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बॉम्बे हाई कोर्ट का अहम फैसला: मानव तस्करी पीड़िताओं की ‘सुरक्षात्मक हिरासत’ पर संवैधानिक सवाल

चर्चा में क्यों?

  • हाल ही में बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में एक वयस्क मानव तस्करी पीड़िता को एक वर्ष के लिए सुरक्षात्मक गृह में रखने के आदेश को रद्द कर दिया। अदालत ने माना कि कानूनी औचित्य के बिना ऐसी हिरासत संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उल्लंघन है।

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प्रमुख बिन्दु

  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 (PITA) के तहत स्थापित सुरक्षात्मक गृह पुनर्वास के लिए हैं, न कि कारावास के लिए।
  • यह मामला महाराष्ट्र में पुलिस छापेमारी के बाद सामने आया, जहां महिला को केवल इस अनुमान के आधार पर हिरासत में रखा गया था कि आर्थिक कमजोरी या पारिवारिक सहयोग के अभाव में वह यौन कार्य में लौट सकती है-एक धारणा को अदालत ने पूरी तरह अस्वीकार कर दिया।

अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के अंतर्गत हिरासत की सीमाएँ

  • बचाव के बाद हिरासत की वैधानिक सीमा:
    • PITA की धारा 17 के अनुसार, यदि किसी बचाए गए व्यक्ति को तुरंत मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना संभव न हो, तो उसे अस्थायी रूप से सुरक्षित हिरासत में रखा जा सकता है।
    • यह प्रारंभिक हिरासत अधिकतम 10 दिनों तक सीमित है।
  • मजिस्ट्रेटीय जांच और समय-सीमा:
    • मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किए जाने के बाद जांच अनिवार्य है।
    • जांच के दौरान अंतरिम हिरासत अधिकतम 3 सप्ताह तक ही बढ़ाई जा सकती है।
    • इसके बाद लंबी अवधि की हिरासत स्वतः अनिवार्य नहीं होती।

दीर्घकालिक नियुक्ति कब संभव?

  • किसी सुरक्षात्मक गृह में 1 से 3 वर्ष तक रखने का आदेश तभी दिया जा सकता है जब मजिस्ट्रेट स्पष्ट रूप से रिकॉर्ड पर दर्ज करे कि व्यक्ति को “देखभाल और संरक्षण की आवश्यकता” है।
  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा कि ये समय-सीमाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि विधायिका का उद्देश्य बचाव को कारावास में बदलना नहीं था।

सुरक्षात्मक गृह बनाम सुधारात्मक संस्थान

  • PITA इन दोनों के बीच स्पष्ट अंतर करता है:
  • सुरक्षात्मक गृह (धारा 2(ग))
    • पीड़ितों की देखभाल, सहायता और पुनर्वास के लिए।
  • सुधारात्मक संस्थान (धारा 2(ख))
    • अपराधियों को हिरासत में रखने के लिए।
    • इन्हें धारा 10A द्वारा शासित किया जाता है।
  • अधिनियम के तहत केवल दोषसिद्ध अपराधियों को ही सुधारात्मक संस्थानों में भेजा जा सकता है, न कि पीड़ितों को।

वयस्क पीड़ितों के संवैधानिक अधिकार

  • न्यायालय ने दोहराया कि अनुच्छेद 19 के अंतर्गत स्वतंत्र रूप से घूमने,निवास स्थान चुनने और आजीविका अर्जित करने का अधिकार है। 
  • यह वयस्क पीड़ितों को भी प्राप्त है।
  • मानव तस्करी का शिकार होना इन अधिकारों को स्वतः निलंबित नहीं करता।
  • बच्चों के विपरीत, वयस्कों को उनकी सहमति के बिना लंबे समय तक राज्य नियंत्रण में नहीं रखा जा सकता।

सहमति: पुनर्वास की मूल शर्त:

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वयस्क पीड़ित की “देखभाल” स्वैच्छिक होनी चाहिए।
  • यदि कोई वयस्क सुरक्षात्मक गृह छोड़ने की स्पष्ट इच्छा व्यक्त करता है, तो निरंतर रोकना देखभाल नहीं बल्कि गैरकानूनी हिरासत है।
  • इस मामले में महिला द्वारा बार-बार रहने से इनकार करने के बावजूद उसे रोका गया, जिससे सहमति केंद्रीय मुद्दा बन गई।

जब देखभाल हिरासत में बदल जाती है: न्यायालय की कसौटी

शब्द नहीं, प्रभाव महत्वपूर्ण:

  • अदालत ने स्पष्ट किया कि देखभाल और हिरासत के बीच का अंतर शब्दों या लेबल से नहीं, बल्कि उसके प्रभाव से तय होता है। 
  • केवल किसी संस्था को ‘सुरक्षात्मक गृह’ कह देने से वह हिरासत नहीं बन जाती, वास्तविक नियंत्रण और बाध्यता इसके असली निर्धारक हैं।

स्वैच्छिक सहायता बनाम बाध्यकारी नियंत्रण:

