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बढ़ती आय असमानता : आवश्यक उपाय

  • 6th April, 2021

(प्रारंभिक परीक्षा- अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ;  मुख्य परीक्षा : सामान्य अध्ययन, प्रशनपत्र- 3, विषय- आर्थिक विकास, समावेशी विकास तथा इससे उत्पन्न विषय)

संदर्भ

  • कोविड-19 के कारण भारत सहित पूरे विश्व में आय असमानता लगातार बढ़ती जा रही है।‘ प्यू रिसर्च रिपोर्ट’ के अनुसार, कोविड-19 के कारण भारत में मध्यम वर्ग के 30% लोग गरीबी रेखा से नीचे जा सकते है, वहीं प्रतिदिन 150 रुपए से कम कमाने वालों की संख्या दोगुनी हो सकती है।
  • रिपोर्ट में यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि आय असमानता को कम करने के उपाय नहीं किये गए तो वास्तव स्थिति अनुमानों से कहीं बदतर हो सकती है। विश्व बैंक, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष और अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन जैसे अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने भी महामारी के कारण भारत सहित अन्य कई देशों में बढ़ती असमानताओं के संबंध में चेतावनी जारी की है।

बढ़ती असमानता: भारतीय परिदृश्य

  • भारत में कोविड-19 महामारी से पहले ही आय असमानता की गहरी खाई थी, जिसे महामारी ने और अधिक बढ़ा दिया। इसके दो प्रमुख कारण रहे, पहला - अर्थव्यवस्था की संवृद्धि दर महामारी से पूर्व ही घट गई थी, जिससे बेरोजगारी, निम्न आय तथा कुपोषण जैसी समस्याओं के कारण व्यापक स्तर पर असमानता बढ़ी।
  • दूसरा, भारत के असंगठित क्षेत्र में सलंग्न श्रमबल को अनेक असुरक्षाओं का सामना करना पड़ा। सर्वाधिक लोग इस क्षेत्र में बेरोजगार हुए। पिछले एक वर्ष में जहाँ एक ओर, असंगठित क्षेत्र में आय एवं रोज़गार में अत्यंत कमी देखी गई, वहीं कॉर्पोरेट क्षेत्र एवं बड़ी कंपनियों ने वित्तीय वर्ष 2020-21 में शुद्ध लाभ अर्जित किया। उदहारणस्वरूप, वित्तीय वर्ष 2020-21 की तीसरी तिमाही में बी.एस.ई.  (BSE) की 200 कंपनियों का शुद्ध लाभ 1.67 ट्रिलियन के उच्च स्तर पर पहुँच गया।
  • निरंतर बढ़ती असमानताओं के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था की रिकवरी K आकार के रूप में हो रही है। विदित है कि K आकार की रिकवरी तब होती है, जब मंदी के बाद किसी अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्र अलग-अलग दर तथा परिमाण में रिकवर होते हैं। इससे अर्थव्यवस्था की संरचना में पर्याप्त बदलाव आता है और आय असमानता भी बढ़ती है।
  • वित्तीय वर्ष 2021 में जी.डी.पी. वृद्धि दर पहली तिमाही (-24%) और दूसरी तिमाही (-7.3%) की तुलना में तीसरी तिमाही (0.4%) में सकारात्मक रही।
  • वित्तीय वर्ष 2022 में जी.डी.पी. वृद्धि दर 10 -11% बढ़ने की संभावना है, किंतु जी.डी.पी. वृद्धि दर के वर्तमान स्तर से ज्ञात होता है कि वित्तीय वर्ष 2020 की तुलना में यह वित्तीय वर्ष 2022 में केवल 1.1% की दर से वृद्धि करेगी।
  • हालाँकि, लॉकडाउन से पहले के स्तर की तुलना में रोज़गार दर अभी भी 2.5% कम है। इसके अतिरिक्त, महामारी के दौरान महिलाएँ अधिक संख्यां में बेरोजगार हुईं और स्वास्थ्य देखभाल तथा शिक्षा के क्षेत्र में असमानताएँ बढ़ी हैं।

असमानता को कम करने के लिये तीन-चरणीय योजना

आय असमानता में कमी, माँग में सुधार के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। इससे उच्च एवं स्थायी आर्थिक विकास के लिये निजी निवेश, उपभोग एवं निर्यात में वृद्धि होती है। असमानता को कम करने के लिये त्रि-आयामी दृष्टिकोण को अपनाया जा सकता है, जो कि निम्नलिखित हैं-

