New
Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 21st Sept. 2026, 11:30 AM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 22nd Sept. 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM Hindi Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 21st Sept. 2026, 11:30 AM Hindi Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 22nd Sept. 2026, 8:00 AM English Medium: (Delhi) - GS Foundation (P+M) : 6th Aug 2026 English Medium: (Prayagraj) - GS Foundation (P+M) : 19th Aug 2026, 11:00 AM

किशाऊ (Kishau) बहुउद्देशीय परियोजना

संदर्भ 

  • हाल ही में नई दिल्ली में छह राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए। इसका उद्देश्य लंबे समय से अटकी किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ करना है। 
  • करीब 15,000 करोड़ रुपये की यह परियोजना पिछले आठ वर्षों से मुख्य रूप से लागत-वितरण को लेकर मतभेदों के कारण लंबित थी। अब परियोजना को अंतिम मंजूरी के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल के समक्ष रखा जाएगा। 
  • समझौते पर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों ने हस्ताक्षर किए। यह सहमति केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद बनी, जिसमें छह राज्यों ने परियोजना को आगे बढ़ाने पर सैद्धांतिक सहमति जताई। 

किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना के बारे में 

  • किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना टोंस नदी पर प्रस्तावित एक बड़ी बांध और जलविद्युत परियोजना है। टोंस, यमुना की प्रमुख सहायक नदियों में से एक है। 
  • स्थान: हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के आसपास; परियोजना हिमाचल के सिरमौर जिले और उत्तराखंड के देहरादून जिले में विस्तारित  होगी। 
  • बांध: लगभग 232.6 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी डैम। 
  • जलविद्युत क्षमता: 422 मेगावाट। 
  • बिजली उत्पादन: लगभग 1,476 मिलियन यूनिट स्वच्छ ऊर्जा प्रतिवर्ष। 
  • सिंचाई क्षमता: करीब 97,076 हेक्टेयर क्षेत्र। 
  • जल आपूर्ति: हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश को पेयजल तथा औद्योगिक उपयोग के लिए जल।  
  • कुल जल भंडारण: लगभग 1,786 मिलियन घन मीटर (MCM), जिसमें करीब 1,324 एमसीएम लाइव स्टोरेज होगा।  

इस बांध की आवश्यकता क्यों? 

  • किशाऊ परियोजना ऊपरी यमुना और उसकी सहायक नदियों पर प्रस्तावित तीन प्रमुख जल-संग्रहण परियोजनाओं में से एक है। 
  • इन परियोजनाओं की रूपरेखा मई 1994 में यमुना बेसिन के राज्यों तत्कालीन अविभाजित उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली के बीच हुए समझौते में बनी थी। 
  • बाकी दो परियोजनाएं लखवार और रेणुकाजी हैं, जिनके लिए समझौते हो चुके हैं और उनका कार्यान्वयन चल रहा है। 
  • ऊपरी यमुना में यमुनोत्री ग्लेशियर से लेकर दिल्ली के ओखला बैराज तक लगभग 30,000 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र में पर्याप्त भंडारण सुविधा नहीं होने के कारण इन परियोजनाओं को महत्वपूर्ण माना गया। 
  • जल को संग्रहित करके आवश्यकता के अनुसार नियंत्रित रूप से छोड़ना सिंचाई, पेयजल और नदी के प्रवाह के लिए उपयोगी हो सकता है। 

1994 के समझौते के तहत यमुना जल का बंटवारा 

1994 के समझौते के अनुसार यमुना के लगभग 11.983 अरब घन मीटर (BCM) वार्षिक उपयोग योग्य जल का आवंटन इस प्रकार था:

  • हरियाणा: 5.730 BCM
  • उत्तर प्रदेश: 4.032 BCM
  • राजस्थान: 1.119 BCM
  • दिल्ली: 0.724 BCM
  • हिमाचल प्रदेश: 0.378 BCM 

वर्ष 2000 में उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड के अलग राज्य बनने के बाद तत्कालीन उत्तर प्रदेश के हिस्से के 4.032 BCM को दो भागों में बांटा गया - 

  • उत्तर प्रदेश को 3.721 BCM और उत्तराखंड को 0.311 BCM। 

आठ वर्षों तक समझौता क्यों अटका रहा?

