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अमेरिका चीन गतिरोध: नए शीतयुद्ध की आहट 

(मुख्य परीक्षा: सामान्य अध्ययन प्रश्न पत्र-2, अंतर्राष्ट्रीय संबंध, भारत के हितों पर विकसित तथा विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव)

संदर्भ

विगत कुछ वर्षों में अमेरिका- चीन संबंधों में तनाव में वृद्धि देखी गई है। कोविड-19 के संक्रमण को लेकर भी दोनों देशों के मध्य आरोप-प्रत्यारोप का लंबा दौर चला। विश्व की इन दो महत्त्वपूर्ण शक्तियों के मध्य तनाव एवं बढ़ते गतिरोध को नए शीतयुद्ध के रूप में देखा जा रहा है। 

शीत युद्ध से तात्पर्य

  • शीतयुद्ध महाशक्तियों के मध्य ‘शांतिकाल में बिना हथियारों के चलने वाला युद्ध’ है। इसे कूटनीतिक युद्ध के रूप में भी जाना जाता है। यह वैचारिक घृणा एवं राजनीतिक अविश्वास पर आधारित होता है।
  • इस युद्ध में न तो हथियारों का प्रयोग होता है और न ही यह युद्ध रणभूमि में लड़ा जाता है। यह युद्ध लोगों के दिमाग में चलता है, अतः इसे मनोवैज्ञानिक युद्ध भी कहा जाता है।

मेरिका-चीन संबंधों में कटुता

  • विगत वर्षों में, अमेरिका एवं चीन के संबंधों में कटुता आई है। चीन एवं अमेरिका, दोनों पहले से ही व्यापार, प्रौद्योगिकी एवं समुद्र विवादों का सामना करने के साथ ही एक दूसरे के प्रति शत्रुतापूर्ण व्यवहार कर रहे हैं।  अमेरिका ने चीन की ऋण कूटनीति, सैन्य विस्तारवाद, मानवाधिकारों के उल्लंघन एवं अघोषित व्यापार युद्ध का सदैव विरोध किया है।
  • कोविड-19 महामारी ने दोनों देशों के मध्य कटुता को और बढ़ा दिया है। गौरतलब है कि पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कोविड-19 महामारी की उत्त्पत्ति वुहान में बताते हुए उसे चीनी वायरस कहकर संबोधित किया तथा चीन से सभी रिश्ते समाप्त करने एवं मुआवजा वसूल करने की धमकी दी।
  • साथ ही, अमेरिका ने देश में काम करने वाले चीनी पत्रकारों पर वीज़ा प्रतिबंध लगाया तथा उनकी कार्य अवधि को 90 दिन तक सीमित कर दिया।
  • इसके अतिरिक्त, अमेरिका ने पिछले वर्षराष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम वाली कंपनियों’ (हुआवेई और जेडटीई) द्वारा बनाए गए दूरसंचार उपकरणों का उपयोग करने के संदर्भ में अमेरिकी कंपनियों पर प्रतिबंध एक और वर्ष के लिये बढ़ा दिया है।
  • चीन के द्वारा भी अमेरिका की खामियों का लाभ उठाने का हर संभव प्रयास किया जाता रहा है। कोविड-19 को रोकने में पूर्व राष्ट्रपति के गलत तरीके, कैपिटल हिल हिंसा आदि का इस्तेमाल चीन ने स्वयं को सामाजिक और आर्थिक मॉडल के तौर पर प्रदर्शित करने के लिये किया।

          ीतयुद्ध के तत्त्व

          • अमेरिका एवं चीन दुनिया के दो शक्तिशाली देश हैं। इनमें अमेरिका उदारवादी लोकतंत्र का समर्थक है, जबकि चीन स्पष्ट रूप से साम्यवादी विचारधारा को मानता है।
          • दोनों ही देश सर्वोच्चता सिद्ध करने के लिये प्रतियोगिता कर रहे हैं। इनके बीच वैश्विक प्रभुत्व के लिये संघर्ष दशकों तक जारी रहने की संभावना है।
          • दोनों देशों के मध्य हो रही प्रतिस्पर्धा के कारण विश्व के दो गुटों में विभाजित होने की संभावना है। हालाँकि, दोनों देशों में कोई भी स्पष्ट सैन्य टकराव नहीं चाहता है।            

          ीनी विदेश नीति एवं अमेरिका

          चीनी विदेश नीति के दृष्टिकोण को तीन चरणों में समझा जा सकता है-

            प्रथम चरण (1989-2008) में चीन की रणनीति अमेरिकी शक्ति को कम करके उसे चीन को नुकसान पहुँचाने से रोकने की थी। 

          इस अवधि में चीन ने खुद को बचाने के उद्देश्य से अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में भागीदारी की, आर्थिक गतिविधियों का विस्तार किया, पनडुब्बी से लेकर मिसाइलों तक उसके हथियार अमेरिका से संघर्ष के उद्देश्य से प्रेरित थे तथा अपनी छवि में सुधार के लिये वैश्विक राजनीति में भाग लिया।

          वर्ष 2009 के पश्चात, विशेषतः वैश्विक वित्तीय संकट के प्रारंभ के साथ चीन ने बिल्डिंग मोड में काम किया। उसने स्वयं के अंतर्राष्ट्रीय संस्थान बनाए, सेना की आक्रामकता पर बल दिया तथा स्वयं को राजनीतिक रूप से सुदृढ़ किया।

          वर्तमान में चीन विस्तारवादी चरण में प्रवेश कर चुका है। अब यह सभी क्षेत्रीय विवादों को हल करने, दुनिया  में आधार हासिल करने, अमेरिका को एशिया से बेदखल करने तथा अपेक्षाकृत अधिक उदार छवि निर्मित करने के लिये प्रयत्नशील है। चीन के आर्थिक, सैन्य एवं राजनीतिक क्षेत्रों में कार्य इन्हीं उद्देश्यों को ध्यान में रखकर किये जा रहे हैं। 

          मेरिका एवं चीन के मध्य गतिरोध तथा भारत

          • अमेरिका एवं चीन के मध्य गतिरोध का एक मंच एशिया भी है। इससे भारत के भी प्रभावित होने की संभावना है। चीन की आर्थिक नीतियाँ एवं बढती सैन्य शक्ति तथा एशिया में अमेरिका की उपस्थिति भारत के लिये चुनौती प्रस्तुत कर सकती है।
          • अमेरिका को चीन के विरुद्ध एशिया एवं हिंद -प्रशांत में मित्रों की आवश्यकता है। अमेरिका की अगुआई में निर्मित क्वाड गठबंधन को इसी दिशा में एक प्रयास माना जा सकता है। अमेरिका इस क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति को अपने मित्रों के माध्यम से संतुलित तरीके से रोकना चाहता है।        

          निष्कर्ष 

          वर्तमान में अमेरिका एवं चीन के मध्य गतिरोध अवश्य है, परंतु इसे शीतयुद्ध की संज्ञा देना उपयुक्त नहीं होगा। अमेरिका एवं सोवियत संघ के मध्य शीतयुद्ध की परिस्थितियों की तुलना में वर्तमान परिस्थितियों में भिन्नता है। अतः वर्तमान परिस्थितियों को अमेरिका एवं चीन के मध्य संबंधों के उतार-चढ़ाव के रूप में देखना अधिक प्रासंगिक होगा।

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