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भारत में दल-बदल विरोधी क़ानून

संदर्भ 

  • हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों (जिनमें राघव चड्ढा और हरभजन सिंह जैसे प्रमुख नाम शामिल हैं) के भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होने से उच्च सदन का समीकरण पूरी तरह बदल गया है। इस नाटकीय दलबदल के कारण राज्यसभा में आप की सदस्य संख्या घटकर महज तीन रह गई है। इस राजनीतिक घटनाक्रम ने दलबदल विरोधी कानून के तहत एक बड़ी कानूनी बहस और अयोग्यता की संभावनाओं को जन्म दे दिया है।  

दलबदल विरोधी कानून: एक परिचय 

  • भारतीय संविधान की दसवीं अनुसूची में दलबदल विरोधी प्रावधानों का उल्लेख है। इसे 52वें संविधान संशोधन (1985) के माध्यम से जोड़ा गया था, ताकि अनैतिक दलबदल पर अंकुश लगाया जा सके और विधायी संस्थाओं में राजनीतिक स्थिरता बनी रहे। 

91वें संविधान संशोधन (2003) के दूरगामी प्रभाव 

इस कानून को और अधिक कठोर बनाने के लिए 2003 में 91वां संशोधन किया गया, जिसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं : 

  • विलय की अनिवार्य शर्त : किसी दल के कम से कम दो-तिहाई (2/3) सदस्यों का एक साथ जाना अनिवार्य है, तभी उसे कानूनी रूप से विलय माना जाएगा। इससे कम संख्या होने पर सदस्यों की सदस्यता समाप्त की जा सकती है। इसने पुराने एक-तिहाई विभाजन के नियम को समाप्त कर दिया। 
  • मंत्रिमंडल का आकार : केंद्र और राज्यों में मंत्रिपरिषद की संख्या को सदन की कुल सदस्य संख्या के 15% तक सीमित कर दिया गया, ताकि लाभ के पदों का लालच देकर होने वाले दलबदल को रोका जा सके। 

चुनौतियाँ: विधायी स्वतंत्रता बनाम पार्टी अनुशासन 

यद्यपि यह कानून स्थिरता लाने के लिए लाया गया था, किंतु इसके कुछ नकारात्मक पहलू भी उभरे हैं :

  • निर्णय लेने की स्वतंत्रता का अभाव : पार्टी व्हिप के डर से सांसद या विधायक अपने विवेक या निर्वाचन क्षेत्र की जनता की इच्छा के विरुद्ध जाकर भी पार्टी के पक्ष में मतदान करने को मजबूर होते हैं। 
  • केंद्रीकृत सत्ता : इस कानून ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को असीमित शक्तियां दे दी हैं, जिससे निर्वाचित प्रतिनिधि केवल पार्टी के आदेशों के अधीनस्थ बनकर रह गए हैं। 

आप सांसदों की सदस्यता: कानूनी दुविधा और तर्क 

आम आदमी पार्टी के सात राज्यसभा सदस्यों के भारतीय जनता पार्टी में विलय ने दलबदल विरोधी कानून की व्याख्या को लेकर एक नई कानूनी बहस को जन्म दे दिया है। इस प्रकरण में अयोग्यता की स्थिति को लेकर दो मुख्य दृष्टिकोण उभरकर सामने आए हैं: 

  • प्रथम दृष्टिकोण (सदन में संख्या बल) : इस मत के समर्थकों का तर्क है कि यदि राज्यसभा के सभापति इस कदम को एक वैध विलय के रूप में मान्यता दे देते हैं, तो सांसदों की सदस्यता पर कोई आंच नहीं आएगी। इसका आधार यह है कि सदन में मौजूद आप के कुल विधायी दल का दो-तिहाई से अधिक हिस्सा भाजपा में शामिल हो चुका है, जो कि संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत अयोग्यता से बचने के लिए एक स्वीकृत अपवाद है।  
  • द्वितीय दृष्टिकोण (समग्र राजनैतिक दल का विलय) : इसके विपरीत, कुछ विधिक विशेषज्ञों का तर्क है कि विलय की शर्त केवल किसी एक सदन के विधायी दल पर नहीं, बल्कि संपूर्ण राजनैतिक दल पर लागू होती है। इस तर्क के अनुसार, अयोग्यता से सुरक्षा तभी मिल सकती है जब आप का केंद्रीय नेतृत्व (पार्टी संगठन) भी आधिकारिक तौर पर भाजपा में विलीन हो जाए। 

राज्यसभा सभापति का विवेकाधिकार और प्रभाव 

वर्तमान में दलबदल करने वाले सांसद तकनीकी रूप से अब भी आप का हिस्सा हैं। यहाँ सभापति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है :

  • सभापति यह तय करेंगे कि क्या यह वास्तव में एक कानूनी विलय है या अयोग्यता का मामला। उनके निर्णय को बाद में न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है।
  • संवैधानिक विसंगति : फैसले में देरी होने तक ये सांसद सदन में आप के सदस्य कहलाएंगे, लेकिन व्यवहार में वे एनडीए (NDA) के पक्ष में मतदान करेंगे, जिससे सदन में सरकार की ताकत बढ़ जाएगी।  

निष्कर्ष 

  • यदि दलबदल करने वालों की संख्या दो-तिहाई से कम होती, तो वे तत्काल अयोग्य घोषित कर दिए जाते। हालांकि, कानून में सभापति के लिए निर्णय लेने की कोई निश्चित समय सीमा नहीं है, जिसका लाभ अक्सर दल बदलने सांसदों को मिलता है। सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में यह सुझाव दिया है कि ऐसे संवेदनशील मामलों का निपटारा तीन महीने के भीतर किया जाना चाहिए, ताकि लोकतांत्रिक शुचिता बनी रहे।
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