संदर्भ
भारत में पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिलाने की नीति यानी E20 इन दिनों राजनीतिक और आर्थिक बहस का बड़ा मुद्दा बन गई है। विपक्षी नेता राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल सहित कई नेताओं ने आरोप लगाया है कि सरकार E20 को लोगों पर थोप रही है और इससे पुराने वाहनों को नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, सरकार का तर्क है कि एथेनॉल मिश्रण से कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी, विदेशी मुद्रा की बचत होगी और किसानों को कृषि उत्पादों के लिए अतिरिक्त बाजार मिलेगा। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि E20 को लेकर वास्तविक स्थिति क्या है।
एथेनॉल उत्पादन में बड़ी छलांग
- सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण के लक्ष्य को पूरा करने के लिए 10–11 अरब लीटर एथेनॉल उत्पादन का लक्ष्य रखा था। इसका उद्देश्य पेट्रोल की जरूरत का एक हिस्सा घरेलू एथेनॉल से पूरा करना और कच्चे तेल के आयात पर खर्च होने वाली विदेशी मुद्रा को बचाना था।
- नीति को बढ़ावा मिलने के बाद देश की डिस्टिलरी क्षमता में तेजी से विस्तार हुआ है। वर्तमान में करीब 500 डिस्टिलरी लगभग 18–20 अरब लीटर एथेनॉल उत्पादन करने में सक्षम हैं। नवंबर से अक्टूबर तक चलने वाले मौजूदा एथेनॉल वर्ष के लिए तेल कंपनियों ने करीब 10.5 अरब लीटर एथेनॉल खरीदने के अनुबंध किए हैं। इससे स्पष्ट है कि भारत ने E20 के लिए आवश्यक उत्पादन क्षमता का मजबूत आधार तैयार कर लिया है।
क्या अमेरिका से मक्का आयात करना पड़ेगा?
- E20 की बढ़ती मांग के साथ यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भारत को अमेरिका से मक्का या अन्य कृषि उत्पादों का आयात बढ़ाना पड़ेगा। फिलहाल वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों में एथेनॉल या मक्के के आयात में किसी बड़ी वृद्धि का प्रमाण नहीं मिलता। पेट्रोल में मिश्रण के लिए सीधे एथेनॉल का आयात भी प्रतिबंधित है। हालांकि, अमेरिकी कॉर्न लॉबी भारत से मक्के का आयात बढ़ाने की मांग करती रही है।
- सरकार के आंकड़ों के अनुसार, मौजूदा एथेनॉल वर्ष में पेट्रोल में मिश्रित होने वाले एथेनॉल का करीब 45 प्रतिशत मक्के, 22 प्रतिशत एफसीआई के चावल, 16 प्रतिशत गन्ने के रस, 10 प्रतिशत बी-हेवी शीरे, 4.5 प्रतिशत खराब खाद्यान्न और 1.1 प्रतिशत सी-हेवी शीरे से आएगा।
- भारत में मक्के का घरेलू उत्पादन भी तेजी से बढ़ा है। तीन वर्षों में इसका उत्पादन लगभग 45 प्रतिशत बढ़कर 2025-26 में 5.5 करोड़ टन हो गया। इसका 20 प्रतिशत से अधिक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में इस्तेमाल हो रहा है। इसलिए फिलहाल मक्के के आयात की अनिवार्यता दिखाई नहीं देती।
- हालांकि, भविष्य में स्थिति बदल सकती है। गन्ने के रस और बी-हेवी शीरे का इस्तेमाल चीनी उत्पादन में भी होता है। यदि मानसून कमजोर पड़ता है, फसल को नुकसान होता है या खाद्यान्न की कमी पैदा होती है, तो एथेनॉल के लिए चावल और गन्ने के उत्पादों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। ऐसी स्थिति में मक्के की मांग और उसके आयात की संभावना बढ़ सकती है।
E20 और पुराने वाहनों का मुद्दा
- E20 को लेकर सबसे बड़ी चिंता वाहनों की सुरक्षा से जुड़ी है। अप्रैल 2023 के बाद निर्मित वाहनों को भारत स्टेज-6 फेज-2 यानी रियल ड्राइविंग एमिशन मानकों के तहत E20 के अनुकूल बनाया गया है। इनमें एथेनॉल-प्रतिरोधी रबर और प्लास्टिक सामग्री, बेहतर ईंधन पाइप, उन्नत पंप सील और संशोधित इंजन कंट्रोल यूनिट जैसी तकनीकी व्यवस्थाएं शामिल हैं।
- ऐसे करीब 7 करोड़ वाहन भारत के सक्रिय पेट्रोल वाहनों का लगभग 23 प्रतिशत हैं और इनके लिए E20 से जोखिम अपेक्षाकृत कम माना जाता है। असली चिंता पुराने वाहनों को लेकर है। करीब 77 प्रतिशत पेट्रोल वाहन ऐसे हैं जिन्हें E5 या E10 के लिए डिजाइन किया गया था।
- एथेनॉल एक ध्रुवीय विलायक है और पुराने रबर तथा प्लास्टिक पदार्थों को प्रभावित कर सकता है। लंबे समय में इससे ईंधन पाइप कठोर होकर टूट सकते हैं। एथेनॉल वातावरण से नमी भी सोखता है। लंबे समय तक खड़े रहने वाले वाहनों में एथेनॉल और पानी अलग होकर नीचे जमा हो सकते हैं, जिससे टैंक में जंग, ईंधन पंप को नुकसान और फिल्टर में गाद जैसी समस्याएं पैदा होने की आशंका रहती है।
माइलेज पर अलग-अलग दावे
- E20 के कारण माइलेज में कमी को लेकर भी अलग-अलग निष्कर्ष सामने आए हैं। लोकलसर्किल्स के एक उपभोक्ता सर्वेक्षण में 66 प्रतिशत पुराने वाहन मालिकों ने 10 प्रतिशत से अधिक माइलेज कम होने की बात कही, जबकि 55 प्रतिशत ने रखरखाव खर्च बढ़ने की जानकारी दी।
- इसके विपरीत, आईआईटी कानपुर की इंजन रिसर्च प्रयोगशाला का कहना है कि E20 से वाहनों को कोई उल्लेखनीय नुकसान नहीं होता और ईंधन दक्षता में कमी 5 प्रतिशत से कम रहती है। उसके अनुसार, माइलेज संबंधी शिकायतों पर ड्राइविंग की आदतों, यातायात और वाहन के रखरखाव का भी असर पड़ता है।
- सरकार ने संसद में बताया कि सरकारी और वाहन निर्माताओं के अध्ययनों में E10 के लिए डिजाइन किए गए कुछ वाहनों में ईंधन दक्षता में करीब 2–6 प्रतिशत की कमी देखी गई। इसलिए यह कहना उचित होगा कि E20 का प्रभाव सभी वाहनों में एक जैसा नहीं है।
क्या इंजन को नुकसान हो रहा है?
