प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओस्लो यात्रा और तीसरे भारत–नॉर्डिक शिखर सम्मेलन का आयोजन ऐसे समय हो रहा है जब भारत और नॉर्डिक देशों के बीच संबंध केवल जलवायु सहयोग, नवाचार और डिजिटलीकरण तक सीमित नहीं रह गए हैं।
यूक्रेन युद्ध, यूरोप की बदलती सुरक्षा व्यवस्था, ट्रांस-अटलांटिक तनाव, आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के पुनर्गठन ने भारत–नॉर्डिक साझेदारी को अधिक रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक महत्व प्रदान किया है।
अब यह संबंध केवल विकास सहयोग नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री संपर्क, उन्नत प्रौद्योगिकी, महत्वपूर्ण खनिजों और आर्कटिक शासन से जुड़ता जा रहा है।

आर्कटिक क्षेत्र का बढ़ता सामरिक और भू-राजनीतिक महत्व
पहले आर्कटिक क्षेत्र को मुख्यतः वैज्ञानिक अनुसंधान, पर्यावरण संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के क्षेत्र के रूप में देखा जाता था, लेकिन वर्तमान समय में यह वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र बन गया है।
जलवायु परिवर्तन के कारण तेजी से पिघलती बर्फ ने आर्कटिक क्षेत्र को आर्थिक, सामरिक और ऊर्जा दृष्टि से अत्यधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। इससे वहां नई समुद्री मार्गों, ऊर्जा संसाधनों और खनिज संपदाओं तक पहुंच संभव हो रही है।
आर्कटिक क्षेत्र का महत्व बढ़ने के प्रमुख कारण—
- बर्फ पिघलने से नए नौवहन मार्ग विकसित हो रहे हैं, जिनमें नॉर्दर्न सी रूट (NSR) विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। यह मार्ग भविष्य में एशिया और यूरोप के बीच समुद्री दूरी कम कर सकता है।
- इस क्षेत्र में विशाल मात्रा में तेल, प्राकृतिक गैस, दुर्लभ खनिज, रेयर अर्थ तत्व और रणनीतिक संसाधन उपलब्ध हैं, जिनके कारण वैश्विक शक्तियां यहां प्रभाव बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं।
- आर्कटिक अब केवल आर्थिक क्षेत्र नहीं रह गया है बल्कि यहां बंदरगाह अवसंरचना, समुद्री सुरक्षा, सैन्य तैनाती, अंडरसी केबल नेटवर्क और ऊर्जा मार्गों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।
- नई तकनीकों जैसे स्वायत्त पनडुब्बी वाहन (Autonomous Underwater Vehicles), उपग्रह आधारित समुद्री मानचित्रण और समुद्र तल संसाधन निगरानी ने इस क्षेत्र के सामरिक महत्व को और बढ़ा दिया है।
आर्कटिक क्षेत्र की बदलती सुरक्षा संरचना
- हाल के वर्षों में आर्कटिक क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था में बड़े परिवर्तन हुए हैं, जिससे नॉर्डिक देशों की रणनीतिक भूमिका और बढ़ गई है।
- Finland और Sweden के NATO में शामिल होने के बाद पूरे नॉर्डिक सुरक्षा ढांचे में बदलाव आया है। इसके परिणामस्वरूप रूस अब आर्कटिक परिषद का एकमात्र गैर-NATO सदस्य रह गया है।
- इसके अतिरिक्त रूस और चीन के बीच सहयोग अब आर्कटिक क्षेत्र तक विस्तारित हो चुका है, जहां दोनों देश—
- आर्कटिक शिपिंग मार्गों के विकास
- ऊर्जा परियोजनाओं
- ध्रुवीय अवसंरचना निर्माण
- समुद्री संपर्क विस्तार में सहयोग कर रहे हैं।
इन परिवर्तनों के कारण आर्कटिक अब वैज्ञानिक सहयोग का क्षेत्र नहीं बल्कि सैन्य संतुलन, ऊर्जा प्रतिस्पर्धा और रणनीतिक प्रभाव विस्तार का क्षेत्र बनता जा रहा है।
भारत के लिए नॉर्डिक देशों का बढ़ता महत्व
बदलती वैश्विक परिस्थितियों ने भारत और नॉर्डिक देशों के हितों को पहले की तुलना में अधिक निकट ला दिया है। दोनों पक्ष अब कई रणनीतिक क्षेत्रों में एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं।
भारत–नॉर्डिक सहयोग के प्रमुख आधार—
- उन्नत प्रौद्योगिकी सहयोग
- हरित ऊर्जा परिवर्तन
- आपूर्ति श्रृंखला विविधीकरण
- समुद्री सुरक्षा
- जलवायु परिवर्तन अनुसंधान
- आर्कटिक विशेषज्ञता
- रक्षा और नवाचार सहयोग
नॉर्वे की भूमिका
नॉर्वे ने अपनी हाई नॉर्थ रणनीति (High North Strategy) के माध्यम से वैज्ञानिक सहयोग और सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया है।
नॉर्वे भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि—
