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बायोमास संयंत्र, बायो-सी.एन.जी. और बायो-एथेनॉल में पराली का अधिकतम उपयोग

  • 14th September, 2020

(प्रारम्भिक परीक्षा : राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ,  पर्यावरणीय पारिस्थितिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3 : कृषि उत्पाद का भंडारण, परिवहन तथा विपणन, सम्बंधित विषय और बाधाएँ; किसानों की सहायता के लिये ई-प्रौद्योगिकी, देशज प्रौद्योगिकी और नई प्रौद्योगिकी का विकास, संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण)

पृष्ठभूमि

पराली दहन पंजाब सरकार के लिये एक बड़ी समस्या है। प्राथमिकताओं को पुन: तय करने के साथ-साथ एक अलग सोच इस समस्या का एक प्रभावी समाधान हो सकता है। पंजाब में ‘पंजाब ऊर्जा विकास एजेंसी’ (PEDA) पराली उपयोग के विभिन्न विकल्पों को अपनाकर इस समस्या को हल करने में विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के साथ मिलकर एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

पेडा और वर्तमान परिदृश्य

  • पेडा (PEDA) पिछले तीन दशकों से नवीकरणीय ऊर्जा के विकास और संवर्धन की दिशा में कार्यरत है। इसने 11 बायोमास बिजली संयंत्र स्थापित किये हैं, जहाँ 97.50 मेगा वाट (MW) बिजली उत्पन्न होती है।
  • इन संयंत्रों में प्रतिवर्ष 8.80 लाख मीट्रिक टन धान की पराली का उपयोग बिजली पैदा करने के लिये किया जाता है, जो कि पंजाब में उत्पन्न होने वाली कुल 20 मिलियन टन धान की पराली के 5% से भी कम है।
  • कार्बन-डाईऑक्साइड और कणिका तत्वों (Particulate Matter) के अपेक्षाकृत कम उत्सर्जन और कोयले जैसे अन्य जीवाश्म ईंधन को विस्थापित करने के कारण ये परियोजनाएँ पर्यावरण के अनुकूल हैं।

जैवभार (Biomass)

  • जैव ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य का प्रकाश है। कुल सौर ऊर्जा का कुछ हिस्सा प्रकाश संश्लेषित पौधों द्वारा जैवभार में संचित हो जाता है। अतः वे सभी पदार्थ जिनकी उत्पत्ति प्रकाश संश्लेषण द्वारा होती है, जैव-भार कहलाते हैं।
  • यह नवीकरणीय ऊर्जा का एक स्रोत है। इसके अंतर्गत लिग्नोसेल्युलोज युक्त पादप (जैसे-यूकेलिप्टस, चीड़ आदि) के साथ-साथ जलीय पादप (जलकुम्भी) तथा अपशिष्ट पदार्थों के रूप में खाद, कूड़ा-करकट आदि को ऊर्जा स्रोत के रूप में रखा गया है।

जैव-सी.एन.जी. (Bio-CNG)

  • जैव-गैस का शुद्ध रूप, जिसकी संरचना और ऊर्जा क्षमता जीवाश्म आधारित प्राकृतिक गैस के समान होती है। इसे कृषि अवशेषों, पशुओं के गोबर, खाद्य अपशिष्ट, शहरी ठोस अपशिष्ट (MSW) और सीवेज जल से उत्पन्न किया जाता है।

पराली उपयोग के अन्य क्षेत्र

  • बायोमास परियोजनाओं के अलावा बायो-सी.एन.जी. की आठ परियोजनाएँ राज्य में क्रियान्वित हैं। इन परियोजनाओं के पूरा होने पर इनको सालाना लगभग 3 लाख मीट्रिक टन धान की पराली की आवश्यकता होगी।
  • ‘स्टार्ट-अप’ अवधारणा के तहत पंजाब में धान के पराली के उपयोग की बहुत सम्भावना है। यहाँ संगरूर ज़िले में भारत की सबसे बड़ी सी.एन.जी. परियोजना स्थापित करने पर कार्य चल रहा है। इस एकल परियोजना के लिये प्रति वर्ष 1.10 लाख मीट्रिक टन धान के पुआल की आवश्यकता होगी।
  • वर्तमान में ठप पड़ी भटिंडा में स्थित 100 किलो लीटर की एक बायो-एथेनॉल परियोजना को भी सालाना 2 लाख मीट्रिक टन धान के पराली की आवश्यकता होगी।
  • इन सभी परियोजनाओं के प्रारम्भ होने के बाद पंजाब 1.5 मिलियन टन धान की पराली (कुल का 7%) का उपयोग करने में सक्षम होगा। इससे उत्पन्न एथेनॉल का उपयोग डीज़ल और पेट्रोल के सम्मिश्रण के बाद वाहनों को चलाने के लिये किया जा सकता है।
  • यदि पंजाब में आधे वाहन भी एथेनॉल-आधारित ईंधन पर चलने लगते हैं, तो धान की पराली, जिसे अभी अभिशाप माना जाता है, आने वाले दिनों में एक वरदान साबित हो सकती है।

