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कोविड महामारी एवं महिला शिक्षा 

(मुख्य परीक्षा सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र –2, स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय)

संदर्भ 

कोविड महामारी ने शिक्षा के क्षेत्र में नई चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं। इसके कारण शैक्षिक एवं सामाजिक दृष्टि से हाशिये पर रहने वाले वर्ग विशेष रूप से प्रभावित हुए हैं। इस संदर्भ में महिलाओं के लिये स्थिति और भी अधिक चिंताजनक है। 

महिला शिक्षा पर महामारी का प्रभाव

  • एक अनुमान के अनुसार, कोविड महामारी के कारण वैश्विक स्तर पर लगभग 2.4 करोड़ स अधिक लड़कियाँ स्कूल छोड़ने की कगार पर हैं। महामारी के कारण विद्यालय बंद होने एवं आर्थिक समस्याओं ने शिक्षा प्राप्त करने में महिलाओं को प्रभावित करने वाले कारकों में वृद्धि की है।
  • भारत में महामारी से पूर्व उच्च शिक्षा में महिलाओं के लिये सकल नामांकन अनुपात में क्रमशः वृद्धि देखी जा रही थी। शैक्षिक सत्र 2012-13 में उच्च शिक्षा में महिलाओं का सकल नामांकन अनुपात 19.8 प्रतिशत था, जो कि 2019-20 में बढ़कर 27.3 प्रतिशत तक पहुँच गया था।
  • संयुक्त ज़िला शिक्षा सूचना प्रणाली (UDISE) 2019-20 की रिपोर्ट के अनुसार, जैसे-जैसे लडकियाँ प्राथमिक से उच्च शिक्षा की और बढ़ती हैं उनकी संख्या में गिरावट आती है। इस दिशा में विशेष ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है।

ड़कियों के विद्यालय छोड़ने के प्रमुख कारण

  • ग्रामीण क्षेत्र में लड़कियों के विद्यालय छोड़ने के विविध कारण हैं एक अनुमान के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग 31.9 प्रतिशत बालिकाएँ घरेलू गतिविधियों में संलग्न रहने के कारण, 18.4 प्रतिशत बालिकाएँ आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण, 15.3 प्रतिशत बालिकाएँ शिक्षा में रुचि नहीं होने के कारण तथा 12.4 प्रतिशत बालिकाएँ विवाह हो जाने के कारण विद्यालय छोड़ देती हैं। ऐसा अनुमान है कि केवल महामारी के कारण एक करोड़ से अधिक लडकियाँ विद्यालय छोड़ने के लिये बाध्य हैं।
  • लड़कियों के विद्यालय छोड़ने में गरीबी और स्कूली शिक्षा की निम्न गुणवत्ता के अतिरिक्त लैंगिक पूर्वाग्रह एवं पुरातन सामाजिक मानदंड भी प्रमुख कारण हैं। प्राप्त आँकड़ों के अनुसार वे राज्य जहाँ बड़ी संख्या में लड़कियों का विवाह 18 वर्ष की उम्र से पूर्व कर दिया जाता है, उन राज्यों में बालिकाओं की विद्यालय छोड़ने की दर उच्च्तम है। बालिकाओं के लिये विद्यालय की पसंद, निजी ट्युशन तक पहुँच एवं उच्च शिक्षा में अनुशासन में भी लैंगिक पूर्वाग्रह परिलक्षित होता है।
  • राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2017-18 के अनुसार, उच्च माध्यमिक स्तर पर 24 प्रतिशत लड़कियाँ तथा 28 प्रतिशत लड़के निजी विद्यालयों में जाते हैं। इस स्तर पर लड़कियों पर औसत वार्षिक घरेलू खर्च लड़कों की तुलना में 2,860 रुपए कम है। यह शिक्षा में लैंगिक विभेद को दर्शाता है।
  • भारत में व्यावसायिक पाठ्यक्रमो पर आने वाली औसत वार्षिक लागत (50000 रुपए) साधारण स्नातक कार्यक्रमों पर आने वाली औसत वार्षिक लागत (8000 रुपए) की तुलना में बहुत अधिक है। .आई.एस.एच.. 2019-20 के अनुसार, उच्च शिक्षा में दाखिला लेने वाली लड़कियों में मात्र 28.5 प्रतिशत ही इंजीनियरिंग जैसे व्यावसायिक पाठ्क्रमों में दाखिला लेती हैं, जबकि 52 प्रतिशत लडकियाँ सामान्य स्नातक पाठ्यक्रम में दाखिला लेती हैं।

      िक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिये सरकार द्वारा प्रयास 

      • सरकार ने शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी बढाने के उद्देश्य से कई महत्त्वपूर्ण प्रयास किये है माध्यमिक शिक्षा में लड़कियों की भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य से माध्यमिक शिक्षा के लिये लड़कियों को प्रोत्साहन देने की राष्ट्रीय योजना (NSIGSE) को प्रारंभ किया गया है। इस योजना के अंतर्गत कक्षा 8 पास करके 9 में नामांकन कराने वाली छात्राओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाएगी।
      • भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) में महिलाओं के लिये सीटों की संख्या में वृद्धि की गई है। तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने वाली छात्राओं को प्रोत्साहन प्रदान करने के उद्देश्य से अखिल भारतीय तकनीक शिक्षा परिषद् (AICTE) द्वाराप्रगतिछात्रवृत्ति योजना प्रारंभ की गई है।  
      • राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020 में बालिकाओं एवं महिलाओं की शिक्षा में भागीदारी बढ़ाने के उद्देश्य सेजेंडर समावेशी कोषकी स्थापना की गई है। यह कोष राज्यों को उपलब्ध कराया जाएगा। इससे राज्यों को महिलाओं के लिये विद्यालय परिसर में अधिक स्वस्थ एवं सुरक्षित वातावरण प्रदान करने के लिये नीतियों, योजनाओं एवं कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में सहायता मिलेगी। 
      • इसके अतिरिक्त, सरकार द्वारा बेटी बचाओ-बेटी पढाओ योजना, कस्तूरबा गाँधी बालिका विद्यालय तथा विद्यालयों की आधारभूत संरचना में सुधार( बालिकाओं के लिये अलग शौचालय) जैसे महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं।

