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16वीं शताब्दी के शिलालेख

संदर्भ 

  • आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले में स्थित शेषाचलम पर्वतमाला के घने जंगल एक बार फिर इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गए हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की एक विशेषज्ञ टीम ने सदाशिवकोना नामक प्राचीन तीर्थस्थल से 16वीं शताब्दी के तीन दुर्लभ शिलालेख खोजे हैं। यह खोज न केवल विजयनगर साम्राज्य के इतिहास पर नई रोशनी डालती है, बल्कि क्षेत्र के धार्मिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक स्वरूप को समझने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

दुर्गम जंगलों के बीच मिली ऐतिहासिक धरोहर 

  • सदाशिवकोना शेषाचलम के घने वन क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन और अपेक्षाकृत कम ज्ञात धार्मिक स्थल है। हाल ही में नल्लामाला क्षेत्र में किए गए सफल शिलालेखीय सर्वेक्षण के बाद एएसआई ने अपना ध्यान शेषाचलम की पर्वतमालाओं की ओर केंद्रित किया। 
  • इस अभियान के दौरान प्राप्त तीनों शिलालेखों ने इतिहास के ऐसे अध्यायों को सामने लाया है, जिनके बारे में अब तक सीमित जानकारी उपलब्ध थी।

शेषाचलम के शिलालेख के बारे में 

  • खोजे गए शिलालेखों की सबसे उल्लेखनीय विशेषता यह है कि इनमें तेलुगु, तमिल और कन्नड़ तीनों भाषाओं का प्रयोग किया गया है। 
  • इनकी लिपि और भाषा के अध्ययन से विशेषज्ञों ने इन्हें 16वीं शताब्दी का बताया है। 
  • शिलालेखों में उल्लिखित तिथि 31 जुलाई 1554 ईस्वी पढ़ी गई है, जो इन्हें विजयनगर साम्राज्य के राजा सदाशिवराय के शासनकाल से जोड़ती है। 
  • संरक्षण और विस्तृत अध्ययन के उद्देश्य से इन अभिलेखों की एस्टैम्पेज (स्याही छाप) तैयार की गई है, ताकि उनके लेखन और ऐतिहासिक विवरणों का गहन विश्लेषण किया जा सके।

शिलालेखों से प्राप्त हुए प्रमाण 

1. सदाशिवराय की तीर्थयात्रा का प्रमाण:

  • मुख्य शिलालेख से पता चलता है कि विजयनगर शासक सदाशिवराय ने सदाशिवकोना स्थित पापविनासा तीर्थ की यात्रा की थी। इसी यात्रा के दौरान उन्होंने वहां एक शिव मंदिर और एक मठ के निर्माण का आदेश दिया था।
  • यह उल्लेख केवल धार्मिक गतिविधियों का प्रमाण नहीं है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि विजयनगर शासक दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में स्थित तीर्थस्थलों के संरक्षण तथा विकास में विशेष रुचि रखते थे। 
  • शिलालेख से यह भी स्पष्ट होता है कि सदाशिवराय ने व्यक्तिगत रूप से इस पवित्र स्थल पर स्नान किया और धार्मिक दान दिए थे।
  • पुरातत्वविदों के अनुसार, किसी राजा की प्रत्यक्ष तीर्थयात्रा का अभिलेखीय प्रमाण मिलना अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इससे उस स्थल के तत्कालीन महत्व का आकलन किया जा सकता है।

2. गुडिमल्लम मंदिर से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत:

  • शिलालेखों में तिरुपति के निकट स्थित प्रसिद्ध गुडिमल्लम परशुरामेश्वर मंदिर का भी उल्लेख मिलता है। इसमें बताया गया है कि मंदिर की भूमि से प्राप्त करों को बेंडेकेरी के लिंगन्ना वोदया के शिष्य सदाशिव बसवन्ना ओडेया को सौंपा गया था।
  • अभिलेख में यह भी निर्देश दर्ज है कि मंदिर के सेवक प्रतिदिन देवता को भोजन अर्पित करें तथा सदाशिवकोना मंदिर में नियमित धार्मिक अनुष्ठान संपन्न कराएं। इससे तत्कालीन धार्मिक संस्थाओं की प्रशासनिक व्यवस्था और संसाधन प्रबंधन की झलक मिलती है। 

3. भूमि दान और धार्मिक संरक्षण की परंपरा:

  • एक अन्य शिलालेख में उल्लेख मिलता है कि राजा ने बसवन्ना वोदया को भगवान परशुरामेश्वर की पूजा-अर्चना और नित्य नैवेद्य व्यवस्था के लिए दो गांवों में स्थित कई भूखंड दान स्वरूप प्रदान किए थे।
  • यह अभिलेख चेम्भापेरिया के पुत्र पेद्दय्या द्वारा तैयार किया गया था, जो उस समय गुडिमल्लम मंदिर में लेखाकार (गुड़ी करणम) के रूप में कार्यरत थे। यह जानकारी उस युग में मंदिर प्रशासन की सुव्यवस्थित व्यवस्था और धार्मिक संस्थाओं को प्राप्त राजकीय संरक्षण का महत्वपूर्ण प्रमाण प्रस्तुत करती है। 

गुडिमल्लम मंदिर के बारे में 

  • गुडिमल्लम स्थित परशुरामेश्वर मंदिर भारतीय पुरातत्व में विशेष स्थान रखता है। इसे भारत के सबसे प्राचीन शिव मंदिरों में से एक माना जाता है और इसकी स्थापना दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व तक मानी जाती है। 
  • इसके बावजूद यह मंदिर लंबे समय तक व्यापक जनचर्चा से अपेक्षाकृत दूर रहा, जबकि आसपास के कई अन्य धार्मिक स्थल अधिक प्रसिद्ध होते गए। 
  • ऐसे में 16वीं शताब्दी के इन नए शिलालेखों का मिलना इस मंदिर की ऐतिहासिक प्रतिष्ठा को पुनः स्थापित करता है। यह प्रमाणित करता है कि विजयनगर काल में भी यह मंदिर अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक केंद्र था, जहां स्वयं शासक वर्ग दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचता था।  

इतिहास और पुरातत्व के लिए महत्वपूर्ण खोज 

  • सदाशिवकोना में मिले ये शिलालेख केवल कुछ पत्थरों पर उकेरे गए लेख नहीं हैं, बल्कि वे विजयनगर काल की धार्मिक आस्था, प्रशासनिक संरचना, भूमि दान व्यवस्था और सांस्कृतिक बहुलता के जीवंत दस्तावेज हैं। तेलुगु, तमिल और कन्नड़ भाषाओं का एक साथ प्रयोग उस समय दक्षिण भारत में विभिन्न भाषाई समुदायों के बीच मौजूद सांस्कृतिक समन्वय को भी दर्शाता है। 

विजयनगर साम्राज्य के बारे में 

  • विजयनगर साम्राज्य (1336–1646 ईस्वी) मध्यकालीन भारत का एक गौरवशाली और अत्यंत शक्तिशाली हिंदू साम्राज्य था। दक्षिण भारत में स्थित इस साम्राज्य ने लगभग तीन शताब्दियों तक शासन किया और कला, संस्कृति, वास्तुकला और अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास किया।
  • विजयनगर साम्राज्य की स्थापना 1336 ईस्वी में दो भाइयों हरिहर और बुक्का द्वारा की गई थी। वे संत विद्यारण्य के प्रभाव में आए और उन्होंने तुंगभद्रा नदी के तट पर इस साम्राज्य की नींव रखी। 
  • इसकी राजधानी विजयनगर (हम्पी) थी, जिसका अर्थ है विजय का शहर।
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