भारत में रोगाणुरोधी प्रतिरोध: एक अदृश्य संकट

संदर्भ 

भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के व्यापक और अनियंत्रित उपयोग के कारण रोगाणुरोधी प्रतिरोध (एएमआर) एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती बनता जा रहा है। यह संकट इतना गहरा है कि वर्ष 2021 में ही अनुमानित 2.67 लाख मौतें सीधे तौर पर एएमआर से जुड़ी थीं। इसके बावजूद, यह समस्या अभी भी बड़े पैमाने पर अदृश्य बनी हुई है।

प्रमुख बिंदु 

अध्ययनों से संकेत मिलता है कि लगभग 83% भारतीयों में दवा-प्रतिरोधी बैक्टीरिया मौजूद हैं। उपचार प्रणालियों में मौजूद खामियां और एंटीबायोटिक दवाओं का व्यापक दुरुपयोग सामान्य संक्रमणों को भी जटिल और जानलेवा बना रहा है, जिससे आधुनिक चिकित्सा की बुनियाद ही खतरे में पड़ती दिख रही है। 

अस्पतालों और समुदायों में फैलता एएमआर 

  • भारत में एएमआर को एक “मूक महामारी” कहा जा सकता है, जो न केवल अस्पतालों में बल्कि समुदायों के भीतर भी तेजी से फैल रही है। 
  • अस्पतालों में एंटीबायोटिक दवाओं के अत्यधिक उपयोग से बैक्टीरिया पर प्रतिरोध विकसित करने का दबाव बनता है। 
  • यह प्रतिरोध आनुवंशिक उत्परिवर्तन और प्रतिरोधक जीनों के माध्यम से तेजी से फैलता है। 
  • अक्सर मरीज हृदय या गुर्दे जैसी असंबंधित बीमारियों के इलाज के लिए अस्पताल में भर्ती होते हैं, लेकिन इलाज के दौरान उन्हें दवा-प्रतिरोधी संक्रमण हो जाते हैं, जिनके परिणाम कई बार घातक साबित होते हैं। 
  • इस तरह का अप्रत्यक्ष संक्रमण मार्ग एएमआर के वास्तविक बोझ का आकलन करना कठिन बना देता है।
  • समुदाय स्तर पर भी स्थिति चिंताजनक है। टाइफाइड, डायरिया और निमोनिया जैसे सामान्य संक्रमण तेजी से दवा-प्रतिरोधी होते जा रहे हैं। 
  • विश्व की लगभग 18% आबादी भारत में रहती है और अनुमान है कि वैश्विक संक्रमणों का लगभग पांचवां हिस्सा यहीं होता है, जो समस्या की गंभीरता को और रेखांकित करता है। 

रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance – AMR) के बारे में 

रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance – AMR) वह स्थिति है जिसमें बैक्टीरिया, वायरस, फंगस या परजीवी उन दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं जिनसे पहले उनका उपचार संभव था। परिणामस्वरूप, संक्रमणों का इलाज कठिन हो जाता है, रोग लंबे समय तक बना रहता है और मृत्यु का जोखिम बढ़ जाता है।

कारण

  • एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक या गलत उपयोग
  • बिना डॉक्टर की सलाह दवाएं लेना
  • पूरा कोर्स पूरा न करना
  • वायरस जनित बीमारियों (जैसे सर्दी-जुकाम) में एंटीबायोटिक का प्रयोग
  • वस्तुतः इन कारणों से कमजोर बैक्टीरिया नष्ट हो जाते हैं, लेकिन कुछ मजबूत जीवित रह जाते हैं और समय के साथ प्रतिरोधी बन जाते हैं। 

दुष्परिणाम

  • सामान्य संक्रमणों का इलाज कठिन हो जाता है
  • इलाज महंगा और लंबा हो जाता है
  • अस्पताल में भर्ती और मृत्यु दर बढ़ती है
  • सर्जरी, कैंसर उपचार और अंग प्रत्यारोपण जैसे आधुनिक चिकित्सा उपाय जोखिम में पड़ जाते हैं 

व्यवहारिक कारण और एंटीबायोटिक दुरुपयोग

  • भारत में एंटीबायोटिक दवाओं के दुरुपयोग के पीछे व्यवहारिक कारणों की बड़ी भूमिका है। खांसी, जुकाम या दस्त जैसी साधारण बीमारियों में भी लोग बिना जांच के एंटीबायोटिक लेना शुरू कर देते हैं। 
  • कई बार ये दवाएं फार्मासिस्ट की सलाह पर या डॉक्टरों द्वारा निवारक उपाय के रूप में दी जाती हैं।
  • इस तरह की आदतें एंटीबायोटिक के अत्यधिक और अनुचित उपयोग को बढ़ावा देती हैं, जिससे प्रतिरोध विकसित होने की गति और तेज हो जाती है। यद्यपि विशेषज्ञों का मानना है कि इस व्यवहार में तत्काल सुधार आवश्यक है। 

सूखती हुई एंटीबायोटिक पाइपलाइन 

  • यद्यपि हाल के वर्षों में कुछ एंटीबायोटिक दवाओं को स्वीकृति मिली है, परंतु इनमें से अधिकांश न तो नई दवा श्रेणियों से संबंधित हैं और न ही किसी नवीन उपचारात्मक तंत्र पर आधारित हैं। 
  • ऐसे समय में, जब प्रभावी वैकल्पिक दवाओं की भारी कमी है, एंटीबायोटिक दवाओं का निरंतर और अनियंत्रित दुरुपयोग उनकी प्रभावशीलता को शीघ्र ही समाप्त कर देने का गंभीर खतरा उत्पन्न करता है। 

