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सामाजिक सुरक्षा सहिंता, 2019: समय की माँग

(प्रारम्भिक परीक्षा आर्थिक और सामाजिक विकास- सत् विकास सामाजिक क्षेत्र में की गई पहल)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-2 सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिये हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय)

चर्चा में क्यों?

हाल ही में, संसदीय स्थाई समिति द्वारा सामाजिक सुरक्षा सहिंता, 2019 पर अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष श्री ओम बिरला को सौंपी गई है। यह समिति बीजू जनता दल के वरिष्ठ सांसद भृतहरि महताब की अध्यक्षता में गठित की गई थी।

समिति की प्रमुख अनुशंसाएँ

  • रोज़गार की समाप्ति के पश्चात कर्मचारियों को ग्रेच्युटी के भुगतान की समय सीमा को मौजूदा पांच वर्ष से घटाकर केवल एक वर्ष किया जाना चाहिये।
  • ग्रेच्युटी के प्रावधान का विस्तार सभी श्रेणी के कर्मचारियों तक किया जाना चाहिये। जिनमें ठेका मज़दूर, मौसमी मज़दूरों (Seasonal Workers) , निश्चित अवधि के लिये कर्मचारी और दैनिक कर्मचारी शामिल हैं।
  • अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिकों का प्रावधान सहिंता में एक अलग श्रेणी के रूप में किया जाना चाहिये।
  • समिति द्वारा राज्य सरकारों को काम के घंटे बढ़ाने (8 से 12 घंटे) के लिये सुझाव दिया गया है।
  • श्रमिकों के लिये विशेष रूप से एक कल्याण कोष बनाया जाना चाहिये। इस कोष का वित्तपोषण फण्ड प्राप्त करने वाले राज्यों, ठेकेदारों, प्रमुख नियोक्ताओं, और पंजीकृत प्रवासी श्रमिकों द्वारा आनुपातिक रूप से किया जाना चाहिये।
  • इस कोष का उपयोग विशेष रूप से उन श्रमिकों या कर्मचारियों के लिये किया जाना चाहिये, जो किसी अन्य कल्याणकारी फण्ड के अंतर्गत नहीं आते हैं।
  • एक केंद्रीय ऑनलाइन पोर्टल और पंजीकृत प्रतिष्ठानों के साथ प्रवासी श्रमिकों का डाटाबेस बनाया जाना चाहिये, जिसमें भवन और अन्य निर्माण कर्मचारी भी शामिल होने चाहिये।
  • यह कृषि और गैर-कृषि श्रमिक तथा अनुबंधित कर्मचारियों के साथ-साथ स्व-नियोजित श्रमिकों का पंजीकरण कई संगठनों के बजाय एक निकाय के अंतर्गत किया जाना चाहिये, जो देश में सभी प्रकार के श्रमिकों के लिये सामाजिक सुरक्षा सम्बंधी प्रावधानों के लिये उत्तरदायी हो।
  • श्रम समवर्ती सूची का विषय है। नियमों और कानूनों में जहाँ भी टकराव की स्थिति उत्पन्न होगी वहां केंद्र के नियम और कानून राज्यों पर बाध्य होंगे
  • राज्यों के मध्य भवन तथा निर्माण श्रमिक कल्याण कोष की पोर्टेबिलिटी हेतु एक सक्षम तंत्र का प्रावधान किया जाना चाहिये। ताकि लाभार्थियों को किसी भी राज्य में धनराशि का सुगमता से भुगतान किया जा सके।

सामाजिक सुरक्षा सहिंता, 2019

  • सामाजिक सुरक्षा सहिंता, 2019 पिछले वर्ष दिसंबर में लोकसभा में पेश किया गया था। लेकिन इसके कुछ प्रावधानों पर चिंताएँ जताई गईं, जिसके कारण विधेयक को स्थायी समिति के पास भेजा गया था।
  • यह सहिंता सामाजिक सुरक्षा से सम्बंधित नौ कानूनों को प्रतिस्थापित करने के साथ ही यह सामाजिक सुरक्षा और इससे सम्बंधित मुद्दों को कानून में संशोधन और समेकन पर केंद्रित है।

प्रमुख चुनौतियाँ

  • श्रमिकों से सम्बंधित योजनाओं तथा कानूनों में अस्पष्टता तथा दोहराव की समस्या बनी हुई है।
  • भारत की अधिकांश श्रम शक्ति असंगठित क्षेत्र में है, जो एक बेहतर भविष्य की कामना रखते हैं। केंद्र द्वारा राज्यों को इस क्षेत्र के लिये दिया जाने वाला कम योगदान एक प्रमुख समस्या है।
  • विधयेक में कुछ प्रावधानों को पुराने कानूनों से ज्यों का त्यों प्रतिस्थापित कर दिया गया है, जिसका कोई कारण तथा समाधान इस नए विधेयक में नहीं दिया गया है।

आगे की राह

  • राज्यों के मध्य अधिक समानता लाने के लिये एक मॉडल कम्पोज़िट स्कीम का अपनाया जाना अनिवार्य है, जिसमें शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, वृद्धावस्था, विकलांगता, पेंशन आदि विषय शामिल किये जाने चाहिये।
  • केंद्रीय डाटाबेस को प्रवासी श्रमिकों, जिसमें निर्माण और स्वरोज़गार श्रमिक भी शामिल हैं, के डाटाबेस के साथ जोड़ा जाना चाहिये। ताकि अगर कोई श्रमिक स्थान परिवर्तित करता है, तो उसका विवरण डाटाबेस और पोर्टेबिलिटी लाभ में स्वतः ही अपडेट हो जाए।
  • समिति की अनुसंशाओं में अनुबंधित श्रमिकों की परिभाषा को और स्पष्ट और विस्तारित किये जाने की आवश्यकता है साथ ही इनके लिये सामाजिक सुरक्षा प्रावधानों के लाभों की पहुँच को सुनिश्चित किया जाना चाहिये।

निष्कर्ष

  • कोविड-19 महामारी के दौर में लॉकडाउन की संकटग्रस्त परिस्थितियों में श्रमिकों के प्रवास के चलते राष्ट्रीय स्तर के डाटाबेस की आवश्यकता और महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसलिये तात्कालिक रूप से डाटाबेस का निर्माण कर श्रमिक लाभों को शीघ्र अंतरित किये जाने की आवश्यकता है साथ ही निजी और सार्वजानिक क्षेत्र में रोज़गार सुरक्षा पर भी ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिये।
  • सरकार को लम्बे समय से लम्बित संरचनात्मक मुद्दों पर ध्यान देना चाहिये और मौजूदा श्रम कानूनों को वास्तव में सरल बनाने के अपने वादे को पूरा करना चाहिये।
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