संदर्भ
- वर्तमान वैश्विक व्यवस्था तीव्र भू-राजनीतिक एवं आर्थिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। एक ओर पश्चिमी देशों के नेतृत्व वाली मौजूदा वित्तीय संस्थाओं में विकासशील देशों के प्रतिनिधित्व को लेकर असंतोष बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वैश्विक दक्षिण एक अधिक न्यायसंगत और बहुध्रुवीय व्यवस्था की मांग कर रहा है। इसी संदर्भ में ब्रिक्स का महत्व बढ़ा है।
- 2011 में ब्रिक्स के पाँच सदस्य देश वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 20 प्रतिशत योगदान करते थे, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में उनका मतदान हिस्सा केवल 11 प्रतिशत था। आज विस्तारित ब्रिक्स वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 40 प्रतिशत और विश्व की करीब 55 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। इसके बावजूद वैश्विक वित्तीय संस्थाओं में उसका प्रभाव उसके आर्थिक भार के अनुपात में नहीं बढ़ा है। इसलिए भारत के सामने दोहरी चुनौती है -
- ब्रिक्स की आर्थिक एवं संस्थागत क्षमता को बढ़ाना तथा
- ब्रिक्स को किसी एक देश की भू-राजनीतिक रणनीति का उपकरण बनने से रोकना।
ब्रिक्स की भू-राजनीतिक दुविधा
- ब्रिक्स की सबसे बड़ी ताकत इसकी विविधता है, लेकिन यही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी है। रूस, चीन और ईरान ब्रिक्स को अपेक्षाकृत पश्चिम-विरोधी मंच के रूप में देखना चाहते हैं, जबकि भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका इसे गैर-पश्चिमी लेकिन पश्चिम-विरोधी नहीं मंच के रूप में देखते हैं।
- भारत के लिए यह अंतर महत्वपूर्ण है। अमेरिका के साथ भारत के व्यापार, प्रौद्योगिकी, रक्षा और रणनीतिक संबंध लगातार महत्वपूर्ण हो रहे हैं। ऐसे में बीजिंग और मॉस्को के नेतृत्व में चलने वाले आक्रामक डॉलर-विमुक्ति अभियान का हिस्सा बनना भारत के दीर्घकालिक हित में नहीं होगा।
- भारत की नीति इसलिए रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित होनी चाहिए। इसका अर्थ है कि भारत ब्रिक्स के माध्यम से वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार की माँग करे, लेकिन किसी गुटीय संघर्ष का हिस्सा न बने।
वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में सुधार
- ब्रिक्स की प्रासंगिकता का प्रमुख आधार अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं में प्रतिनिधित्व का प्रश्न है। उभरती अर्थव्यवस्थाएँ आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में पहले से कहीं अधिक योगदान देती हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में उनकी निर्णयकारी शक्ति अभी भी उनके आर्थिक महत्व के अनुरूप नहीं है।
- अतः ब्रिक्स को मौजूदा संस्थाओं को समाप्त करने के बजाय उनमें कोटा, मतदान अधिकार और निर्णय प्रक्रिया में सुधार के लिए सामूहिक दबाव बनाना चाहिए। भारत के लिए यह रास्ता अधिक व्यावहारिक है, क्योंकि इससे वह वैश्विक वित्तीय सुधार का समर्थक बन सकता है, बिना अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ प्रत्यक्ष टकराव के।
न्यू डेवलपमेंट बैंक की भूमिका
- ब्रिक्स द्वारा स्थापित न्यू डेवलपमेंट बैंक वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में समूह का सबसे ठोस संस्थागत साधन है। इसकी स्थापना 2015 में बुनियादी ढाँचे और सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने के उद्देश्य से की गई थी।
- हालाँकि, इसका प्रदर्शन अभी भी इसकी संभावित क्षमता से कम है। लगभग एक दशक से अधिक समय में बैंक ने करीब 139 परियोजनाओं के लिए लगभग 43 अरब डॉलर की स्वीकृति दी है। इसके विपरीत, लगभग समान समय में स्थापित एशियाई अवसंरचना निवेश बैंक ने 350 परियोजनाओं के लिए लगभग 69 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता की है तथा उसके पास उच्चतम स्तर की ऋण-विश्वसनीयता रेटिंग भी है।
न्यू डेवलपमेंट बैंक की प्रमुख समस्याएँ
- सीमित पूंजी एवं परिसंपत्ति आधार;
- ऋण वितरण की धीमी गति;
- सीमित सदस्यता;
- संस्थापक देशों की असमान आर्थिक क्षमता;
- प्रतिबंधों और भू-राजनीतिक तनावों का प्रभाव।
इसलिए ब्रिक्स को राजनीतिक घोषणाओं से आगे बढ़कर न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूत करना चाहिए।
पूंजी और रूस की समस्या
- बैंक के पूंजी विस्तार में रूस की स्थिति एक बड़ी चुनौती है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के कारण रूस की वित्तीय क्षमता प्रभावित हुई है। इसका असर न्यू डेवलपमेंट बैंक की ऋण-विश्वसनीयता और डॉलर में वित्त जुटाने की लागत पर भी पड़ा है।