परियोजना को लेकर हिमाचल प्रदेश की मुख्य आपत्तियां दो मुद्दों से जुड़ी थीं।

  • लागत का बोझ: पहले की व्यवस्था के तहत हिमाचल प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने परियोजना में लगभग 800 करोड़ रुपये का योगदान देने पर सहमति जताई थी, जिसका बड़ा हिस्सा बिजली से जुड़े घटक के लिए था। बाद में राज्य की मौजूदा सरकार ने इस व्यवस्था को राज्य के वित्तीय हितों के अनुरूप नहीं माना। 
  • लाभ और नुकसान का असंतुलन: हिमाचल प्रदेश का तर्क था कि उसे बड़े वित्तीय निवेश के साथ-साथ बांध के कारण होने वाले डूब क्षेत्र और विस्थापन का भार उठाना पड़ेगा, जबकि परियोजना से मिलने वाले जल लाभ मुख्य रूप से दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे डाउनस्ट्रीम राज्यों को प्राप्त होंगे। 

2020 की एक व्यवहार्यता रिपोर्ट के अनुसार, परियोजना से करीब 2,950 हेक्टेयर भूमि जलमग्न हो सकती है। इससे हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के 17 गांवों तथा लगभग 5,500 लोगों के प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था।

गतिरोध की समाप्ति  

जून 2026 में केंद्र सरकार ने परियोजना के जल घटक की लागत का 90 प्रतिशत स्वयं वहन करने की घोषणा की। शेष 10 प्रतिशत लागत छह राज्यों द्वारा साझा की जाएगी। हिमाचल प्रदेश की चिंताओं को दूर करने के लिए एक विशेष व्यवस्था भी बनाई गई है। इसके तहत –

  • हिमाचल प्रदेश को मिलने वाला जल हिस्सा दिल्ली और राजस्थान को हस्तांतरित किया जाएगा।
  • इसके बदले दिल्ली और राजस्थान हिमाचल के बिजली घटक से संबंधित लागत का हिस्सा वहन करेंगे।
  • इस बिजली लागत को दिल्ली और राजस्थान के बीच 75:25 के अनुपात में बांटा जाएगा। 
  • हिमाचल प्रदेश को वर्तमान में अपनी अतिरिक्त बिजली की आवश्यकता नहीं होने के कारण उसकी बिजली अन्य राज्यों को उपलब्ध कराई जाएगी और उसके बदले उसे भुगतान मिलेगा।
  • इस व्यवस्था का उद्देश्य परियोजना से मिलने वाले लाभ और राज्यों पर पड़ने वाली लागत के बीच संतुलन स्थापित करना है।

विभिन्न राज्यों को जल लाभ

  • किशाऊ जलाशय से प्रस्तावित भंडारण आवंटन लगभग इस प्रकार है:
    • हरियाणा: 633 MCM
    • उत्तर प्रदेश: 411 MCM
    • राजस्थान: 124 MCM
    • दिल्ली: 80 MCM
    • उत्तराखंड: 34 MCM 
  • हिमाचल प्रदेश का हिस्सा अब अन्य राज्यों को हस्तांतरित किया जाएगा।
  • प्रवाह लाभ के लिहाज से प्रस्तावित हिस्सेदारी में हरियाणा को लगभग 836 क्यूसेक, उत्तर प्रदेश को 543.2 क्यूसेक, राजस्थान को 163.52 क्यूसेक और दिल्ली को 105.28 क्यूसेक शामिल हैं।

यमुना के लिए इसका महत्व 

  • किशाऊ परियोजना का एक प्रमुख उद्देश्य जलाशय में पानी का भंडारण करके उसे नियंत्रित तरीके से छोड़ना और यमुना के प्रवाह को बढ़ाना है। 
  • केंद्र और संबंधित राज्यों ने परियोजना को यमुना के व्यापक पुनर्जीवन प्रयासों से भी जोड़ा है। उम्मीद है कि नियंत्रित अतिरिक्त प्रवाह से नदी में पानी की उपलब्धता बढ़ेगी और सिंचाई, पेयजल तथा बिजली उत्पादन के साथ यमुना के जल-प्रवाह और गुणवत्ता सुधार के प्रयासों को भी मदद मिल सकती है।

आगे की चुनौती 

  • किशाऊ परियोजना पर हुआ समझौता वर्षों से चले आ रहे केंद्र-राज्य और अंतर-राज्यीय मतभेद को दूर करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है। केंद्र की बड़ी वित्तीय हिस्सेदारी और हिमाचल प्रदेश के लिए बनाई गई लागत-लाभ व्यवस्था ने इस गतिरोध को दूर करने में भूमिका निभाई है। 
  • हालांकि, केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद परियोजना के क्रियान्वयन में भूमि डूबने, विस्थापन, पुनर्वास और प्रभावित परिवारों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे महत्वपूर्ण बने रहेंगे। परियोजना से मिलने वाले जल, सिंचाई और ऊर्जा लाभों के साथ इन सामाजिक एवं पर्यावरणीय प्रभावों का उचित समाधान भी सुनिश्चित करना आवश्यक होगा। 
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR
X