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कार्बी आंगलोंग में हिंसा: भूमि अधिकार, स्वायत्तता एवं अस्मिता का टकराव

संदर्भ 

  • हाल ही में, असम के पश्चिम कार्बी आंगलोंग जिले में भड़की हिंसा ने एक बार फिर पूर्वोत्तर भारत में भूमि अधिकारों एवं स्वायत्त शासन से जुड़े जटिल प्रश्नों को केंद्र में ला दिया है। इस हिंसा में लोगों की मौत, घायल होने, दुकानों व बाजारों में आगजनी, मोबाइल इंटरनेट सेवाओं के निलंबन तथा निषेधाज्ञा लागू किए जाने जैसी घटनाएँ सामने आई हैं। 
  • वस्तुतः यह अशांति आकस्मिक नहीं है, बल्कि लंबे समय से जारी भूमि विवादों का परिणाम है जो विशेष रूप से कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद (KAAC) के अधिकार क्षेत्र में आने वाली चरागाह आरक्षित भूमि से जुड़े हुए हैं।

हिंसा का तात्कालिक कारण

  • चरागाह भूमि को लेकर आमरण अनशन पर बैठे प्रदर्शनकारियों की प्रमुख मांग थी कि पी.जी.आर. (पेशेवर चराई आरक्षित) और वी.जी.आर. (ग्राम चराई आरक्षित) भूमि से कथित अतिक्रमणकारियों को हटाया जाए।
  • ये चरागाह भूमि ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की भूमि व्यवस्था की विरासत हैं और पारंपरिक रूप से आदिवासी समुदायों की पशुपालन आधारित आजीविका का आधार रही हैं।
  • अनशनकारी प्रदर्शनकारियों को स्वास्थ्य कारणों से गुवाहाटी स्थानांतरित करने से स्थानीय लोगों में उन्हें गिरफ्तार कर लिए जाने की धारणा बन गई। इसने पत्थरबाजी, आगजनी एवं व्यापक हिंसा का रूप ले लिया। 

कार्बी आंगलोंग विवाद की पृष्ठभूमि

  • छठी अनुसूची एवं स्वायत्त शासन: कार्बी आंगलोंग और पश्चिम कार्बी आंगलोंग जिले संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। इसके तहत कार्बी आंगलोंग स्वायत्त परिषद (केएएसी) को भूमि प्रबंधन, वन संसाधनों और स्थानीय प्रशासन से संबंधित विशेष अधिकार प्रदान किए गए हैं। इन प्रावधानों का उद्देश्य आदिवासी पहचान, संस्कृति और संसाधनों की रक्षा करना है। 
  • विद्रोह एवं अस्मिता की राजनीति: वर्ष 1980 के दशक के उत्तरार्ध से इस क्षेत्र में कार्बी उग्रवादी समूह सक्रिय रहे हैं। प्रारंभ में उनकी मांग एक पृथक कार्बी राज्य की थी, जो बाद में अधिक स्वायत्तता की मांग में परिवर्तित हो गई। इस संघर्ष की विरासत ने ‘बाहरी लोगों’ के प्रति अविश्वास एवं शत्रुता की भावना को गहरा किया है। 

भूमि विवाद : पी.जी.आर. (पेशेवर चराई आरक्षित) व वी.जी.आर. (ग्राम चराई आरक्षित) 

  • अतिक्रमण बनाम वैध निवास: कार्बी आदिवासी संगठनों का आरोप है कि चरागाह भूमि पर बड़े पैमाने पर अवैध बस्तियाँ बसाई गई हैं। दूसरी ओर, यहाँ रहने वाले गैर-आदिवासी समुदाय, जैसे- बिहारी, बंगाली व नेपाली दशकों से निवास का दावा करते हुए अपने बसाव को नियमित करने की मांग कर रहे हैं। 
  • राजनीतिक संवेदनशीलता: वस्तुतः तनाव में अधिक वृद्धि तब हुई जब बिहारी नोनिया समुदाय के एक संगठन ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर प्रवासियों को कानूनी दर्जा देने की मांग की। कार्बी संगठनों ने इसे छठी अनुसूची के अंतर्गत प्राप्त संवैधानिक संरक्षण के लिए सीधी चुनौती के रूप में देखा।
  • कानूनी अड़चनें और प्रशासनिक सीमाएँ: के.ए.ए.सी. द्वारा 15 दिन का बेदखली नोटिस जारी किया गया था किंतु गुवाहाटी उच्च न्यायालय में लंबित जनहित याचिका के कारण बेदखली प्रक्रिया पर रोक लग गई। प्रशासन ने न्यायिक कार्यवाही के दौरान बेदखली को आगे बढ़ाने को अदालत की अवमानना का जोखिम बताया। 

प्रमुख चुनौतियाँ और संभावित समाधान

  1. पारंपरिक अधिकार बनाम बसने वालों के दावे : लंबे समय से बसे गैर-आदिवासी समुदायों के लिए स्पष्ट और मानवीय पुनर्वास नीति की आवश्यकता
  2. छठी अनुसूची का कमजोर क्रियान्वयन : पी.जी.आर. व वी.जी.आर. भूमि की कानूनी स्थिति पर स्पष्टता तथा इनके संरक्षण के लिए मजबूत संस्थागत ढाँचा 
  3. न्यायिक विलंब : भूमि विवादों से संबंधित मामलों का समयबद्ध न्यायिक निपटारा
  4. विश्वास की कमी : के.ए.ए.सी., राज्य प्रशासन, आदिवासी संगठनों और बसने वालों के बीच संवाद आधारित दृष्टिकोण को बढ़ावा देना
  5. जातीय ध्रुवीकरण का खतरा : प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली, सामुदायिक पुलिसिंग और स्थानीय शांति तंत्र को सुदृढ़ करना

निष्कर्ष

कार्बी आंगलोंग में हुई हिंसा छठी अनुसूची क्षेत्रों में आदिवासी स्वायत्तता, भूमि अधिकारों और जनसांख्यिकीय दबावों के बीच मौजूद संवेदनशील संतुलन को उजागर करती है। यदि संस्थागत स्पष्टता, संवेदनशील प्रशासन एवं समावेशी संघर्ष समाधान को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो इस प्रकार के विवाद भविष्य में भी दोहराए जा सकते हैं। स्थायी शांति के लिए आवश्यक है कि भूमि संबंधी मुद्दों का समाधान कानून के शासन, संवैधानिक मूल्यों एवं सहभागी शासन के माध्यम से किया जाए, ताकि पूर्वोत्तर भारत में सामाजिक सामंजस्य व आंतरिक सुरक्षा को मजबूती मिल सके। 

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