एथेनॉल (Ethanol)

  • एथेनॉल को ‘एथिल एल्कोहल’ भी कहते हैं। यह एक प्रकार का तरल है। 95% शुद्धता की स्थिति में इसे ‘रेक्टिफाइड स्पिरिट’ या ‘शोधित स्पिरिट’ कहते हैं। इसका प्रयोग मादक पेय (Alcoholic beverages) में नशीले घटकों (Intoxicating Ingredient) के रूप में होता है।
  • लगभग 99% शुद्धता की स्थिति में एथेनॉल का प्रयोग पेट्रोल के साथ मिलाने के लिये भी होता है।

बायो-एथेनॉल (Bio-Ethanol)

  • जैवभार से उत्पन्न एथेनॉल को बायो-एथेनॉल कहा जाता है। बायो-एथेनॉल के लिये जैवभार के रूप में शर्करा युक्त सामग्री, जैसे- गन्ना, चुकंदर, मीठे चारे आदि के साथ-साथ स्टार्च युक्त मक्का, कसावा, पके आलू, शैवाल, लकड़ी के कचरे, कृषि और वन अवशेष आदि को शामिल किया जाता है।

धान के पुआल पर आधारित उद्योग के लाभ

  • यदि किसान धान की पराली को जलाने के बजाय उद्योगों में प्रयोग होने के लिये बेच सकें, तो उन्हें बहुत लाभ हो सकता है। इससे पर्यावरण के साथ-साथ मृदा को भी लाभ होगा, क्योंकि पराली को जलाए जाने से प्रतिवर्ष उपजाऊ मिट्टी को भी क्षति पहुँचती है, क्योंकि इससे भारी मात्रा में मृदा में उपस्थित कार्बनिक पदार्थ भी जल जाते हैं।
  • इसके अतिरिक्त ऐसी परियोजनाएँ स्थापित होने से ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार के बड़े अवसर भी उपलब्ध हो सकते हैं।

आगे की राह

  • वर्तमान में पराली के उत्पादन की तुलना में उसका प्रयोग काफी कम स्तर पर होता है। इसके लिये अधिक से अधिक पराली के उपयोग वाले उद्योगों को स्थापित करने की आवश्यकता है।
  • पंजाब में बड़े व्यावसायियों और एन.आर.आई. के साथ-साथ विशेष रूप से इंजीनियरिंग, विज्ञान और प्रौद्योगिकी में स्नातक युवाओं को भी ‘स्टार्ट-अप’ अवधारणा के तहत ऐसी परियोजनाओं को स्थापित करने के लिये प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
  • यह उनके बीच उद्यमशीलता की भावना पैदा करेगा। साथ ही, सरकार को पहले से ही स्वीकृत ऋण को प्राप्त करने और बाज़ार तक पहुँच प्रदान करने में इन उद्यमशील युवाओं की मदद करनी चाहिये।
  • किसानों की पराली को आय में परिवर्तित करने के लिये सार्वजनिक और निजी भागीदारी सहित राज्य, केंद्र और उद्योगों की ओर से संयुक्त प्रयासों की आवश्यकता है।
  • इसके अतिरिक्त प्लाई और पेंट उद्योगों में भी पराली के उपयोग की एक व्यापक सम्भावना है

प्री स्पेशल/ इंस्टॉ पीटी फैक्ट :

  • वे सभी पदार्थ जिनकी उत्पत्ति प्रकाश संश्लेषण द्वारा होती है, जैव-भार कहलाते हैं।
  • संगरूर ज़िले में भारत की सबसे बड़ी सी.एन.जी. परियोजना स्थापित करने पर कार्य चल रहा है।
  • 95% शुद्धता की स्थिति में एथेनॉल को ‘रेक्टिफाइड स्पिरिट’ या ‘शोधित स्पिरिट’ कहते हैं। इसका प्रयोग मादक पेय (Alcoholic beverages) में नशीले घटकों (Intoxicating Ingredient) के रूप में होता है।
  • लगभग 99% शुद्धता की स्थिति में एथेनॉल का प्रयोग पेट्रोल के साथ मिलाने के लिये भी होता है।
  • प्लाई और पेंट उद्योगों में भी पराली के उपयोग की एक व्यापक सम्भावना है।

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