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स्मार्ट और हरित खनन की ओर बढ़ता कोल इंडिया

संदर्भ

भारत की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास में कोयले की भूमिका लंबे समय तक महत्वपूर्ण बनी रहने वाली है। इसी जरूरत को ध्यान में रखते हुए कोल इंडिया लिमिटेड (CIL) पारंपरिक खनन पद्धतियों से आगे बढ़कर तकनीक आधारित, सुरक्षित, कुशल और अधिक टिकाऊ खनन व्यवस्था विकसित कर रहा है। भूमिगत (UG) और खुली खदानों (OC) दोनों में आधुनिक मशीनरी के साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), डेटा एनालिटिक्स, ऑटोमेशन और रिमोट मॉनिटरिंग जैसी तकनीकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। 

अन्वेषण से शुरू हुआ तकनीकी बदलाव 

  • खनन की शुरुआत ही अब अधिक सटीक तकनीक के साथ हो रही है। कोयला संसाधनों की पहचान के लिए कोर ड्रिलिंग के साथ 2D और 3D भूकंपीय सर्वेक्षण जैसी नॉन-इनवेसिव तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे बोरहोल की संख्या में उल्लेखनीय कमी लाने में मदद मिली है। स्पेक्ट्रल एनहांसमेंट और मशीन लर्निंग आधारित विश्लेषण के जरिए गामा-रे, घनत्व और प्रतिरोधकता लॉग से कोयला सीमों की बेहतर व्याख्या की जा रही है। 
  • सेंट्रल माइन प्लानिंग एंड डिजाइन इंस्टीट्यूट (CMPDI) रिमोट सेंसिंग, GIS, LiDAR, ड्रोन और बाथिमेट्रिक सर्वेक्षणों को खनन-पूर्व, खनन और खनन-पश्चात गतिविधियों में उपयोग कर रहा है। वहीं, उपग्रह आधारित भू-स्थानिक निगरानी को एआई से जोड़ने की दिशा में भी काम हो रहा है।

खुली खदानों में ऑटोमेशन और सुरक्षा 

  • ओपन-कास्ट खदानों में उच्च क्षमता वाले हेवी अर्थ मूविंग मशीनरी (HEMM) का इस्तेमाल बढ़ रहा है। बड़े इलेक्ट्रिक फावड़े, 240 टन क्षमता वाले डंपर, ड्रैगलाइन और सरफेस माइनर उत्पादन क्षमता बढ़ाने के साथ सुरक्षित और नियंत्रित संचालन में मदद कर रहे हैं। 
  • विस्फोट-मुक्त खनन तकनीक धूल, शोर और कंपन को कम करने के साथ कोयले की गुणवत्ता और रिकवरी में सुधार का अवसर देती है। सुरक्षा के मोर्चे पर ऑपरेटर थकान निगरानी, प्रॉक्सिमिटी अलर्ट, 360-डिग्री कैमरे और स्वचालित आग पहचान एवं दमन जैसी एआई आधारित प्रणालियां एचईएमएम में शामिल की जा रही हैं। एआई सिमुलेटर और वर्चुअल रियलिटी आधारित प्रशिक्षण कर्मचारियों को वास्तविक परिस्थितियों के लिए तैयार करने में मदद कर रहे हैं। 
  • जीपीएस आधारित ट्रक डिस्पैच, पेलोड मॉनिटरिंग और वाहन हेल्थ मॉनिटरिंग से मशीनों की उपयोगिता तथा बेड़े के संचालन में भी सुधार हो रहा है।

भूमिगत खनन में नई संभावनाएं 

  • भूमिगत खदानों में निरंतर खनन, लॉन्गवॉल और हाईवॉल तकनीकों के जरिए उत्पादन बढ़ाने की रणनीति अपनाई जा रही है। खासतौर पर लॉन्गवॉल तकनीक को बड़े पैमाने पर लागू करने पर जोर है। बेहतर गुणवत्ता वाले भूमिगत कोयले की रिकवरी के लिए पेस्ट फिल तकनीक में निवेश की योजना है। इसके साथ बेहतर वेंटिलेशन, ग्राउंड कंट्रोल और संचार प्रणालियों के जरिए सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में काम जारी है।

