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एशिया-प्रशांत क्षेत्र : 2030 तक मलेरिया उन्मूलन

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: स्वास्थ्य, शिक्षा, मानव संसाधनों से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास और प्रबंधन से संबंधित विषय)  

संदर्भ

विश्व मलेरिया रिपोर्ट, 2025 एक ऐसे निर्णायक मोड़ पर प्रकाशित हुई है जब दुनिया मलेरिया उन्मूलन के अपने लक्ष्य से केवल पाँच वर्ष दूर है। यह रिपोर्ट एक विरोधाभास प्रस्तुत करती है। वस्तुतः एक ओर जहाँ तकनीक एवं टीकों ने नई उम्मीदें जगाई हैं, वहीं घटता बजट व दवाओं के प्रति बढ़ता प्रतिरोध इस ऐतिहासिक लड़ाई को कमजोर कर रहा है। 

एशिया-प्रशांत: सफलताओं और विषमताओं का संगम 

एशिया-प्रशांत क्षेत्र ने पिछले दो दशकों में अनुकरणीय नेतृत्व दिखाया है। रिपोर्ट के अनुसार-

  • सकारात्मक गिरावट: एशिया-प्रशांत क्षेत्र के 17 देशों में से 10 में मामलों में कमी आई है। वर्ष 2023 के 96 लाख मामलों के मुकाबले 2024 में यह संख्या घटकर 89 लाख रह गई। 
  • सफलता के मॉडल: श्रीलंका एवं चीन के बाद अब तिमोर-लेस्ते ने प्रमाणित किया है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति से मलेरिया को जड़ से मिटाया जा सकता है।
  • मेकांग की जीत: ग्रेटर मेकांग उपक्षेत्र ने मलेरिया-रोधी दवाओं के प्रतिरोध (Drug Resistance) को रोकने में वैश्विक स्तर पर सबसे प्रभावी भूमिका निभाई है। 

भारत का संकल्प और 2027 के लक्ष्य की संभावना

  • भारत ने वैश्विक समय-सीमा से तीन वर्ष पहले अर्थात वर्ष 2027 तक शून्य स्वदेशी मामले प्राप्त करने का साहसी लक्ष्य रखा है। 
  • उन्मूलन के लिए तीन ‘निर्णायक’ रणनीतियाँ
    • कठोर निगरानी (Surveillance): केवल सरकारी केंद्रों तक सीमित न रहकर निजी क्षेत्र, रेलवे व रक्षा सेवाओं से भी वास्तविक समय (Real-time) डेटा प्राप्त करना
    • हाइपर-लोकल फोकस: भारत के 80% मामले केवल 5 राज्यों और पूर्वोत्तर क्षेत्र में केंद्रित हैं। अब सामान्य दृष्टिकोण के बजाय ‘प्रोजेक्ट-आधारित’ लक्षित हस्तक्षेप की आवश्यकता है।
    • वित्तीय अनुशासन: मलेरिया को एक स्वास्थ्य कार्यक्रम के बजाय एक ‘नेशनल मिशन’ के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसमें निवेश की निरंतरता बनी रहे। 

दवा प्रतिरोध एवं टीकों का नया दौर 

  • मलेरिया के खिलाफ जंग में आर्टेमिसिनिन (Artemisinin) के प्रति प्रतिरोध एक वैश्विक संकट बन रहा है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि यहाँ अभी तक प्रतिरोध स्थापित नहीं हुआ है। भारत की रणनीति ‘सावधानी’ पर टिकी है जिसमें दवाओं के उपयोग का सख्त नियमन व निरंतर निगरानी शामिल है।
  • वहीं दूसरी ओर, RTS,S और R21 जैसे टीकों ने एक नया कवच प्रदान किया है। अफ्रीका में सफल परीक्षणों के बाद अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी इनके लक्षित उपयोग पर विचार किया जा रहा है, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहाँ फाल्सीपेरम (Falciparum) मलेरिया का प्रकोप अधिक है। 

RTS,S/AS01 (मलेरिया वैक्सीन) के बारे में

RTS,S/AS01 दुनिया का पहला मलेरिया टीका है जिसे व्यापक उपयोग के लिए अनुशंसित किया गया है। यह मुख्य रूप से Plasmodium falciparum मलेरिया के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करता है जो मलेरिया का सबसे घातक रूप है और विशेषकर अफ्रीका में बच्चों में उच्च मृत्यु दर का कारण बनता है।

यह कैसे काम करता है ? 

  • RTS,S एक प्री-एरिथ्रोसाइटिक वैक्सीन है यानी यह मलेरिया परजीवी को शरीर में प्रवेश करने के शुरुआती चरण (यकृत चरण) में ही रोकने की कोशिश करता है।
  • इसमें परजीवी के एक हिस्से (circumsporozoite protein) को लक्षित किया जाता है।
  • AS01 एक शक्तिशाली एडजुवेंट है जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को मज़बूत करता है। 

घटता वित्तपोषण

  • रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक पहलू चिकित्सा से नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र से जुड़ा है। वर्ष 2024 में वैश्विक मलेरिया वित्तपोषण की आवश्यकताओं का केवल 42% ही पूरा हो सका। 

निष्कर्ष: निर्णायक पाँच वर्ष

अगले पाँच वर्ष यह तय करेंगे कि क्या मानवता इस प्राचीन बीमारी को इतिहास की किताबों तक सीमित कर पाएगी या नहीं। भारत के पास नेतृत्व करने का अवसर है किंतु इसके लिए केवल तकनीक पर्याप्त नहीं है; इसके लिए निरंतर ‘राजनीतिक एवं वित्तीय’ प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। 

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