संदर्भ
हाल ही में नीति आयोग (NITI Aayog) की एक रिपोर्ट ने भारत की सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था की गंभीर स्थिति को उजागर किया है। रिपोर्ट के अनुसार, पिछले एक दशक में लगभग 94,000 सरकारी स्कूल बंद कर दिए गए, अर्थात औसतन प्रतिदिन 25 स्कूल। इसके परिणामस्वरूप सरकारी स्कूलों में 2.26 करोड़ छात्रों का नामांकन घट गया, जबकि कुल छात्र नामांकन में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी 2005 के 71 प्रतिशत से घटकर 2024-25 में 49.24 प्रतिशत रह गई। यह केवल शिक्षा व्यवस्था का प्रशासनिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, समान अवसर और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
सरकारी स्कूलों के बंद होने के प्रमुख कारण
- सरकारी स्कूलों के बंद होने का मुख्य कारण विभिन्न राज्यों द्वारा अपनाई जा रही युक्तिकरण (Rationalisation) की नीति है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 विद्यालयों के युक्तिकरण का समर्थन करती है, किंतु यह स्पष्ट करती है कि इससे पड़ोस के विद्यालय (Neighbourhood School) की अवधारणा प्रभावित नहीं होनी चाहिए।
- इसके बावजूद अनेक राज्यों में विद्यालयों का विलय या बंदी की जा रही है। यह केवल जनसंख्या में कमी या शहरी पलायन का परिणाम नहीं है, बल्कि कई स्थानों पर प्रशासनिक निर्णयों के कारण गरीब एवं ग्रामीण बच्चों की शिक्षा तक पहुँच सीमित हो रही है।
सबसे अधिक प्रभावित राज्य
मध्य प्रदेश
- दिसंबर 2025 में मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग ने पाया कि 7.37 लाख बच्चों का किसी भी विद्यालय में कोई नामांकन रिकॉर्ड नहीं है।
- राज्य के 3,500 से अधिक सरकारी विद्यालयों में एक भी नया प्रवेश नहीं हुआ, जबकि 6,500 विद्यालयों में दस से भी कम छात्रों का नामांकन हुआ।
- राज्य में 11.38 लाख बच्चे ड्रॉप बॉक्स श्रेणी में हैं, 1.23 लाख बच्चे पहले ही पढ़ाई छोड़ चुके हैं, तथा 1.55 लाख बच्चों ने पलायन या विस्थापन के कारण विद्यालय छोड़ दिया है।
उत्तर प्रदेश
- UDISE+ के आँकड़ों के अनुसार, 2018-19 में उत्तर प्रदेश में 1.63 लाख सरकारी विद्यालय थे, जो 2019-20 में घटकर 1.38 लाख रह गए। अर्थात केवल एक वर्ष में 25,000 से अधिक विद्यालयों की संख्या कम हो गई।
जम्मू-कश्मीर
- जम्मू-कश्मीर में युक्तिकरण योजना के अंतर्गत 4,300 से अधिक विद्यालय बंद या विलय कर दिए गए। इसके परिणामस्वरूप अनेक बच्चों को प्रतिदिन 4 से 6 किलोमीटर पैदल चलकर विद्यालय जाना पड़ता है, जो शिक्षा का अधिकार अधिनियम में निहित पड़ोस के विद्यालय की अवधारणा के विपरीत है। साथ ही लगभग 13,000 शिक्षकों के पद रिक्त होने से शिक्षा व्यवस्था और अधिक प्रभावित हुई है।
सरकारी आँकड़े
लोकसभा में प्रस्तुत UDISE+ के आँकड़ों के अनुसार -
- 2014-15 में सरकारी विद्यालयों की संख्या 11.07 लाख थी, जो 2023-24 में घटकर 10.17 लाख रह गई। अर्थात लगभग 89,000 सरकारी विद्यालयों की कमी दर्ज की गई।
- दूसरी ओर, इसी अवधि में निजी विद्यालयों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.31 लाख हो गई।
- ये आँकड़े स्पष्ट करते हैं कि जहाँ सरकारी विद्यालयों की संख्या लगातार घट रही है, वहीं निजी विद्यालयों का विस्तार तेजी से हो रहा है।
सरकारी विद्यालयों के बंद होने के सामाजिक प्रभाव
- सरकारी विद्यालयों में मुख्यतः अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST), अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), गरीब तथा ग्रामीण समुदायों के बच्चे अध्ययन करते हैं। इसलिए विद्यालयों की बंदी का सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं वर्गों पर पड़ता है।
- 2019 के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण (NSS) के अनुसार, मुफ्त शिक्षा तक पहुँच में असमानता बढ़ी है, विशेषकर मुस्लिम, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के परिवारों के लिए। इससे शिक्षा में सामाजिक विषमता और गहरी होती जा रही है।
बालिकाओं की शिक्षा पर प्रभाव
- सरकारी विद्यालयों के बंद होने का सबसे अधिक दुष्प्रभाव बालिकाओं पर पड़ता है। जब निकट का विद्यालय बंद हो जाता है, तो दूर स्थित विद्यालय तक पहुँचने में सुरक्षा, परिवहन और सामाजिक बाधाओं के कारण अनेक परिवार सबसे पहले लड़कियों की पढ़ाई छुड़वा देते हैं।
- इसके अतिरिक्त विद्यालयों के विलय के कारण एक ही शिक्षक को कई कक्षाओं को पढ़ाना पड़ता है, जिससे शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित होती है तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम में निर्धारित शिक्षक-छात्र अनुपात का भी उल्लंघन होता है।
जिम्मेदारी किसकी है?