- यहाँ एक महत्वपूर्ण विरोधाभास दिखाई देता है। चीन और रूस जहाँ डॉलर पर निर्भरता कम करने की वकालत करते हैं, वहीं न्यू डेवलपमेंट बैंक को अपनी उच्च ऋण-विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए मार्च 2022 के बाद रूस को नया ऋण देने से बचना पड़ा।
- इससे स्पष्ट होता है कि डॉलर-विमुक्ति केवल राजनीतिक घोषणा से संभव नहीं है। इसके लिए मजबूत वित्तीय संस्थान, स्थिर अर्थव्यवस्था, गहरे पूंजी बाजार और विश्वसनीय मुद्राएँ आवश्यक हैं।
स्थानीय मुद्रा में वित्तपोषण
- स्थानीय मुद्राओं में ऋण देना ब्रिक्स की वित्तीय रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है। इससे विकासशील देशों को विनिमय दर जोखिम कम करने और डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता से बचने में सहायता मिल सकती है।
- लेकिन भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि डॉलर की निर्भरता घटाने की प्रक्रिया किसी एक अन्य मुद्रा, विशेषकर चीनी रेनमिन्बी पर अत्यधिक निर्भरता में न बदल जाए। वर्तमान में न्यू डेवलपमेंट बैंक की स्थानीय मुद्रा गतिविधियों में रेनमिन्बी का प्रभुत्व दिखाई देता है। अतः भारत के लिए सही दृष्टिकोण “डॉलर का विरोध” नहीं, बल्कि “वित्तीय विकल्पों का विस्तार” होना चाहिए।
रुपये के बॉन्ड का महत्व
- इस संदर्भ में न्यू डेवलपमेंट बैंक द्वारा रुपये में बॉन्ड जारी करना भारत के लिए महत्वपूर्ण अवसर है। इससे भारतीय पूंजी बाजार को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ावा मिलेगा और रुपये में वित्तपोषण का आधार मजबूत होगा। वस्तुतः रुपये में बॉन्ड से
- रुपये के अंतरराष्ट्रीय उपयोग को बढ़ावा मिलेगा;
- विनिमय दर जोखिम कम करने में मदद मिलेगी;
- भारतीय वित्तीय बाजारों की गहराई बढ़ेगी;
- विकासशील देशों को स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण का वैकल्पिक मॉडल मिलेगा।
- भारत को इसलिए इस पहल को शीघ्र पूरा कराने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
भारत के लिए न्यू डेवलपमेंट बैंक का महत्व
- न्यू डेवलपमेंट बैंक भारत के लिए उपयोगी विकास वित्त का स्रोत बन चुका है। भारत से संबंधित लगभग 32 परियोजनाओं के लिए करीब 10 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता इसका उदाहरण है। मेट्रो रेल तथा दिल्ली-गाजियाबाद-मेरठ क्षेत्रीय तीव्र परिवहन प्रणाली जैसी परियोजनाओं में इसकी भूमिका रही है।
- यदि बैंक अपनी पूंजी, सदस्यता और ऋण वितरण क्षमता बढ़ाता है, तो भारत सहित अन्य विकासशील देशों को बुनियादी ढाँचे और हरित विकास के लिए वैकल्पिक वित्तीय संसाधन मिल सकते हैं।
भारत की रणनीति
भारत को ब्रिक्स में निम्नलिखित प्राथमिकताओं पर ध्यान देना चाहिए-
- न्यू डेवलपमेंट बैंक का पूंजी आधार एवं सदस्यता बढ़ाना।
- ऋण वितरण की गति में सुधार करना।
- स्थानीय मुद्रा में ऋण का विस्तार करना, लेकिन किसी एक मुद्रा के प्रभुत्व से बचना।
- रुपये में बॉन्ड जारी करने की प्रक्रिया को शीघ्र पूरा करना।
- अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष एवं विश्व बैंक में प्रतिनिधित्व और मतदान सुधार के लिए सामूहिक प्रयास करना।
- ब्रिक्स को पश्चिम-विरोधी मंच के बजाय वैश्विक दक्षिण के विकास और प्रतिनिधित्व का मंच बनाए रखना।
- भारत की डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, हरित ऊर्जा और सतत विकास से संबंधित अनुभवों को अन्य सदस्य देशों के साथ साझा करना।
निष्कर्ष
- ब्रिक्स की वास्तविक सफलता उसकी सदस्य संख्या या संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद से नहीं, बल्कि उसकी संस्थागत क्षमता और ठोस आर्थिक परिणामों से निर्धारित होगी। न्यू डेवलपमेंट बैंक, स्थानीय मुद्रा वित्तपोषण और विकास परियोजनाएँ ब्रिक्स को घोषणात्मक मंच से प्रभावी आर्थिक मंच में बदल सकती हैं।
- भारत को इस दिशा में सुधारवादी बहुपक्षवाद और रणनीतिक स्वायत्तता का मार्ग अपनाना चाहिए। उसे न तो पश्चिम-विरोधी ध्रुवीकरण का हिस्सा बनना चाहिए और न ही चीन-केंद्रित वित्तीय व्यवस्था को मजबूत करना चाहिए।
- अंततः भारत की नीति का मूल मंत्र होना चाहिए - “डॉलर-विरोध नहीं, वित्तीय विविधीकरण; पश्चिम-विरोध नहीं, वैश्विक दक्षिण का सशक्तीकरण; और घोषणाओं से अधिक संस्थागत परिणाम।” यही दृष्टिकोण ब्रिक्स को अधिक प्रभावी बनाने के साथ-साथ भारत के दीर्घकालिक आर्थिक और रणनीतिक हितों की भी रक्षा करेगा।