सामान्य संक्रमणों का इलाज कठिन 

  • दवा-प्रतिरोधी संक्रमणों के कारण अब अधिक शक्तिशाली, अंतिम विकल्प के रूप में उपयोग की जाने वाली एंटीबायोटिक दवाओं पर निर्भरता बढ़ रही है। मूत्र मार्ग संक्रमण (यूटीआई) और टाइफाइड जैसे आम सामुदायिक संक्रमणों का इलाज भी कठिन होता जा रहा है।
  • साल्मोनेला टाइफी में फ्लोरोक्विनोलोन के प्रति बढ़ता प्रतिरोध चिंता का विषय है। वहीं सेफ्ट्रियाक्सोन और एज़िथ्रोमाइसिन जैसी दवाओं के अत्यधिक उपयोग से उनके भी अप्रभावी हो जाने का खतरा बढ़ गया है। 
  • हालांकि, कुछ मामलों में दवाओं का उपयोग बंद करने पर प्रतिरोध में कमी देखी गई है, जैसा कि टाइफाइड की पुरानी दवाओं के दोबारा प्रभावी होने के उदाहरण से स्पष्ट है। 

एंटीबायोटिक प्रबंधन की अहम भूमिका 

  • एंटीबायोटिक प्रबंधन (एंटीमाइक्रोबियल स्टूवर्डशिप) वह प्रक्रिया है जिसके तहत चिकित्सकों द्वारा दवाएं लिखने और मरीजों द्वारा उनके उपयोग को बेहतर और तर्कसंगत बनाया जाता है।
  • विशेषज्ञों के अनुसार, अचानक प्रतिबंध लगाने की बजाय प्रबंधन कार्यक्रम अधिक प्रभावी साबित होते हैं।
  • केरल का रोगाणुरोधी प्रबंधन कार्यक्रम, जो 2015 में शुरू हुआ था, इसका एक सफल उदाहरण है। इस कार्यक्रम ने तर्कसंगत दवा उपयोग और जन जागरूकता पर जोर दिया। लगभग एक दशक बाद राज्य ने काउंटर पर एंटीबायोटिक बिक्री पर प्रतिबंध लगाया और इसमें उल्लेखनीय सफलता हासिल की।

मनुष्य, पशुधन और पर्यावरण का संबंध 

  • अक्सर यह धारणा होती है कि पशुओं में एंटीबायोटिक उपयोग मानव प्रतिरोध का प्रमुख कारण है, लेकिन भारत में उच्च प्रतिरोध स्तर का मुख्य कारण मनुष्यों द्वारा एंटीबायोटिक का अत्यधिक उपयोग है। 
  • आईसीएमआर के अध्ययनों में मानव और अस्पताल के वातावरण के बीच प्रतिरोधक जीन की महत्वपूर्ण समानता पाई गई है, जबकि जानवरों के साथ यह समानता बहुत कम रही।
  • हालांकि, भोजन में एंटीबायोटिक अवशेषों की मौजूदगी एक गंभीर चिंता बनी हुई है। ये अवशेष आंतों के माइक्रोबायोम में रहकर प्रतिरोध के भंडार के रूप में कार्य कर सकते हैं। 

सीमित आंकड़े और निगरानी की आवश्यकता 

  • भारत में एएमआर से जुड़े अधिकांश आंकड़े आईसीएमआर नेटवर्क के अंतर्गत आने वाले केवल 25 तृतीयक अस्पतालों से प्राप्त होते हैं। 
  • इन अस्पतालों में पहले से अस्पताल में भर्ती रहने और एंटीबायोटिक के संपर्क में आने के कारण प्रतिरोध दरें अधिक होती हैं, जिससे राष्ट्रव्यापी स्थिति की सही तस्वीर सामने नहीं आ पाती।
  • विशेषज्ञ जापान की तरह एक व्यापक निगरानी प्रणाली की आवश्यकता पर जोर देते हैं, जिसमें हजारों अस्पतालों को शामिल किया जाए। 

वैकल्पिक उपचारों की तलाश 

  • एएमआर की चुनौती से निपटने के लिए वैकल्पिक उपचारों पर भी काम हो रहा है। 
  • बैक्टीरिया को नष्ट करने वाले वायरस पर आधारित फेज थेरेपी मूत्र मार्ग संक्रमण जैसे मामलों में आशाजनक दिखाई देती है, हालांकि इसके लिए सटीक मिलान और वायरस के संयोजन की आवश्यकता होती है। यहां भी प्रतिरोध विकसित होने की संभावना बनी रहती है।
  • इसके अलावा, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी जैसे नए उपचार विकल्प उभर रहे हैं, लेकिन वे अभी विकास के प्रारंभिक चरण में हैं। 

निष्कर्ष 

रोगाणुरोधी प्रतिरोध भारत के लिए एक गंभीर और बहुआयामी संकट है, जिसका समाधान केवल नियमन से संभव नहीं है। इसके लिए व्यवहार में बदलाव, जन जागरूकता, बेहतर निगरानी प्रणाली और वैज्ञानिक नवाचार की आवश्यकता है। समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट आने वाले वर्षों में आधुनिक चिकित्सा को गंभीर रूप से कमजोर कर सकता है। 

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