खरपतवार: सरसों की पैदावार को कम करने वाला एक मूक खतरा
मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन पेपर - 3
चर्चा में क्यों ?
सरसों भारत में खाद्य तेल का सबसे बड़ा स्वदेशी स्रोत है। इसकी खेती लगभग 9 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र में होती है।
प्रमुख उत्पादक राज्य: राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और पश्चिम बंगाल। सरसों की फसल पर ओरोबैंचे एजिप्टियाका नामक परजीवी खरपतवार का गंभीर खतरा बढ़ रहा है।
ओरोबैंचे फसल को कैसे नुकसान पहुंचाता है ?
ओरोबैंचे जमीन के नीचे सरसों की जड़ों से चिपक जाता है।
यह पानी, पोषक तत्व और कार्बन को सीधे फसल से चूस लेता है।
पौधे मुरझा जाते हैं, पीले पड़ते हैं और उनकी वृद्धि रुक जाती है।
बीज की पैदावार में भारी गिरावट आती है।
शुरुआती चरण में यह मिट्टी के नीचे छिपा रहता है, इसलिए समय पर पहचान मुश्किल होती है।
जब तक यह दिखाई देता है, तब तक नुकसान काफी हो चुका होता है।
किसानों पर प्रभाव:
किसानों को लगातार उपज में भारी नुकसान हो रहा है।
हरियाणा के सिरसा जिले में उपज 9–12 क्विंटल/एकड़ से घटकर लगभग 6 क्विंटल/एकड़ रह गई है।
अनुशंसित नियंत्रण उपायों के बावजूद संतोषजनक परिणाम नहीं मिले।
कई किसान सरसों छोड़कर गेहूं, चना और जौ की ओर रुख कर रहे हैं।
संक्रमण तेजी से क्यों फैल रहा है ?
ओरोबैंचे का एक पौधा हजारों सूक्ष्म बीज पैदा करता है।
ये बीज मिट्टी में 20 साल तक जीवित रह सकते हैं।
हवा और पानी के माध्यम से बीज तेजी से फैलते हैं।
लगातार सरसों की खेती और सिंचाई बीज अंकुरण को बढ़ावा देती है।
अब यह पहले की तुलना में जल्दी और उपजाऊ मिट्टी में भी दिखाई देने लगा है।
भारत के लिए सरसों क्यों महत्वपूर्ण है ?
सरसों भारत की सबसे प्रमुख तिलहन फसल है।
यह सालाना 10.5–10.6 मिलियन टन स्वदेशी खाद्य तेल उत्पादन में 4 मिलियन टन से अधिक योगदान देती है।
खाद्य तेल आयात पर निर्भरता कम करने में इसकी अहम भूमिका है।
भारत हर साल लगभग 16 मिलियन टन खाद्य तेल आयात करता है।
2023–24 में आयात बिल 15.9 बिलियन डॉलर और 2024–25 में 18.3 बिलियन डॉलर रहा।
बढ़ते रोग और कीट दबाव
ओरोबैंचे के साथ एफिड्स जैसे कीटों का प्रकोप बढ़ा है।
सफेद रतुआ, पत्ती झुलसा, तना सड़न और पाउडरी मिल्ड्यू जैसी बीमारियां बढ़ रही हैं।
इससे किसानों का सरसों पर भरोसा कमजोर हो रहा है।
खरपतवारनाशक: एक संभावित समाधान
रासायनिक नियंत्रण के रूप में खरपतवारनाशकों पर विचार किया जा रहा है।
ग्लाइफोसेट जैसे शाकनाशी ओरोबैंचे के नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं।
लेकिन पारंपरिक सरसों किस्मों में इनका प्रयोग सीमित है।
पारंपरिक खरपतवारनाशक क्यों कारगर नहीं ?
ग्लाइफोसेट सभी पौधों को मारने वाला गैर-चयनात्मक शाकनाशी है।
यह EPSPS एंजाइम को अवरुद्ध कर देता है।
इससे खरपतवार के साथ-साथ सरसों की फसल भी नष्ट हो जाती है।
कम खुराक पर यह ओरोबैंचे पर प्रभावी नहीं होता।
खरपतवारनाशक-प्रतिरोधी सरसों की भूमिका
नई रणनीति: शाकनाशी-सहिष्णु सरसों किस्मों का विकास।
इमिडाज़ोलिनोन-प्रतिरोधी संकर सरसों का परीक्षण चल रहा है।
संकर किस्म ‘पायनियर-45एस42सीएल’ इमाज़ापायर और इमाज़ापिक को सहन कर सकती है।
बुवाई के 25 दिन बाद केवल एक छिड़काव पर्याप्त होता है।
प्रारंभिक परिणाम किसानों के लिए उत्साहजनक हैं।
जीएम मस्टर्ड: भविष्य का विकल्प:
वैज्ञानिकों ने ग्लाइफोसेट-प्रतिरोधी जीएम सरसों विकसित की है।
इससे कई खरपतवारनाशक विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं।
रासायनिक प्रतिरोध विकसित होने का खतरा कम होगा।
नीति-निर्माताओं के सामने जीएम फसलों को अनुमति देने का महत्वपूर्ण निर्णय है।
विशेषज्ञों का मत है कि निर्णय विज्ञान और कृषि अर्थशास्त्र पर आधारित होना चाहिए।
निष्कर्ष:
ओरोबैंचे सरसों उत्पादन के लिए एक गंभीर और दीर्घकालिक खतरा है।
इसका समाधान वैज्ञानिक नवाचार, उपयुक्त नीतियों और किसानों को तकनीकी सहायता से ही संभव है।
सरसों की सुरक्षा भारत की खाद्य तेल आत्मनिर्भरता के लिए अत्यंत आवश्यक है।