- इस प्रश्न पर भी मतभेद हैं। स्वतंत्र मैकेनिक और कुछ ऑटोमोबाइल समुदाय ईंधन पंप तथा इंजेक्टर की खराबी को एथेनॉल के विलायक गुण और कम चिकनाई से जोड़ते हैं। दूसरी ओर, सरकार और वाहन निर्माता बड़े पैमाने पर किए गए सर्विस रिकॉर्ड का हवाला देते हुए E20 से व्यापक इंजन क्षति के दावों को खारिज करते हैं।
- सरकार के अनुसार, एक प्रमुख वाहन निर्माता ने वित्त वर्ष 2025-26 में 2.84 करोड़ वाहनों की सर्विस की, जिनमें करीब 1.5 करोड़ पुराने वाहन थे। इनमें E20 से संबंधित इंजन क्षति के प्रमाण नहीं मिले। एक अन्य प्रमुख दोपहिया वाहन निर्माता ने भी इसी तरह के परिणाम बताए।
- इससे संकेत मिलता है कि E20 के कारण बड़े पैमाने पर इंजन फेल होने का स्पष्ट प्रमाण अभी उपलब्ध नहीं है। फिर भी पुराने वाहनों में ईंधन प्रणाली, माइलेज और रखरखाव से जुड़ी समस्याओं की संभावना को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
विदेशी मुद्रा की बचत कितना बड़ा लाभ?
- एथेनॉल मिश्रण का सबसे महत्वपूर्ण लाभ ऊर्जा सुरक्षा और विदेशी मुद्रा की बचत है। सरकार के अनुसार, अब तक एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम से लगभग ₹2 लाख करोड़ की विदेशी मुद्रा बचाई गई है और करीब 3.2 करोड़ टन कच्चे तेल के आयात का स्थानापन्न हुआ है।
- करीब 10 अरब लीटर पेट्रोल की जगह एथेनॉल का इस्तेमाल लगभग एक महीने के कच्चे तेल के आयात की जरूरत को कम कर सकता है। ऐसे में एथेनॉल भारत की तेल आयात निर्भरता घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
- हालांकि, एथेनॉल को पेट्रोल से सीधे सस्ता मानना सही नहीं होगा। तेल कंपनियां मिश्रण के लिए एथेनॉल लगभग ₹70 प्रति लीटर की दर से खरीदती हैं, जबकि पेट्रोल का पंप मूल्य करीब ₹105 प्रति लीटर है। दोनों ईंधनों की लागत और कर व्यवस्था अलग-अलग है। इसलिए केवल इन कीमतों की तुलना से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि एथेनॉल ने पेट्रोल की कीमतों को कितना कम रखा है।
आगे की राह क्या हो?
- E20 भारत के लिए ऊर्जा सुरक्षा, विदेशी मुद्रा बचत और कृषि क्षेत्र के विस्तार का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकता है। लेकिन इसके साथ पुराने वाहनों के मालिकों की चिंताओं को भी गंभीरता से लेना होगा।
- ब्राजील की तरह भारत में भी एथेनॉल मिश्रण की दिशा में वाहन तकनीक और ईंधन व्यवस्था में बदलाव को चरणबद्ध और पारदर्शी तरीके से आगे बढ़ाया जा सकता था। भारत ने 2022 में E10 का लक्ष्य हासिल किया और केवल तीन वर्षों में E20 तक पहुंच गया। इतनी तेज गति से हुए बदलाव के बीच उपभोक्ताओं को पर्याप्त जानकारी और वाहन-विशिष्ट सलाह मिलना जरूरी है।
- इसलिए E20 पर बहस को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित करने के बजाय वैज्ञानिक प्रमाण, स्वतंत्र परीक्षण और उपभोक्ता हित के आधार पर आगे बढ़ाया जाना चाहिए। एथेनॉल भारत की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में उपयोगी कदम हो सकता है, लेकिन इसकी सफलता तभी सुनिश्चित होगी जब किसानों, सरकार, वाहन निर्माताओं और उपभोक्ताओं आदि सभी के हितों के बीच संतुलन कायम किया जाए।