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सरोगेट विज्ञापन क्या है? उद्देश्य, कानूनी और विनियामक फ्रेमवर्क,महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय और सुधार

  • विज्ञापन आज हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। यह उपभोक्ताओं की पसंद और आर्थिक गतिविधियों को प्रभावित करता है।
  • भारत में विज्ञापन पर लंबे समय से कानून और विनियमन लागू हैं, लेकिन तकनीकी और डिजिटल युग में नए तरीके और रणनीतियाँ जैसे सरोगेट विज्ञापन चुनौतीपूर्ण साबित हो रहे हैं। 
  • हाल ही में, केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) और BCCI से आग्रह किया कि वे खिलाड़ियों को तंबाकू या शराब के सरोगेट उत्पादों के प्रचार से रोकें, जिससे यह विषय सुर्खियों में आया।

सरोगेट विज्ञापन क्या है ?

  • सरोगेट विज्ञापन एक रणनीति है जिसमें प्रतिबंधित उत्पाद (जैसे तंबाकू या शराब) का प्रत्यक्ष प्रचार करने के बजाय, उसी कंपनी के किसी अन्य उत्पाद का विज्ञापन किया जाता है।

पद्धति:

  • भ्रामक जानकारी, छुपी हुई जानकारी या गलत विवरण का प्रयोग।
  • मशहूर हस्तियों और आकर्षक दृश्यों का उपयोग।
  • उदाहरण: शराब कंपनियां म्यूजिक CD का प्रचार करती हैं या पान मसाला ब्रांड्स इलायची विज्ञापनों के माध्यम से परोक्ष रूप से प्रचार करते हैं।

उद्देश्य:-

सरोगेट विज्ञापन लोकप्रिय खेल आयोजनों में ब्रांड की पहचान और रिकॉल वैल्यू बढ़ाने में सहायक होते हैं। इससे प्रतिबंधित उत्पादों की बिक्री में वृद्धि होती है। उदाहरण के लिए, IPL 2024 के दौरान प्रचारित विज्ञापनों में पान मसाला से जुड़े विज्ञापनों की हिस्सेदारी 16% थी।

कानूनी और विनियामक फ्रेमवर्क

भारत में सरोगेट विज्ञापनों को रोकने के लिए विभिन्न कानून और दिशानिर्देश हैं:

  1. COTPA, 2003 (Cigarettes and Other Tobacco Products Act): तंबाकू और सिगरेट उत्पादों का विज्ञापन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रतिबंधित।
  2. केबल टेलीविजन नेटवर्क (विनियमन) अधिनियम, 1995 और केबल टेलीविजन नियम, 1994: टेलीविजन पर प्रतिबंधित उत्पादों के विज्ञापनों पर रोक।
  3. केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (CCPA) दिशा-निर्देश, 2022: सरोगेट विज्ञापनों की पहली बार स्पष्ट परिभाषा।
  4. भारतीय विज्ञापन मानक परिषद (ASCI) कोड: प्रतिबंधित वस्तुओं से जुड़े ब्रांड का किसी अप्रतिबंधित वस्तु के लिए उपयोग संभव है, बशर्ते यह 'जेन्युइन ब्रांड एक्सटेंशन' हो।
  5. औषधि और चमत्कारिक उपचार (आपत्तिजनक विज्ञापन) अधिनियम, 1954: चमत्कारिक गुणों वाले उपचारों के विज्ञापन पर प्रतिबंध।
  6. SEBI (निवेश सलाहकार) विनियम, 2013: फिनफ्लुएंसर्स और वित्तीय सलाह देने वाले प्लेटफॉर्म को विनियमित करता है।

महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय

  • इंडियन मेडिकल एसोसिएशन एवं अन्य बनाम भारत संघ (2024):
    वैध स्व-घोषणा प्रमाणपत्र के बिना टेलीविजन, प्रिंट मीडिया या इंटरनेट पर विज्ञापन की अनुमति नहीं।
  • टीवी टुडे नेटवर्क बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (2021):
    शराब की बोतल जैसा दिखने वाले क्लब सोडा का विज्ञापन सरोगेट विज्ञापन माना गया। ब्रांड से माफी मांगने को कहा गया।

सरोगेट विज्ञापनों के निहितार्थ

उपभोक्ताओं के लिए:

  • जागरूक निर्णय लेने की क्षमता प्रभावित।
  • युवा और निर्धन वर्ग अधिक प्रभावित।

लोक स्वास्थ्य के लिए:

  • ICMR के अध्ययन अनुसार, ICC पुरुष क्रिकेट विश्व कप, 2023 में कुल विज्ञापनों का 41.3% स्मोकलेस तंबाकू ब्रांड्स के सरोगेट विज्ञापन थे।
  • स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव और अस्वस्थ आदतों को बढ़ावा।

कंपनियों के लिए:

  • ब्रांड दृश्यता और बिक्री में वृद्धि।
  • अनुचित व्यापार व्यवहार और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
  • खेल टूर्नामेंट्स में डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म और BCCI को राजस्व में लाभ। उदाहरण: 10 सेकंड का विज्ञापन स्पॉट 60 लाख में।

सामाजिक प्रभाव:

  • 'आउट ऑफ साइट-आउट ऑफ माइंड' मार्केटिंग रणनीति उपभोक्ताओं को प्रभावित करती है।
  • सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट से उपभोक्ताओं में उपभोग की प्रेरणा।

आगे की राह और सिफारिशें

नियामक सुधार:

  1. स्पष्ट अंतर: ब्रांड एक्सटेंशन और प्रतिबंधित उत्पाद के बीच।
  2. प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष संदर्भ: विज्ञापन में कोई प्रतिबंधित उत्पाद न दिखे।
  3. विनियमों की मजबूती: COTPA और ASCI के तहत स्पष्टीकरण।
  4. डिजिटल मीडिया: खेल सट्टेबाजी और स्वास्थ्य-केंद्रित सप्लीमेंट्स पर निगरानी।
  5. जवाबदेही: दंड और जुर्माना बढ़ाकर मीडिया की जिम्मेदारी सुनिश्चित।
  6. सतर्कता और ऑडिट: समय-समय पर प्रवर्तन तंत्र और रियल टाइम निगरानी।
  7. IEC अभियान: लोक जागरूकता और शिक्षा बढ़ाना।
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