हाल ही में, कर्नाटक और ओडिशा के वैज्ञानिकों ने आंध्र प्रदेश के पूर्वी घाट क्षेत्र में आर्मी चींटियों की दो नई प्रजातियों एनीक्टस चित्तूरेन्सिस (Aenictus chittoorensis) तथा एनीक्टस लंकामालेंसिस (Aenictus lankamallensis) की पहचान की है।
आर्मी चींटियों के बारे में
- आर्मी चींटियाँ घुमंतू स्वभाव की होती हैं और स्थायी रूप से किसी एक स्थान पर घोंसला नहीं बनातीं हैं।
- इनका वर्गीकरण डोरिलिनी (Dorylinae) उपकुल (सब-फैमिली) के अंतर्गत किया जाता है।
- ये मुख्यतः उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाई जाती हैं और अपने आक्रामक शिकारी व्यवहार के लिए जानी जाती हैं।
प्रमुख विशेषताएँ
- आर्मी चींटियाँ स्थायी निवास स्थान नहीं बनातीं हैं।
- वे अस्थायी संरचनाएँ तैयार करती हैं जिन्हें ‘बिवुआक’ (Bivouacs) कहा जाता है। ये संरचनाएँ श्रमिक चींटियों के आपस में जुड़कर बनाए गए जीवित समूह से निर्मित होती हैं।
- ये अत्यंत संगठित सामाजिक कीट हैं जो बड़े समूहों में समन्वित तरीके से आक्रमण करती हैं और अपने रास्ते में आने वाले कीटों तथा छोटे जीवों का शिकार करती हैं।
- इनके बड़े, मजबूत एवं धारदार जबड़े (Mandibles), डंक मारने की क्षमता तथा संचार और दिशा-निर्देशन के लिए रासायनिक फेरोमोन पर निर्भरता इन्हें विशिष्ट बनाती है।
- इनकी दृष्टि बहुत कमजोर होती है; इसलिए ये मार्ग चिह्नित करने और एक-दूसरे का अनुसरण करने के लिए फेरोमोन संकेतों का उपयोग करती हैं।
- इनके समुदाय में केवल एक रानी होती है जो अंडे देने का कार्य करती है। मादा श्रमिक चींटियाँ संतानों की देखभाल करने और भोजन संग्रह की जिम्मेदारी निभाती हैं।
पारिस्थितिक महत्व
- आर्मी चींटियाँ ‘की-स्टोन प्रिडेटर’ के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र में अहम भूमिका निभाती हैं।
- ये प्रतिदिन बड़ी संख्या में अकशेरुकी जीवों का उपभोग कर आर्थ्रोपोड जनसंख्या को संतुलित रखती हैं और इस प्रकार वन क्षेत्रों की जैव-विविधता को बनाए रखने में योगदान देती हैं।