रोज़गार सृजन और आय प्राप्ति पर ध्यान केंद्रित करना

  • समावेशी विकास के लिये गुणवत्तायुक्त रोज़गार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण कारक है। इसके लिये आवश्यक है कि निर्माण सहित आधारभूत अवसंरचना में निवेश के माध्यम से रोज़गार सृजित किया जाए। इस संदर्भ में, बजट 2021 में, केंद्र सरकार ने आधारभूत अवसंरचना के लिये पूँजीगत व्यय हेतु आवंटित धनराशि में वृद्धि की है।
  • रोज़गार क्षेत्र में प्रमुख सात चुनौतियाँ विद्यमान हैं जैसे-
    • प्रतिवर्ष 7-8 मिलियन गुणवत्तायुक्त रोज़गार सृजित करना।
    • श्रम की माँग और आपूर्ति के बीच संतुलन स्थापित करना (भारत में केवल 2.3% कार्यबल ही औपचारिक कौशल में प्रशिक्षित है)।
    • संरचनात्मक परिवर्तन संबंधी चुनौती- इस चुनौती से निपटने के लिये आवश्यक है कि विनिर्माण क्षेत्र पर अधिक ध्यान दिया जाए।
    • प्रवासी श्रमिकों के अधिकारों के संरक्षण हेतु आवश्यक नीतियों को शामिल करते हुए ‘सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों’ और असंगठित क्षेत्र पर विशेष ध्यान देना।
    • स्वचालित उपकरणों और नवीन प्रौद्योगिकी के दौर में पर्याप्त रोज़गार सृजित करना।
    • सभी को सामाजिक सुरक्षा और उपयुक्त कार्य दशाएँ उपलब्ध कराना।
    • ग्रामीण एवं शहरी श्रमिकों की वास्तविक आय बढ़ाना और न्यूनतम आय की गारंटी प्रदान करना।

मानव पूँजी का विकास करना

  • मानव पूँजी के विकास हेतु आवश्यक है कि स्वास्थ्य एवं शिक्षा पर पर विशेष ध्यान दिया। स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जी.डी.पी. का केवल 1.5% है, जिसे बढ़ाया जाना चाहिये। सार्वभौमिक स्वास्थ्य देखभाल सुनिश्चित करने के लिये स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय जी.डी.पी. के 2% -3% तक बढ़ाए जाने की आवश्यकता है।
  • अवसरों की असमानता को कम करने के लिये शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष प्रयास आवश्यक हैं। इन दोनों ही क्षेत्रों में स्पष्ट द्विभाजन दिखाई देता है। जहाँ एक तरफ, देश में ऐसे उत्कृष्ट शैक्षणिक संस्थान हैं, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं, वहीं अनेक बच्चों की प्राथमिक शिक्षा तक भी पहुँच नहीं है। महामारी के दौरान शिक्षा में डिजिटल विभाजन को स्पष्ट रूप से अनुभव किया गया था।

आशिंक रूप से सार्वभौमिक बुनियादी आय को लागू करना

  • संवेदनशील वर्गों में सामाजिक वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिये आशिंक रूप से सार्वभौमिक बुनियादी आय (Quasi-Universal Basic Income) को लागू किया ज सकता है।
  • इस संदर्भ में सी. रंगराजन द्वारा महत्त्वपूर्ण सुझाव दिये गए थे, जैसे- 20 वर्ष से अधिक आयु की सभी महिलाओं के बैंक खातों मे नकद हस्तांतरण; ग्रामीण क्षेत्रों में मनरेगा तथा शहरी क्षेत्रों के लिये एक राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना के अंतर्गत कार्य दिवसों की संख्या का विस्तार करना आदि।
  • चूँकि इन सभी प्रस्तावों में लाभार्थियों की पहचान संबंधी समस्याओं का सामना भी नहीं करना पड़ता, अतः नकद हस्तांतरण तथा विस्तारित गारंटी योजना के माध्यम से ज़रूरतमंदों को आर्थिक सहायता प्रदान की जा सकती है।

आगे की राह

  • उपरोक्त सुझावों के अतिरिक्त, किसानों की आय में वृद्धि करने के लिये लघु एवं सीमांत किसानों के बीच बढ़ती असमानताओं को कम करने की आवश्यकता है। साथ ही, किसान उत्पादक संगठनों को भी मज़बूत किया जाना चाहिये।
  • इसके अलावा, कृषि-विपणन सुधारों में राज्यों को महत्त्वपूर्ण भूमिका प्रदान किये जाने और कृषि उपजों के लिये व्यापार शर्तों में सुधार की आवश्यकता है।
  • मूलभूत आवश्कताओं पर व्यय करने के लिये आवश्यक है कि सरकार कर और गैर-कर राजस्व को बढ़ाए। इसके लिये व्यापक कर आधार के साथ कर/जी.डी.पी. अनुपात को बढ़ाया जा सकता है, जिसमें अमीर वर्ग पर अधिक कर आरोपित करना होगा।
  • इसी प्रकार, केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय असमानताओं को भी कम किया जाना चाहिये। आधारभूत ढाँचे पर पूँजीगत व्यय और स्वास्थ्य, शिक्षा एवं सामाजिक सुरक्षा पर व्यय के लिये राज्यों के बजट में वृद्धि की जानी चाहिये।

निष्कर्ष

  • बढ़ती आर्थिक एवं सामाजिक असमानताएँ समावेशी विकास में बाधक हैं। अतः इसे समाप्त करने के लिये ठोस कदम उठाए जाने की तत्काल आवश्यकता है। इसके लिये आर्थिक कारकों के साथ-साथ मज़बूत लोकतंत्र तथा विकेंद्रीकरण जैसे गैर-आर्थिक कारक भी महत्त्वपूर्ण हैं।
  • राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक क्षेत्र में असमानता कहीं न कहीं विकास के असमान वितरण का कारण बनती है। अतः ऐसे अवसरों को तलाशना होगा, जिनसे शक्तियाँ समान रूप से विकेंद्रीकृत हों सकें। वैश्विक महामारी के दौर में, उच्च एवं स्थायी आर्थिक विकास और वैश्विक भलाई के लिये आर्थिक-सामाजिक असमानता का समाधान अत्यंत आवश्यक है।
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