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अनाइमंगलम ताम्रपत्र

संदर्भ 

  • हाल ही में नीदरलैंड से चोल काल की प्रसिद्ध अनाइमंगलम ताम्रपत्र भारत वापस लाई गई हैं। इतिहासकारों और पुरातत्वविदों ने इसे भारत की सांस्कृतिक धरोहर की वापसी के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया है। लगभग दो सौ वर्षों से ये ताम्रपत्र नीदरलैंड के लीडेन विश्वविद्यालय में सुरक्षित थीं और इन्हें लीडेन तांबे की प्लेटें कहा जाता था। 

अनाइमंगलम ताम्रपत्र के बारे में 

  • चोल इतिहास के विद्वानों के अनुसार, अनाइमंगलम ताम्रपत्र तमिल इतिहास, संस्कृति और चोल साम्राज्य की महानता का महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। 
  • इन ताम्रपत्रों का संबंध राजा राजा चोल प्रथम (985–1014 ईस्वी) और उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम (1014–1044 ईस्वी) से है।
  • अभिलेखों में नागपट्टिनम के पास स्थित अनाइमंगलम गाँव में एक बौद्ध विहार को भूमि दान देने का उल्लेख मिलता है। 
  • यह विहार जावा के राजा श्री मारा विजयोतुंग वर्मन ने अपने पिता चूड़ामणि वर्मन की स्मृति में बनवाया था, इसलिए इसका नाम चूड़ामणिवर्मा विहार रखा गया।    

ताम्रपत्र धार्मिक सहिष्णुता का प्रतीक 

  • इन ताम्रपत्रों की सबसे खास बात यह है कि वे धार्मिक सहिष्णुता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। चोल शासक शैव धर्म के अनुयायी थे, फिर भी उन्होंने बौद्ध विहार के निर्माण में सहायता की।
  • राजा राजा चोल प्रथम ने बौद्ध विहार के निर्माण का आदेश दिया था, जबकि उनके पुत्र राजेंद्र चोल प्रथम ने उस आदेश को लागू किया। बाद में कुलोत्तुंग चोल प्रथम ने भी विहार को अतिरिक्त भूमि और धान का अनुदान दिया। 

ताम्रपत्रों की विशेषताएँ 

  • यह ताम्रपत्र कुल 24 प्लेटों का संग्रह हैं, जिनमें 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं।
  • बड़ी प्लेटों में संस्कृत और तमिल दोनों भाषाओं में लेख अंकित हैं।
  • छोटी प्लेटों में कुलोत्तुंग चोल प्रथम के समय दिए गए अतिरिक्त अनुदानों का उल्लेख है।
  • इन प्लेटों को एक विशेष धातु के छल्ले में पिरोया गया था, जिस पर चोल साम्राज्य के शाही प्रतीक अंकित थे। इनमें-
    • चोलों का बाघ
    • पांड्यों की दो मछलियाँ
    • चेरों का धनुष
    • शाही छत्र
    • दीपक
    • स्वस्तिक चिह्न शामिल थे।  
  • दो मछलियाँ और धनुष इस बात का प्रतीक थे कि चोलों ने पांड्य और चेर राजवंशों पर विजय प्राप्त की थी। 

सांस्कृतिक विरासत की वापसी 

  • इतिहासकारों का मानना है कि इन ताम्रपत्रों की वापसी केवल पुरातात्विक महत्व की घटना नहीं है, बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक पहचान और ऐतिहासिक विरासत को पुनः प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। ये अभिलेख चोल काल की प्रशासनिक व्यवस्था, धार्मिक सहिष्णुता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों की महत्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं। 
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