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अफानसे निकितिन सीमाउंट: भारत-श्रीलंका विवाद

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: विश्व के भौतिक भूगोल की मुख्य विशेषताएँ, विश्व भर के मुख्य प्राकृतिक संसाधनों का वितरण , स्थान-अति महत्त्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताएँ)

संदर्भ

भारत एवं श्रीलंका में ‘अफानसे निकितिन सीमाउंट’ (समुद्री के नीचे पहाड़) को लेकर विवाद जारी है।

अफानसे निकितिन सीमाउंट (Afanasy Nikitin Seamount) के बारे में 

  • स्थान : मध्य हिंद महासागर में भारत के तट से लगभग 3,000 किमी. और श्रीलंका से 650 मील दूर
  • आकार : 400 किमी. लंबा और 150 किमी. चौड़ा, समुद्र तल से 4,800 मीटर की गहराई से 1,200 मीटर तक ऊँचा
  • खनिज संसाधन : इलेक्ट्रॉनिक्स और स्वच्छ ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण कोबाल्ट, निकल, मैंगनीज एवं तांबे से समृद्ध
  • नामकरण : भारत की यात्रा का दस्तावेजीकरण करने वाले 15वीं सदी के रूसी व्यापारी अफानसे निकितिन के नाम पर। 
    • यह दस्तावेज वर्ष 1958 में सोवियत वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गया।
  • भूगर्भीय विशेषता : ज्वालामुखीय गतिविधि से बना एक समुद्री पर्वत, जो समुद्री जैव विविधता का हॉटस्पॉट है।

Afanasy-Nikitin-Seamount-Location

भारत-श्रीलंका विवाद के बारे में

श्रीलंका का दावा

  • वर्ष 2009 में श्रीलंका ने संयुक्त राष्ट्र महासागर कानून संधि (UNCLOS) के तहत अपनी महाद्वीपीय मंच की सीमा को 200 समुद्री मील से बढ़ाकर 500 समुद्री मील तक विस्तारित करने के लिए आवेदन किया, जिसमें अफानसे निकितिन सीमाउंट शामिल है।
  • श्रीलंका का तर्क है कि सीमाउंट उसकी विस्तारित महाद्वीपीय सीमा के भीतर आता है और यह दावा ‘संयुक्त राष्ट्र महाद्वीपीय मंच सीमा आयोग’ (UN-CLCS) में लंबित है।
  • श्रीलंका ने भारत के अन्वेषण आवेदन पर आपत्ति जताई और यह अनुरोध किया कि UN-CLCS के अंतिम निर्णय तक अंतर्राष्ट्रीय सीबेड अथॉरिटी (ISA) भारत के आवेदन पर विचार न करे।

भारत का दावा

  • जनवरी 2024 में भारत ने ISA को अफानसे निकितिन सीमाउंट में कोबाल्ट-समृद्ध फेरोमैंगनीज क्रस्ट के अन्वेषण के लिए आवेदन किया, जिसमें 15 वर्षों के लिए 3,000 वर्ग किमी. क्षेत्र शामिल है।
  • भारत ने 500,000 डॉलर के शुल्क के साथ आवेदन किया, जिसका उद्देश्य भू-राजनीतिक रणनीति एवं कोबाल्ट की आर्थिक मांग को पूरा करना है। यह विशेष रूप से चीन की इस क्षेत्र में बढ़ती उपस्थिति की प्रतिक्रिया में महत्त्वपूर्ण है।
  • भारत ने शुरू में वर्ष 2010 में श्रीलंका के दावे का समर्थन किया था किंतु वर्ष 2022 में अपनी स्थिति बदलकर यह तर्क दिया कि श्रीलंका का दावा भारत के हितों को नुकसान पहुँचाएगा।

विवाद का भू-राजनीतिक संदर्भ

  • यह विवाद भारत एवं चीन के मध्य हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है, जहाँ भारत इस क्षेत्र में चीन के अनुसंधान जहाजों की गतिविधियों को लेकर चिंतित है।
  • भारत एवं चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा में छोटा द्वीपीय राष्ट्र श्रीलंका फंसा हुआ है जिसके पास सीमाउंट के खनन के लिए तकनीकी-वित्तीय क्षमता की कमी है।
  • अन्वेषण के लिए भारत का आवेदन आंशिक रूप से इस क्षेत्र में रणनीतिक प्रभाव बनाए रखने और कोबाल्ट आपूर्ति पर चीन की निर्भरता को कम करने की आकांक्षा से प्रेरित है।

अंतर्राष्ट्रीय सीबेड अथॉरिटी (ISA) की भूमिका

  • ISA के बारे में : वर्ष 1994 में UNCLOS के तहत स्थापित ISA अंतर्राष्ट्रीय समुद्री तल में खनिज संसाधनों के अन्वेषण व दोहन को नियंत्रित करता है, जो मानवता की साझा विरासत माना जाता है।
  • मुख्यालय : किंग्स्टन, जमैका; भारत व श्रीलंका सहित 169 सदस्य देश।
  • ISA समुद्री पर्यावरण को खनन गतिविधियों से होने वाले नुकसान से बचाने के लिए भी जिम्मेदार है।

ISA की भूमिका विवाद में

  • श्रीलंका ने ISA से भारत के अन्वेषण आवेदन पर विचार न करने का अनुरोध किया है क्योंकि सीमाउंट श्रीलंका के दावे वाले विस्तारित महाद्वीपीय मंच के भीतर है।
  • ISA ने भारत के आवेदन को लंबित रखा है और UN-CLCS श्रीलंका के महाद्वीपीय मंच दावे पर अंतिम निर्णय लेने की प्रतीक्षा कर रहा है।
  • ISA को यह सुनिश्चित करना होगा कि अन्वेषण लाइसेंस केवल उन क्षेत्रों में दिए जाएँ जो किसी देश के विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) या महाद्वीपीय मंच के बाहर हों।

चुनौतियाँ

  • श्रीलंका का वर्ष 2009 का दावा UN-CLCS में 15 वर्षों से लंबित है जिसके कारण क्षेत्रीय अनिश्चितता बढ़ रही है।
  • ISA को पर्यावरणीय चिंताओं को संतुलित करना होगा क्योंकि सीमाउंट खनन से समुद्री पारिस्थितिक तंत्र को नुकसान हो सकता है।
  • भारत का तर्क है कि सीमाउंट अंतर्राष्ट्रीय जल में है जिससे ISA को अन्वेषण की अनुमति देने का अधिकार है, जबकि श्रीलंका का कहना है कि ISA को तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक UN-CLCS का निर्णय नहीं आ जाता है।

महत्त्वपूर्ण पहलू  

  • पर्यावरणीय चिंताएँ : यह सीमाउंट समुद्री जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण हैं और खनन गतिविधियाँ स्थानीय पारिस्थितिक तंत्र को बाधित कर सकती हैं।
  • रणनीतिक महत्व : कोबाल्ट इलेक्ट्रिक वाहनों और नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण है, जिससे क्षेत्रीय व वैश्विक मांग बढ़ रही है।
  • क्षेत्रीय गतिशीलता : भारत की गहरे समुद्र में खनन की महत्वाकांक्षा (जैसे- डीप ओशन मिशन) इस क्षेत्र में इसकी रणनीतिक उपस्थिति को बढ़ाने का हिस्सा है।
  • श्रीलंका की स्थिति : श्रीलंका की आर्थिक एवं तकनीकी सीमाओं के बावजूद वह अपने समुद्री संसाधनों पर संप्रभुता बनाए रखने के लिए दृढ़ है।
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