कर्व' और गिरती कीमतें
स्वच्छ ऊर्जा के सस्ता होने के पीछे मुख्य कारण "राइट का नियम" या लर्निंग कर्व है। जैसे-जैसे किसी तकनीक का उत्पादन बढ़ता है, उसकी लागत कम होती जाती है।
पिछले दशक में लागत में आई गिरावट:
|
तकनीक
|
लागत में गिरावट
|
मुख्य कारण
|
|
सौर ऊर्जा
|
~90%
|
चीनी विनिर्माण क्षमता में वृद्धि
|
|
पवन ऊर्जा
|
~70%
|
बेहतर टर्बाइन डिजाइन और स्केलिंग
|
|
बैटरी स्टोरेज
|
~85%
|
इलेक्ट्रिक वाहनों और ग्रिड स्टोरेज की मांग
|
आर्थिक बचत:
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के अनुसार, यदि दुनिया वर्ष 2050 तक पूरी तरह से नवीकरणीय ऊर्जा पर शिफ्ट हो जाती है, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था को 12 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 10.2 ट्रिलियन यूरो) की बचत होगी।
- जीवाश्म ईंधन बनाम स्वच्छ ऊर्जा: कोयला और गैस की कीमतें भू-राजनीतिक तनाव (जैसे यूक्रेन युद्ध) के कारण अस्थिर रहती हैं।
- परिचालन लागत: पवन और सौर संयंत्रों को बनाने में निवेश लगता है, लेकिन उनका "ईंधन" (धूप और हवा) मुफ्त है।
- अपवाद: परमाणु ऊर्जा इस मामले में अपवाद है; यह सस्ती होने के बजाय महंगी होती जा रही है।
जीवाश्म ईंधन की 'छिपी हुई' लागत
जीवाश्म ईंधन हमें सस्ते लग सकते हैं क्योंकि उनका बुनियादी ढांचा पहले से तैयार है, लेकिन उनकी वास्तविक लागत बहुत अधिक है:
- भारी किराया: तेल उत्पादक देश (जैसे सऊदी अरब) कम लागत में तेल निकालकर उसे ऊंचे दामों पर बेचते हैं। यह 'किराया' सालाना 2.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँचता है, जो उपभोक्ताओं की जेब से निकलता है।
- रखरखाव और परिवहन: कोयला और तेल को निकालने, साफ करने और दुनिया भर में भेजने के लिए निरंतर खर्च की आवश्यकता होती है।
- अस्थिरता: युद्ध या राजनीतिक अस्थिरता के कारण अचानक बिजली और ईंधन की कीमतें 10 गुना तक बढ़ सकती हैं।
निवेश का पुनर्वितरण:
ऊर्जा रणनीतिकार किंग्समिल बॉन्ड के अनुसार, स्वच्छ ऊर्जा के लिए हमें "अतिरिक्त" धन की आवश्यकता नहीं है, बल्कि हमें अपना खर्च करने का तरीका बदलना होगा।
- जो पैसा हम नई पाइपलाइन बिछाने या पुरानी रिफाइनरियों के रखरखाव में खर्च करते हैं, उसे सोलर पैनल, ग्रिड अपग्रेड और बैटरी स्टोरेज में लगाना चाहिए।
- एक बार सोलर पैनल लग जाने के बाद, यह 25-30 साल तक बिना किसी अतिरिक्त ईंधन खर्च के बिजली देता है।
भारत में स्वच्छ ऊर्जा:
- भारत की कुल संचयी बिजली उत्पादन क्षमता 31 मार्च, 2025 तक 475.2 गीगावाट (जीडब्ल्यू) तक पहुंच गई।
- भारत के स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र ने वर्ष 2025 में उल्लेखनीय प्रगति हासिल की। इस क्षेत्र की गैर-जीवाश्म ऊर्जा की स्थापित क्षमता बढ़कर 266.78 गीगावाट हो गई है। यह वृद्धि वर्ष 2024 की तुलना में 22.6 प्रतिशत अधिक है।
- वर्ष 2025 के दौरान 49 गीगावाट से अधिक नई गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता जोड़ी गई। इस विस्तार में सौर ऊर्जा ने अग्रणी भूमिका निभाई।
- सौर ऊर्जा की स्थापित क्षमता 97.86 गीगावाट से बढ़कर 135.81 गीगावाट हो गई, जो 38.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्शाती है।
- पवन ऊर्जा क्षमता में भी लगातार वृद्धि देखी गई। यह 48.16 गीगावाट से बढ़कर 54.51 गीगावाट हो गई।
- यह संकेत करता है कि भारत में स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन दोनों मुख्य स्त्रोतों; सौर और पवन में संतुलित रूप से बढ़ रहा है।
- भारत लगातार अपने राष्ट्रीय लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, जिसके तहत वर्ष 2030 तक 500 गीगावाट गैर-जीवाश्म ऊर्जा क्षमता हासिल करने का लक्ष्य है। यह प्रगति देश के लिए न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
|
प्रश्न. ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के अध्ययन के अनुसार, यदि विश्व 2050 तक पूरी तरह नवीकरणीय ऊर्जा पर शिफ्ट हो जाए, तो अनुमानित वैश्विक बचत कितनी होगी ?
(a) 2 ट्रिलियन डॉलर
(b) 5 ट्रिलियन डॉलर
(c) 8 ट्रिलियन डॉलर
(d) 12 ट्रिलियन डॉलर
|