  • देखभाल का मतलब होता है कि व्यक्ति को स्वैच्छिक सहायता, परामर्श, सहमति से आश्रय और जीवन के पुनर्निर्माण में मदद प्रदान की जाए।
  • वहीं, हिरासत का अर्थ है बाध्यता, आवाजाही पर प्रतिबंध और व्यक्ति के निर्णय-स्वायत्तता का हनन। 
  • यदि किसी वयस्क पीड़ित को उसकी इच्छा के विरुद्ध रखा जाए, तो यह देखभाल नहीं, बल्कि हिरासत बन जाती है।

अनुमान नहीं, ठोस साक्ष्य:

  • व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर कोई भी प्रतिबंध केवल ठोस साक्ष्यों पर आधारित होना चाहिए, न कि काल्पनिक या अनुमानित आशंकाओं पर। 
  • न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल यह मान लेना कि पीड़ित यौन कार्य में लौट सकती है या उसे आर्थिक मदद की जरूरत है, हिरासत का आधार नहीं बन सकता।

पीड़ित अपराधी नहीं होते:

  • न्यायालय ने यह भी चेतावनी दी कि मानव तस्करी से बचे हुए व्यक्तियों को अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता।
  • अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, PITA, का उद्देश्य यौन शोषण के शिकार व्यक्ति को दंडित करना नहीं, बल्कि शोषण करने वालों को दंडित करना है। 
  • अगर कोई दंडनीय कृत्य नहीं करता, तो उस व्यक्ति पर कोई प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता।

हिरासत कब उचित हो सकती है?

  • हिरासत केवल कुछ सीमित परिस्थितियों में ही उचित मानी जा सकती है:
  • जब व्यक्ति की निर्णय लेने की क्षमता चिकित्सीय रूप से प्रभावित हो।
  • जब रिहाई पर व्यक्ति समाज के लिए स्पष्ट खतरा साबित हो।
  • जब व्यक्ति किसी आपराधिक मामले में आरोपी हो।
  • इस मामले में इनमें से कोई भी शर्त पूरी नहीं हुई, इसलिए पीड़िता की हिरासत गैरकानूनी और संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन थी।

PITA के तहत कौन-से अपराध दंडनीय हैं?

वेश्यावृत्ति स्वयं अपराध नहीं

  • न्यायालयों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि यौन कार्य या वेश्यावृत्ति में संलग्न होना अपने-आप में कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। 
  • केवल इस आधार पर किसी व्यक्ति को अपराधी नहीं माना जा सकता कि वह यौन कार्य से जुड़ा हुआ है।

कानून का फोकस: व्यक्तियों पर नहीं, शोषण पर

  • अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 का उद्देश्य यौन कार्य करने वाले व्यक्तियों को दंडित करना नहीं, बल्कि उन लोगों को दंडित करना है जो इस व्यवस्था के माध्यम से शोषण करते हैं।
  • इस अधिनियम के तहत वे व्यक्ति दंडनीय माने जाते हैं जो वेश्यालय का संचालन या प्रबंधन करते हैं,
  • किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति से होने वाली कमाई पर जीवन यापन करते हैं,
  • किसी व्यक्ति की तस्करी या खरीद-फरोख्त करते हैं, भले ही उसमें स्पष्ट सहमति ही क्यों न दिखाई दे।

सीमित और नियामक प्रकृति के अपराध:

  • PITA के अंतर्गत कुछ कृत्य केवल तभी दंडनीय होते हैं जब वे सार्वजनिक व्यवस्था या सामाजिक शांति को प्रभावित करते हों।
  • उदाहरण के लिए, सार्वजनिक स्थानों पर ग्राहकों को लुभाना या स्कूल, अस्पताल अथवा पूजा स्थलों के आसपास यौन कार्य करना।
  • न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि ये प्रावधान नैतिक आधार पर नहीं, बल्कि नियामक उद्देश्यों से बनाए गए हैं।

गरीबी हिरासत का आधार नहीं:

  • बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि आर्थिक कमजोरी,परिवार का सहयोग न होना,या यौन कार्य में लौटने की आशंका किसी व्यक्ति की संवैधानिक स्वतंत्रता को समाप्त करने का आधार नहीं हो सकती।
  • अदालत ने जोर देकर कहा कि गरीबी सहायता और पुनर्वास का आधार हो सकती है, लेकिन किसी वयस्क व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनने का आधार कभी नहीं बन सकती।

निष्कर्ष:

  • यह फैसला न केवल मानव तस्करी से पीड़ित व्यक्तियों के संवैधानिक अधिकारों को पुनः स्थापित करता है, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण सिद्धांत भी स्पष्ट करता है कि पुनर्वास का अर्थ नियंत्रण नहीं होता और संरक्षण के नाम पर कारावास को वैध नहीं ठहराया जा सकता। 
  • न्यायालय ने दो टूक शब्दों में कहा कि कोई भी कल्याणकारी मंशा संविधान से ऊपर नहीं हो सकती और राज्य की भूमिका सहायता तक सीमित रहनी चाहिए, नियंत्रण तक नहीं। 
  • कुल मिलाकर, यह निर्णय भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में पीड़ित-केंद्रित और अधिकार-आधारित दृष्टिकोण को मजबूती प्रदान करता है तथा यह सुनिश्चित करता है कि मानव तस्करी से बचे लोग संरक्षण के नाम पर अपनी स्वतंत्रता से वंचित न हों।
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