धन-शोधन निवारण अधिनियम के प्रावधानों को चुनौती

संदर्भ

सर्वोच्च न्यायालय छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा धन शोधन निवारण अधिनियम (Prevention of Money Laundering Act : PMLA ), 2002 के प्रावधानों को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है।

हालिया वाद क्या है

  • याचिकाकर्ता द्वारा कुछ धाराओं पर सवाल उठाया गया है जो कथित तौर पर अनुच्छेद 20(3) के तहत आत्म-दोषसिद्धि के विरुद्ध संवैधानिक संरक्षण का उल्लंघन करती हैं।
  • पी.एम.एल.ए. के तहत, प्रवर्तन निदेशालय (Enforcement Directorate : ED) जाँच के दौरान व्यक्तियों को समन भेज सकता है और बयान दर्ज कर सकता है।
  • दिए गए बयान न्यायालय में स्वीकार्य होते हैं, जबकि सामान्य आपराधिक कानून में पुलिस द्वारा दिए गए बयान मजिस्ट्रेट के समक्ष दिए गए बयानों के अलावा स्वीकार्य नहीं होते हैं।
  • याचिकाकर्ता का तर्क है कि इससे अभियुक्तों को अपने विरुद्ध साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया जाता है, जो अनुच्छेद 20(3) का उल्लंघन है।

पी.एम.एल.ए., 2002 : एक अवलोकन

इसे धन शोधन पर अंकुश लगाने और अपराध की आय को जब्त करने के लिए अधिनियमित किया गया तब से इसे कई बार संशोधित (विशेष रूप से वर्ष 2019 में) भी किया गया है।

अपराध से प्राप्त आय का विस्तार 

  • इसमें भारत के बाहर अर्जित संपत्ति भी शामिल।
  • अपराध से हुई किसी भी मूल्य समतुल्य संपत्ति (value equivalent property) को भी जब्त किया जा सकता है, भले ही वह भारत में न हो।
  • इससे ED को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संपत्ति जब्त करने की कानूनी शक्ति मिली।

ED की जांच शक्ति में वृद्धि 

  • ED के समक्ष दर्ज बयान को अदालत में मान्य साक्ष्य माना गया।
  • ED को किसी व्यक्ति को समन करने तथा जाँच करने की शक्ति अधिक लचीली और व्यापक बनाई गई
  • अब अंतरिम कुर्की की अवधि में भी अपराध से अर्जित संपत्ति को तेजी से जब्त किया जा सकता है।

अधिसूचित अपराध श्रेणी का विस्तार 

  • अधिक कानूनों/अपराधों को अधिसूचित अपराध श्रेणी की सूची में जोड़ा गया, जिससे PMLA का दायरा बढ़ा।
  • उदाहरण: कंपनी एक्ट के गंभीर अपराध, बैंकों/वित्तीय संस्थानों से जुड़ी धोखाधड़ी, आदि।

अभियोजन और परीक्षण प्रक्रिया

  • जांच और मुकदमे की प्रक्रिया को तेज करने के लिए प्रावधान।
  • स्पेशल कोर्ट के अधिकार स्पष्ट किए गए।
  • ED को जाँच  के दौरान अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों से सहयोग लेने की अनुमति।

भूतलक्षी प्रभाव से लागू

  • संशोधन में कुछ प्रावधानों को पूर्व-प्रभावी (retrospective) रूप से लागू किया गया, जिससे पुराने मामलों पर भी नए नियम लागू हो सकें।

संबंधित मुद्दे

  • याचिकाकर्ता के अनुसार पी.एम.एल.ए. की धारा 50 और 63 असंवैधानिक हैं और संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती हैं। 
  • अधिनियम की धारा 50(2) और 50(3) के तहत ढाँचा संविधान के अनुच्छेद 20(3) द्वारा प्रदत्त आत्म-दोषसिद्धि के विरुद्ध मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।
  •  ये प्रावधान प्रवर्तन निदेशालय को दंड की धमकी देकर किसी भी व्यक्ति को तलब करने, जवाब देने और दस्तावेज़ प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने की अनुमति देते हैं।
  • विजय मदनलाल चौधरी बनाम भारत संघ (2022) वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने पी.एम.एल.ए. के अधिकांश प्रावधानों को बरकरार रखा, लेकिन प्रवर्तन निदेशालय की व्यापक शक्तियों को लेकर आलोचना बनी हुई है।
  • वर्तमान में आर्थिक अपराधों से निपटने में ‘राज्य के हित बनाम व्यक्ति के मौलिक अधिकारों’ के बीच संतुलन विमर्श का विषय है।

यह भी जानें!

आत्म दोष-सिद्धि : संवैधानिक प्रावधान

  • अनुच्छेद 20(3): किसी भी अपराध के आरोपी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाह बनने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।
  • यह गवाही देने की बाध्यता से सुरक्षा प्रदान करता है जो अनुच्छेद 21 के तहत निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से जुड़ा है।
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