संदर्भ
- चीन की राज्य परिषद (स्टेट काउंसिल) ने 22 मई को एक बड़ा नीतिगत कदम उठाते हुए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके तहत अब किसी भी व्यक्ति को उसके हुकोउ (Hukou - निवास पंजीकरण स्थिति) की परवाह किए बिना, उसके वर्तमान निवास स्थान पर ही बुनियादी सार्वजनिक सेवाएं प्रदान की जाएंगी।
- केंद्र सरकार ने स्थानीय प्रशासनों - विशेष रूप से बड़े महानगरों (Megacities) को निर्देश दिया है कि वे अपने क्षेत्र में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए शिक्षा, किफायती आवास, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा बीमा जैसी बुनियादी सुविधाओं को मजबूत करें। वस्तुतः इस पहल का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में आए करोड़ों प्रवासियों को महानगरों की मुख्यधारा में पूरी तरह से एकीकृत करना और लास्ट माइल (अंतिम छोर) की बाधाओं को दूर करना है।
हुकोउ व्यवस्था क्या है ?
1950 के दशक में शुरू की गई हुकोउ प्रणाली चीन के कम्युनिस्ट शासन का सामाजिक नियंत्रण बनाए रखने का एक प्रमुख जरिया रही है। यह व्यवस्था नागरिकों को उनके आधिकारिक पंजीकरण के आधार पर ग्रामीण या शहरी के रूप में बांटती है।
- माओ का दौर : उस समय इसका उपयोग शहरों की तरफ प्रवासन को रोकने और सीमित संसाधनों के प्रबंधन के लिए किया जाता था।
- 1978 के आर्थिक सुधार : इसके बाद नियमों में थोड़ी ढील दी गई ताकि औद्योगिक और शहरी केंद्रों को सस्ता श्रम (लेबर) मिल सके।
- आंतरिक पासपोर्ट का संकट : नियमों में ढील के बावजूद हुकोउ व्यवस्था एक आंतरिक पासपोर्ट की तरह काम करती रही, जिसके कारण प्रवासियों को उनके कार्यस्थल वाले शहरों में सरकारी सुविधाओं और सामाजिक सुरक्षा का लाभ नहीं मिल पाता था।
- वर्ष 2014 से सरकार ने राष्ट्रीय शहरीकरण योजनाओं को गति देने के लिए इसमें क्रमिक सुधार शुरू किए। पहले छोटे शहरों में ग्रामीण हुकोउ को शहरी हुकोउ में बदला गया। धीरे-धीरे झेजियांग जैसे समृद्ध प्रांत भी इसमें शामिल हुए, लेकिन चीन के बड़े महानगर (Megacities) अब तक इस सुधार के दायरे से बाहर बने हुए थे।
आर्थिक मजबूरी और टैलेंट डिविडेंड की चाह
यह नया बदलाव जुलाई 2024 की पांच वर्षीय जन-केंद्रित शहरीकरण कार्य योजना का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य 2029 तक चीन की स्थायी शहरी आबादी को बढ़ाकर करीब 70% (लगभग 98.7 करोड़) करना है। सरकार के इस कदम के पीछे कई गहरी जनसांख्यिकीय और आर्थिक वजहें हैं:
- विशाल तैरती आबादी (Floating Population) : चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, देश में ग्रामीण प्रवासियों की संख्या करीब 35.8 करोड़ है, जो कुल आबादी का 25% हिस्सा है।
- घरेलू खपत बढ़ाना : सरकार का मानना है कि प्रवासियों को शहरों में स्थायी अधिकार देने से घरेलू बाजार में खपत बढ़ेगी और देश के भीतर प्रतिभा व पूँजी का मुक्त प्रवाह आसान होगा।
- ह्यूमन रिसोर्स से ह्यूमन कैपिटल : चीन अब अपनी 15वीं पंचवर्षीय योजना के तहत मानव संसाधन को मानव पूंजी में बदलने की रणनीति पर काम कर रहा है। उद्देश्य साफ है कि जनसंख्या के सीधे लाभ (Demographic Dividend) से आगे बढ़कर कौशल और ज्ञान आधारित लाभ (Talent Dividend) कमाना।
गिग इकोनॉमी का उभार और श्रम नियंत्रण
- इस नीतिगत बदलाव के केंद्र में चीन का तेजी से बढ़ता गिग और प्लेटफॉर्म कार्यबल (जैसे डिलीवरी बॉय, फ्रीलांसर आदि) भी है। चीन के कुल 74 करोड़ के कार्यबल में से 20 करोड़ से अधिक लोग इस अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े हैं, जिनमें से अधिकांश ग्रामीण प्रवासी हैं।
- कोविड-19 महामारी के बाद से इस क्षेत्र में काम की अनिश्चित परिस्थितियों और लगातार बढ़ते श्रमिक असंतोष ने सरकार की चिंता बढ़ा दी है। कम्युनिस्ट पार्टी इस बड़े श्रमिक वर्ग को केवल आर्थिक मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि राजनीतिक रूप से भी विनियमित (Regulate) और नियंत्रित रखना चाहती है।
ढांचागत कमियां: कागजी वादे बनाम जमीनी हकीकत
दिलचस्प बात यह है कि इस नए सरकारी दस्तावेज में खुद हुकोउ शब्द का प्रयोग केवल एक बार किया गया है, और इसकी जगह स्थायी निवासी आबादी जैसे समावेशी शब्दों को तरजीह दी गई है। इसके बावजूद, कुछ ऐसी बुनियादी कमियाँ हैं जो इन सुधारों की राह में रोड़ा बनी हुई हैं:
- स्थानीय सरकारों पर वित्तीय बोझ : जन-कल्याणकारी सेवाएं देने की पूरी जिम्मेदारी स्थानीय सरकारों की है, जिनका बजट काफी हद तक केंद्र से मिलने वाले फंड और अस्थिर रियल एस्टेट सेक्टर पर निर्भर करता है। केंद्र ने फंड देने का संकेत तो दिया है, लेकिन किसी नए बजट की ठोस घोषणा नहीं की है।
- समानता का अभाव : समृद्ध तटीय शहरों और पिछड़े आंतरिक प्रांतों के सामाजिक बीमा मानकों में भारी अंतर है। नतीजतन, प्रवासी श्रमिकों का मासिक प्रीमियम (योगदान) तो ऊंची दरों पर काटा जाता है, लेकिन उन्हें मिलने वाले लाभ और मेडिकल क्लेम (Reimbursement) काफी कम होते हैं।
- नियोक्ताओं पर ढीली पकड़ : ये दिशा-निर्देश गिग इकोनॉमी की बड़ी कंपनियों को अपने कर्मचारियों को अनिवार्य रूप से इन कल्याणकारी योजनाओं में शामिल करने के लिए मजबूर नहीं करते हैं।
निष्कर्ष
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नीतियों में फेरबदल और नए दिशा-निर्देशों के बावजूद, स्थानीय प्रशासनों के पास अब भी बहुत अधिक विवेकाधिकार (Discretionary Powers) मौजूद हैं। यह पूरी कवायद साफ संकेत देती है कि चीन की ऐतिहासिक और कठोर हुकोउ प्रणाली आज भी अपनी जगह पर मजबूती से टिकी हुई है। प्रवासियों को लुभाने के प्रशासनिक दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर उनके अधिकारों और स्थिति (Status quo) में कोई क्रांतिकारी बदलाव फिलहाल नजर नहीं आता।