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सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि

संदर्भ

  • हाल ही में भारत के राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026 जारी किया है। इसके तहत सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई है। अब मुख्य न्यायाधीश (CJI) को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। यानी सीजेआई सहित सुप्रीम कोर्ट में कुल न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़कर 38 हो जाएगी। 
  • यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम, 1956 में संशोधन करके किया गया है। वस्तुतः यह अध्यादेश संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत जारी किया गया, क्योंकि उस समय संसद का सत्र नहीं चल रहा था।  

राष्ट्रपति की अध्यादेश जारी करने की शक्ति

अनुच्छेद 123 क्या कहता है ? 

  • जब संसद का सत्र नहीं चल रहा हो और तात्कालिक कानून बनाने की आवश्यकता हो, तब राष्ट्रपति अध्यादेश जारी कर सकते हैं।  

अध्यादेश 

  • अध्यादेश की शक्ति संसद द्वारा बनाए गए कानून जैसी होती है।
  • यह अस्थायी व्यवस्था होती है और केवल आवश्यक परिस्थितियों में इस्तेमाल की जाती है। 
  • अध्यादेश को संसद की मंजूरी आवश्यक होती है।
  • अदालत इसकी न्यायिक समीक्षा कर सकती है।  

अध्यादेश की समयावधि

  • दोबारा संसद सत्र प्रारंभ होने पर अध्यादेश दोनों सदनों में रखा जाता है। 
  • यदि संसद छह सप्ताह के भीतर इसे मंजूरी नहीं देती, तो यह समाप्त हो जाता है।
  • यदि दोनों सदन इसे अस्वीकार कर दें, तो भी यह समाप्त हो जाता है।
  • राष्ट्रपति चाहें तो इसे पहले भी वापस ले सकते हैं।  

न्यायपालिका का दृष्टिकोण  

  • सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में कहा है कि अध्यादेश भी अदालत की समीक्षा के दायरे में आते हैं।
  • डी.सी. वाधवा (D.C. Wadhwa) मामले (1987) में अदालत ने बार-बार अध्यादेश जारी करने को संविधान का दुरुपयोग बताया था। 

अध्यादेश के वास्तविक निर्णयकर्ता 

  • हालाँकि अध्यादेश राष्ट्रपति जारी करते हैं, लेकिन इसका निर्णय मुख्य रूप से केंद्रीय मंत्रिमंडल लेता है। 

                                      ये भी जाने 

  • संविधान के अनुच्छेद 124(1) के अनुसार, शुरुआत में सर्वोच्च न्यायालय में भारत के मुख्य न्यायाधीश और अधिकतम सात अन्य न्यायाधीशों की व्यवस्था की गई थी। साथ ही संसद को यह अधिकार दिया गया था कि वह कानून बनाकर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ा सके। 
  • इसी के तहत 1956 में सर्वोच्च न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) अधिनियम बनाया गया। इसमें मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर न्यायाधीशों की संख्या 10 तय की गई थी। बाद में मामलों की बढ़ती संख्या को देखते हुए समय-समय पर इसमें बदलाव किए गए:
    • 1960 के संशोधन में न्यायाधीशों की संख्या 10 से बढ़ाकर 13 कर दी गई।
    • बाद में एक और संशोधन के जरिए यह संख्या 17 कर दी गई।
    • 1986 के संशोधन में न्यायाधीशों की संख्या 17 से बढ़ाकर 25 कर दी गई।
    • 2009 के संशोधन में यह संख्या 25 से बढ़ाकर 30 कर दी गई।
    • इसके बाद 2019 में फिर संशोधन कर न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाई गई। 

सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी ? 

  • लंबित मामलों की बढ़ती संख्या 
  • उच्चतम न्यायालय में 93,000 से ज्यादा मामले लंबित हैं।
  • कोविड के बाद ई-फाइलिंग बढ़ने से नए मामलों की संख्या भी बढ़ी है।  
  • पीआईएल, संवैधानिक विवाद, वाणिज्यिक और सेवा संबंधी मामले लगातार बढ़ रहे हैं।
  • त्वरित न्याय समय की आवश्यकता 

न्याय में देरी न्याय न मिलने के समान 

  • कानून का प्रभाव कमजोर होता है,
  • लोगों के अधिकार प्रभावित होते हैं और
  • न्यायपालिका पर भरोसा कम होता है।

न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि न्यायिक समानता घोतक 

  • मामलों की सुनवाई तेज होगी,
  • फैसलों में देरी कम होगी,
  • ज्यादा संवैधानिक पीठ बनाई जा सकेंगी और 
  • लोगों को जल्दी न्याय मिल सकेगा।

नवीन चुनौतियाँ 

आज सुप्रीम कोर्ट को कई नए प्रकार के मामलों को संभालना पड़ता है, जैसे;

  • केंद्र-राज्य विवाद,
  • चुनाव संबंधी मामले,
  • डिजिटल प्राइवेसी और तकनीक से जुड़े विवाद,
  • पर्यावरण और जलवायु से जुड़े मामले,
  • आर्थिक और नियामक विवाद। 

न्यायपालिका में भावी सुधारों की आवश्यकता  

  • उच्च न्यायालय और निचली अदालतों में खाली पद जल्दी भरे जाएँ।
  • अखिल भारतीय न्यायिक सेवा (AIJS) बनाई जाए।
  • सुप्रीम कोर्ट को केवल महत्वपूर्ण संवैधानिक मामलों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।
  • मध्यस्थता, लोक अदालत और पंचाट जैसे वैकल्पिक समाधान बढ़ाए जाएँ।
  • अदालतों में बेहतर भवन, स्टाफ और डिजिटल सुविधाएँ दी जाएँ।
  • एआई, ई-कोर्ट और वर्चुअल सुनवाई जैसी तकनीक का ज्यादा उपयोग हो।
  • स्थायी संवैधानिक पीठ बनाई जाए। 

निष्कर्ष 

सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या बढ़ाना बढ़ते लंबित मामलों की समस्या को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन केवल संख्या बढ़ाने से पूरी समस्या हल नहीं होगी। इसके लिए न्यायपालिका के सभी स्तरों पर व्यापक सुधार करना जरूरी है।  

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