      गे की राह

      • विद्यालयों में लड़कियों का नामांकन बढ़ाने तथा उनके ड्रॉप-आउट को कम करने के लिये कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
      • प्रत्येक क्षेत्र में स्थानीय आपदा प्राधिकरण और राज्य सरकार की अनुमति से एक मोहल्ला स्कूल अथवा एक सामुदायिक शिक्षण कार्यक्रम को उपयुक्त कोविड मानदंडों के साथ प्रारंभ किया जाना चाहिये।
      • इबोला महामारी के बाद किये गए अध्ययनों से ज्ञात होता है कि शैक्षिक गतिविधियों के साथ निरंतर जुड़ाव से ड्रॉप-आउट में कमी आती है।
      • नीति आयोग के द्वारा नागरिक समाज संगठनों की सहायता से 28 आकांक्षी ज़िलों मेंसक्षम बिटियानामक सामुदायिक कार्यक्रम प्रारंभ किया गया था। 
      • इसके अंतर्गत 1.87 लाख से अधिक छात्राओं को सामाजिक-भावनात्मक और नैतिक शिक्षा में प्रशिक्षित किया गया था। इस तरह की पहलों को दोहराया जाना चाहिये ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि महामारी की अवधि में बलिकाओं की शिक्षा में व्यवधान न उत्पन्न हों।
      • संभावित ड्रॉप-आउट को रोकने के उद्देश्य से एक एटलस का विकास किया जाना चाहिये। इसमें ऐसे संकेतकों को शामिल  किया जाए जो स्कूल छोड़ने के प्रमुख कारणों में शामिल हों। 
      • शिक्षकों को उन सभी छात्रवृत्तियों और योजनाओं के बारे में प्रशिक्षित किया जाना चाहिये, जो लड़कियों और उनके परिवारों को उनकी शिक्षा जारी रखने के लिये आर्थिक सहायता प्रदान करती हैं।
      • ड्रॉप-आउट और कम उम्र में बाल विवाह वाले  राज्यों में माध्यमिक शिक्षा के लिये लड़कियों को प्रोत्साहन की राष्ट्रीय योजना को संशोधित करने की आवश्यकता है। इसके अंतर्गत छात्रवृत्ति की राशि में वृद्धि की जाए जिससे उनको स्नातक स्तर की पढ़ाई पूरी करने के लिये प्रोत्साहन मिल सके। इसके साथ ही छात्रों को उनकी स्नातक डिग्री के प्रत्येक वर्ष के सफल समापन पर वार्षिक छात्रवृत्ति का भुगतान की प्रणाली का प्रयोग भी किया जा सकता है। 
      • परंपरागत रूप से शिक्षा में पिछड़े क्षेत्रों मेंविशेष शिक्षा क्षेत्रस्थापित किये जाने चाहिये। ऐसे पंचायत क्षेत्र जिनमे बालिकाओं के बीच में ही विद्यालय छोड़ने की प्रवृत्ति देखी जा रही है उनमें उच्च माध्यमिक (कक्षा I-XII) तक संयुक्त विद्यालय का निर्माण किया जाना चाहिये।               
      • लड़कियों को शिक्षा प्राप्त करने से रोकने में सामाजिक पूर्वाग्रहों और रूढ़िवादी सांस्कृतिक मानदंडों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है। ये विधान लड़कियों को उनकी क्षमता के अनुरूप शिक्षा प्राप्त करने से रोकते हैं। ऐसी सामाजिक एवं रुढ़िवादी कुरीतियों से निपटने के लिये गैर सरकारी संगठनों की सहायता से राज्यों में बिहेवियरल इनसाइट्स यूनिट्स (BIU) की स्थापना की जा सकती है। आकांक्षी ज़िलों में पोषण एवं स्वास्थ्य चुनौतियों से निपटने के लिये बी.आई.यू. की स्थापना करके नीति आयोग ने इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयास किया है।  

      िष्कर्ष

      लिंग आधरित सामाजिक और सांस्कृतिक भेदभाव के कारण महिला शिक्षा हतोत्साहित हुई है। इसका स्पष्ट प्रमाण महिला साक्षरता दर का 65.46 प्रतिशत (जनगणना 2011 के अनुसार) होना है। कोविड महामारी के कारण उपजे संकट ने इस समस्या को और भी गंभीर किया है। हालाँकि सरकार के प्रयासों एवं सामाजिक सहयोग से इस चुनौती को अवसर में बदला जा सकता है तथा महिला शिक्षा के लिये एक उत्तम वातावरण प्रदान करके महिला शिक्षा में सुधार किया जा सकता है।

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