- लोकसभा में सरकार ने कहा कि शिक्षा समवर्ती सूची (Concurrent List) का विषय है, इसलिए विद्यालयों के संचालन और बंद करने की जिम्मेदारी राज्यों की है। किन्तु यह भी सत्य है कि शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम एक केंद्रीय कानून है। पड़ोस के विद्यालयों की व्यवस्था सुनिश्चित करना केंद्र सरकार की भी जिम्मेदारी है।
- केंद्र सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति के क्रियान्वयन को विभिन्न केंद्रीय योजनाओं की वित्तीय सहायता से जोड़ती है तथा अन्य नीतिगत मामलों में भी राज्यों की शिक्षा व्यवस्था को प्रभावित करती है। अतः इस समस्या के समाधान की जिम्मेदारी केंद्र और राज्य—दोनों की साझा है।
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम की सीमाएँ
यद्यपि शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2010 से 6 से 14 वर्ष तक के प्रत्येक बच्चे को निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा की गारंटी देता है, फिर भी इसकी कुछ व्यावहारिक सीमाएँ हैं -
- शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त बाध्यकारी प्रावधानों का अभाव।
- गरीब एवं ग्रामीण परिवारों की सीमित कानूनी एवं संस्थागत पहुँच।
- विद्यालय प्रबंधन समितियों (School Management Committees) का अधिकांश स्थानों पर निष्क्रिय होना।
- अधिनियम के प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन में प्रशासनिक कमजोरी।
समाधान एवं आगे की राह
इस समस्या के समाधान के लिए निम्नलिखित कदम आवश्यक हैं-
- पड़ोस के विद्यालय की अवधारणा को प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
- विद्यालयों के युक्तिकरण से पूर्व स्थानीय परिस्थितियों और सामाजिक प्रभावों का विस्तृत अध्ययन किया जाए।
- रिक्त शिक्षक पदों पर शीघ्र नियुक्तियाँ की जाएँ।
- विद्यालय प्रबंधन समितियों को सक्रिय बनाया जाए।
- ड्रॉपआउट बच्चों की पहचान कर उन्हें पुनः विद्यालयों से जोड़ा जाए।
- शिक्षा पर सार्वजनिक निवेश बढ़ाकर सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता में सुधार किया जाए।
निष्कर्ष
सरकारी विद्यालयों का बड़े पैमाने पर बंद होना केवल प्रशासनिक पुनर्गठन का विषय नहीं है, बल्कि यह भारत की समावेशी शिक्षा व्यवस्था के समक्ष एक गंभीर चुनौती है। यदि यह प्रवृत्ति जारी रही, तो गरीब, ग्रामीण, दलित, आदिवासी तथा विशेष रूप से बालिकाओं की शिक्षा पर दूरगामी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसलिए आवश्यक है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर ऐसी नीतियाँ अपनाएँ, जिनसे शिक्षा का अधिकार, पड़ोस के विद्यालय की अवधारणा तथा समान, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के संवैधानिक लक्ष्य को प्रभावी रूप से सुरक्षित रखा जा सके।