कोयला निकासी से लेकर प्रसंस्करण तक डिजिटल बदलाव 

  • फर्स्ट माइल कनेक्टिविटी (FMC) परियोजनाएं कोयले की तेज और मशीनीकृत निकासी में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। सीएचपी, साइलो, कन्वेयर और रैपिड लोडिंग सिस्टम को एकीकृत करने वाली परियोजनाओं के जरिए सड़क परिवहन पर निर्भरता कम करने और लॉजिस्टिक्स को अधिक कुशल बनाने का प्रयास किया जा रहा है। महत्वपूर्ण रेलवे परियोजनाओं और हाई-एंगल कन्वेयर जैसी प्रणालियों से खदान के भीतर परिवहन को भी अधिक स्वचालित बनाने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। 
  • कोयला प्रसंस्करण में हेवी मीडिया साइक्लोन, हाइड्रो साइक्लोन, टीटर बेड सेपरेटर, रिफ्लक्स क्लासिफायर और जिग जैसी तकनीकें पहले से उपयोग में हैं। भविष्य में ड्राई बेनिफिशिएशन, एयर टेबल, ड्राई जिगिंग, कोल विनॉइंग और XRT सॉर्टिंग जैसी तकनीकों पर भी जोर बढ़ सकता है।

स्मार्ट माइंस का डिजिटल ढांचा 

  • सीआईएल का डिजिटल परिवर्तन परिचालन प्रौद्योगिकी और एंटरप्राइज आईटी दोनों स्तरों पर आगे बढ़ रहा है। इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सेंटर, आरएफआईडी, वेब्रिज ऑटोमेशन, जीपीएस फ्लीट मॉनिटरिंग और वाहन ट्रैकिंग जैसी प्रणालियां वास्तविक समय में संचालन की निगरानी संभव बना रही हैं। सात खदानों में परीक्षण किए गए DigiCoal समाधानों को आगे मेगा खदानों तक विस्तारित करने की योजना है। 
  • एंटरप्राइज आईटी में SAP S/4HANA, ई-ऑफिस, क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर और डेटा एनालिटिक्स ने खरीद, इन्वेंट्री, वित्त और मानव संसाधन जैसी प्रक्रियाओं को एकीकृत किया है। 

भविष्य: स्वायत्त और कम-कार्बन खनन 

  • अगला चरण अधिक स्वायत्त और कम-कार्बन खनन का है। रिमोट-ऑपरेटेड डोजर, बड़े डीजल-इलेक्ट्रिक डंपरों के लिए इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और ट्रॉली-असिस्ट तकनीक तथा जीवाश्म ईंधन आधारित उपकरणों के सुरक्षित विद्युतीकरण पर काम हो रहा है। भूमिगत खदानों में 5G नेटवर्क, डिजिटल ट्विन और स्वायत्त निगरानी रोवर भविष्य की तकनीकी संरचना का हिस्सा बन सकते हैं। 
  • पर्यावरण निगरानी में रियल-टाइम वायु एवं जल गुणवत्ता मॉनिटरिंग, एआई आधारित धूल पूर्वानुमान, GIS-सैटेलाइट-ड्रोन निगरानी, जीरो लिक्विड डिस्चार्ज और ओवरबर्डन के उपयोग जैसी पहलों पर जोर दिया जा रहा है। 

रिसर्च एंड डेवलपमेंट बनेगा बदलाव का आधार 

  • वित्त वर्ष 2024-25 में सीआईएल के अनुसंधान एवं विकास प्रयासों ने प्रोटोटाइप और उच्च तकनीकी परिपक्वता स्तर वाली परियोजनाओं की ओर गति बढ़ाई। आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी मद्रास और आईआईटी-आईएसएम धनबाद के उत्कृष्टता केंद्रों के साथ मिलकर भूमिगत कोयला गैसीकरण, 5G, स्वदेशी पेरोव्स्काइट सोलर सेल और उन्नत गोफ एज सपोर्ट जैसी परियोजनाओं पर काम किया जा रहा है।
  • वित्त वर्ष 2030 तक आर एंड डी परियोजनाओं और उत्कृष्टता केंद्रों में लगभग ₹1,900 करोड़ निवेश का प्रस्ताव इस तकनीकी बदलाव को और गति दे सकता है। गैसीकरण, बैटरी रीसाइक्लिंग, कोयला-आधारित झिल्लियों, ड्राई कोल बेनिफिशिएशन और एकीकृत कोयला शोधन जैसी तकनीकों पर पायलट परियोजनाएं भविष्य के लिए नए रास्ते खोल सकती हैं।
  • आगे की राह आसान नहीं है। बड़ी पूंजीगत जरूरत, कुशल मानव संसाधन, विविध भू-स्थितियां और वैश्विक तकनीकों को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालना बड़ी चुनौतियां हैं। फिर भी एआई, ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, विद्युतीकरण और हरित तकनीकों का बढ़ता एकीकरण भारतीय कोयला खनन को अधिक सुरक्षित, उत्पादक, डेटा-संचालित और टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है। 
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