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समान नागरिक संहिता 

चर्चा में क्यों 

हाल ही में, गुजरात में समान नागरिक संहिता (UCC) को लागू करने के लिये राज्य सरकार द्वारा एक विशेषज्ञ समिति के गठन की घोषणा की गई।   

प्रमुख बिंदु 

  • इस वर्ष यू.सी.सी. पर विशेषज्ञ समिति का गठन करने वाला गुजरात उत्तराखंड के पश्चात् दूसरा राज्य है।
  • मई माह में उत्तराखंड ने राज्य में यू.सी.सी. को लागू करने के लिये उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश रंजना देसाई के नेतृत्व में एक समिति के गठन की घोषणा की थी।
  • विदित है कि असम और हिमाचल प्रदेश भी यू.सी.सी. के विचार का समर्थन कर चुके हैं।

क्या है समान नागरिक संहिता

  • यू.सी.सी. पूरे देश के लिये एक समान कानून प्रदान करती है जो सभी धार्मिक समुदायों पर उनके व्यक्तिगत मामलों, जैसे- विवाह, तलाक, विरासत, गोद लेने आदि पर लागू होती है।
  • संविधान के भाग IV में वर्णित राज्य के नीति निदेशक सिद्धांतों के तहत अनुच्छेद-44 में प्रावधान है कि राज्य पूरे भारत में नागरिकों के लिये एक समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास करेगा।
  • विदित है कि गोवा भारत का एकमात्र ऐसा राज्य है जहां धर्म, लिंग और जाति की परवाह किये बिना यू.सी.सी. लागू है।

क्रम संख्या 

देश में लागू विभिन्न पर्सनल लॉ

1.

हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 

हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और सिखों पर लागू

2.

पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 

पारसियों से संबंधित मामलों पर लागू

3.

भारतीय ईसाई विवाह अधिनियम, 1872

ईसाईयों से संबंधित मामलों पर लागू

4.

मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937

मुसलमानों से संबंधित मामलों पर लागू

समान नागरिक संहिता का महत्त्व

  • विवाह, तलाक, उत्तराधिकार संबंधी नियमों में समानता।
  • धर्मनिरपेक्ष स्वरुप को मजबूती तथा धार्मिक आधार पर लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने में सहायक।
  • सांस्कृतिक-धार्मिक परंपराओं के कारण वंचित महिलाओं को सम्मानजनक जीवन जीने का अधिकार।
  • समुदायों में परस्पर सद्भाव व धार्मिक सद्भाव के कारण कट्टरता में कमी।
  • भारत के विशाल जनसंख्या आधार का प्रशासन सुविधाजनक।
  • एकीकृत पर्सनल लॉ से समुदायों में व्याप्त बुराइयों, सामाजिक कुरीतियों, अन्यायपूर्ण और तर्कहीन परंपराओं के उन्मूलन में सहायक।

समान नागरिक संहिता के विरोध का आधार

  • संविधान के अनुच्छेद-25 के तहत प्राप्त धार्मिक स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन।
  • भारत की विविधता, रीति-रिवाज और क्षेत्रीय परंपराओं को खतरा और आदिवासियों की पहचान का संकट।
  • सांप्रदायिक राजनीति का सहारा लेकर इसे एक अत्याचार के रूप में पेश किया जा सकता है जिससे देश में सामाजिक तनाव और अशांति।
  • भारतीय समाज की बहुसंस्कृतिवाद पहचान में कमी।
  • अल्पसंख्यकों और बहुसंख्यकों (हिंदू) को प्रभावित करने के कारण बहुमत पर प्रभाव।
  • धार्मिक पहचान का कमजोर होना।

आगे की राह

  • वर्तमान परिदृश्य में यह राष्ट्र की एकता और अखंडता के प्रतिकूल हो सकता है इसलिये रीति-रिवाजों और परंपराओं के केवल उन्हीं तत्त्वों को एकीकृत कानून में लाया जाना चाहिये जो व्यक्तियों के साथ होने वाले अन्याय के कारण बनते हैं।
  • पर्सनल लॉ में कुछ अच्छे और न्यायसंगत प्रावधान हैं जिन्हें एकीकृत कानून में शामिल किया जा सकता हैं। साथ ही, इससे जुड़ी स्वदेशी संस्कृति को संरक्षित करने के लिये तर्कसंगत रीति-रिवाजों और परंपराओं की रक्षा की जानी चाहिये। यह देश में विविधता में एकता की रक्षा करने में मदद करेगा।
  • भारत जैसे विशाल लोकतंत्र और विधि के शासन वाले देश में व्यवस्था में परिवर्तन क्रमिक एवं प्रगतिशील रूप से लाया जाना चाहिये तथा आदर्श रूप में यू.सी.सी. के लक्ष्य को चरणबद्ध तरीके से पूरा किया जाना चाहिये।

राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत 

  • संविधान के भाग IV में अनुच्छेद 36-51 में सिद्धांतों की विस्तृत श्रृंखला को शामिल किया गया है।
  • इसके अंतर्गत यू.सी.सी. के अलावा नागरिकों को समान न्याय और निशुल्क कानूनी सहायता (अनुच्छेद 39 A), ग्राम पंचायतों का संगठन (अनुच्छेद 40), उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी (अनुच्छेद 43A), कृषि और पशुपालन का संगठन (अनुच्छेद 48), अंतर्राष्ट्रीय शांति और सुरक्षा को बढ़ावा देना (अनुच्छेद 51) आदि तत्त्व शामिल है।
  • अनुच्छेद 37 के अनुसार संविधान के भाग IV में उल्लेखित निदेशक सिद्धांत किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं अर्थात् इन्हें लागू करने की अनिवार्यता नहीं होती है। लेकिन कानून निर्माण में इन सिद्धांतों को लागू करना राज्य का कर्तव्य है।
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