- भारत की प्रमुख आर्कटिक अनुसंधान सुविधाएं यहीं स्थित हैं।
- यह आर्कटिक शासन और वैज्ञानिक सहयोग का प्रमुख केंद्र है।
- नॉर्वे समुद्री प्रौद्योगिकी, हरित ऊर्जा और आर्कटिक नीति में अग्रणी है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का महत्व
डेनमार्क तथा ग्रीनलैंड भारत के लिए इसलिए महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं क्योंकि: -
- ग्रीनलैंड भविष्य के आर्कटिक समुद्री मार्गों के निकट स्थित है।
- यहां महत्वपूर्ण खनिज और रेयर अर्थ तत्व पाए जाते हैं।
- वैश्विक शक्तियों की बढ़ती रुचि के कारण इसका भू-राजनीतिक महत्व बढ़ गया है।
स्वीडन और फिनलैंड की उपयोगिता
ये देश भारत को उन्नत रक्षा तकनीक, नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र ,आर्कटिक विशेषज्ञता ,उच्च तकनीकी विनिर्माण क्षमता उपलब्ध करा सकते हैं।
आइसलैंड की प्रासंगिकता
- आइसलैंड भू-तापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) के क्षेत्र में विश्व अग्रणी है।
- भारत के हिमालयी क्षेत्रों में स्वच्छ ऊर्जा विकास और भू-तापीय परियोजनाओं के लिए इसका अनुभव उपयोगी हो सकता है।
आर्कटिक में भारत की वर्तमान उपस्थिति और सीमाएं
भारत 2013 में आर्कटिक परिषद का पर्यवेक्षक सदस्य बना था। इसके बाद भारत ने क्षेत्र में वैज्ञानिक उपस्थिति स्थापित की।
भारत की प्रमुख संस्थागत उपस्थिति—
- हिमाद्री अनुसंधान केंद्र (Himadri) – स्वालबार्ड क्षेत्र में स्थापित भारत का प्रमुख ध्रुवीय अनुसंधान स्टेशन।
- इंडआर्क (IndARC) – समुद्र के भीतर स्थापित भारत की आर्कटिक वेधशाला।
- ग्रुवेबाडेट प्रयोगशाला (Gruvebadet Laboratory) – वायुमंडलीय और जलवायु अध्ययन हेतु नॉर्वे में स्थित केंद्र।
हालांकि बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों में केवल वैज्ञानिक उपस्थिति पर्याप्त नहीं होगी; भारत को रणनीतिक, आर्थिक और समुद्री दृष्टिकोण भी विकसित करना होगा।
भारत आर्कटिक हितधारक क्यों है ?
भारत आर्कटिक राष्ट्र नहीं है, लेकिन इस क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन भारत को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करते हैं।
आर्कटिक क्षेत्र वैश्विक औसत की तुलना में तीन गुना अधिक तेजी से गर्म हो रहा है। इसका प्रभाव भारत पर कई रूपों में दिखाई देता है—
- बारेंट्स–कारा सागर क्षेत्र में बर्फ के पिघलने का संबंध भारत के दक्षिण-पश्चिम मानसून की अनिश्चितता से जोड़ा गया है।
- ध्रुवीय बर्फ के पिघलने से समुद्र स्तर वृद्धि होगी, जिससे भारत के तटीय शहरों, बंदरगाहों और द्वीपीय क्षेत्रों पर खतरा बढ़ सकता है।
- बर्फ पिघलने से नए समुद्री व्यापार मार्ग, ऊर्जा दोहन और संसाधन विकास के अवसर उत्पन्न होंगे।
- आर्कटिक क्षेत्र की घटनाएं भारत की खाद्य सुरक्षा, कृषि उत्पादन और जलवायु स्थिरता को प्रभावित कर सकती हैं।
भारत के लिए संभावित नया समुद्री गलियारा
- भारत चेन्नई–व्लादिवोस्तोक समुद्री गलियारे को आगे बढ़ाकर चेन्नई → व्लादिवोस्तोक → मरमांस्क → नॉर्डिक क्षेत्र तक विस्तारित कर सकता है।
- इससे भारत, जापान, रूस और उत्तरी यूरोप के बीच नया समुद्री संपर्क विकसित होगा। व्यापार मार्गों का विविधीकरण संभव होगा। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की भूमिका मजबूत होगी।
भारत को अपनाने चाहिए प्रमुख नीतिगत कदम
आर्कटिक नौवहन क्षमता का विकास :-
भारत को 2030–31 तक कम से कम पांच आइस-क्लास टैंकर विकसित करने चाहिए ताकि वह आर्कटिक व्यापार और ऊर्जा लॉजिस्टिक्स में प्रारंभिक लाभ प्राप्त कर सके।
भारत–आर्कटिक आर्थिक मंच की स्थापना:-
यह मंच उद्योगों, निवेशकों और सरकारों के बीच सहयोग बढ़ाकर ऊर्जा, शिपिंग, अवसंरचना और मानव संसाधन विकास में अवसर प्रदान कर सकता है।
आर्कटिक–हिमालय जलवायु डेटा कॉरिडोर:-
भारत और नॉर्डिक देशों को संयुक्त रूप से मानसून, हिमनद परिवर्तन और समुद्र स्तर वृद्धि पर अनुसंधान करना चाहिए।
विशेष आर्कटिक दूत की नियुक्ति:-
भारत को अन्य एशियाई देशों की तरह विशेष आर्कटिक दूत नियुक्त कर संस्थागत क्षमता मजबूत करनी चाहिए।