संदर्भ
आपराधिक न्याय व्यवस्था में पुलिस को अपराध की जांच, साक्ष्य जुटाने और आरोपी से पूछताछ के लिए पर्याप्त अधिकार देना आवश्यक है। वहीं, आरोपी की व्यक्तिगत स्वतंत्रता और उसके कानूनी अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। इसी संतुलन को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने The State of Andhra Pradesh vs. Suda Suresh Veera Venkata Naga Raju मामले में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के तहत पुलिस हिरासत और पूछताछ के दौरान वकील की मौजूदगी को लेकर महत्वपूर्ण फैसला दिया है। यह निर्णय पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) और नई भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के बीच पुलिस रिमांड से जुड़े महत्वपूर्ण अंतर को भी स्पष्ट करता है।
पुलिस हिरासत की अवधि में बदलाव
- पुरानी CrPC की धारा 167 के तहत पुलिस हिरासत अधिकतम 15 दिनों तक ही दी जा सकती थी और यह अवधि रिमांड के शुरुआती 15 दिनों तक सीमित थी। हालांकि, इन 15 दिनों के भीतर मजिस्ट्रेट हिरासत का स्वरूप बदल सकता था, अर्थात पुलिस हिरासत को न्यायिक हिरासत में और न्यायिक हिरासत को पुलिस हिरासत में परिवर्तित किया जा सकता था।
- बीएनएसएस की धारा 187(2) ने इस व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब अधिकतम 15 दिनों की पुलिस हिरासत को एक साथ देना आवश्यक नहीं है। इसे अलग-अलग चरणों में भी दिया जा सकता है। गंभीर अपराधों में यह 15 दिन कुल 90 दिनों की अनुमत हिरासत अवधि के शुरुआती 60 दिनों के भीतर, जबकि अन्य अपराधों में कुल 60 दिनों की अवधि के शुरुआती 40 दिनों के भीतर दिए जा सकते हैं।
- इस बदलाव का उद्देश्य ऐसी परिस्थितियों से निपटना है, जब जांच के दौरान बाद में कोई नया तथ्य, महत्वपूर्ण सुराग या बरामदगी सामने आती है और आरोपी से दोबारा पुलिस पूछताछ आवश्यक हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट के सामने क्या था मामला?
- मामला हिरासत में हुई एक मौत से संबंधित था। मृतक का शव बरामद नहीं हुआ था, जबकि सीसीटीवी प्रणाली की मूल हार्ड डिस्क भी जांच एजेंसी के हाथ नहीं लगी थी। इसके अलावा, भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) के तहत महत्वपूर्ण बरामदगी की संभावना बनी हुई थी।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस द्वारा मांगे गए 12 दिनों के बजाय आठ दिनों की पुलिस हिरासत मंजूर की। साथ ही आरोपी को अपनी पसंद के दो वकील नामित करने की अनुमति दी गई, जिनमें से एक वकील किसी भी समय पूछताछ के दौरान मौजूद रह सकता था। मजिस्ट्रेट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि किसी भी परिस्थिति में पुलिस हिरासत की अवधि नहीं बढ़ाई जाएगी।
- मामला आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचा तो उसने पुलिस हिरासत की अवधि और जांच के दौरान वकील की मौजूदगी से जुड़ी कुछ शर्तों में बदलाव किया। राज्य सरकार ने इन शर्तों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। उसका तर्क था कि इससे जांच अधिकारी के स्वतंत्र और प्रभावी तरीके से जांच करने के अधिकार पर असर पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
- सुप्रीम कोर्ट ने जांच एजेंसी की आशंकाओं को वास्तविक और उचित माना। अदालत ने कहा कि जब बीएनएसएस ने पुलिस हिरासत को शुरुआती 40 या 60 दिनों के भीतर अलग-अलग चरणों में लेने की अनुमति दी है, तो मजिस्ट्रेट या अदालत ऐसी पूर्ण और अपरिवर्तनीय समय-सीमा निर्धारित नहीं कर सकती, जिससे कानून द्वारा उपलब्ध यह विकल्प ही समाप्त हो जाए।
- इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की अतिरिक्त सात दिनों की पुलिस हिरासत की अनुमति दी। हालांकि, निचली अदालतों द्वारा दी गई हिरासत सहित पुलिस हिरासत की कुल अवधि 15 दिनों से अधिक नहीं हो सकती।
- इस निर्णय का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पुलिस को असीमित हिरासत का अधिकार नहीं दिया गया है। 15 दिनों की अधिकतम सीमा कायम है, लेकिन इन दिनों के इस्तेमाल का समय अब पहले की तरह केवल शुरुआती 15 दिनों तक सीमित नहीं है।
पूछताछ के दौरान वकील की मौजूदगी
- बीएनएसएस की धारा 38 के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है। हालांकि, कानून स्पष्ट करता है कि यह अधिकार पूछताछ की पूरी अवधि में वकील की लगातार मौजूदगी का अधिकार नहीं है।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रावधान की सामान्य व्याख्या से यह स्पष्ट है कि वकील की लगातार और शारीरिक मौजूदगी प्रत्येक पूछताछ सत्र के दौरान अनिवार्य नहीं है। यदि वकील को पूरी पूछताछ के दौरान लगातार मौजूद रहने का असीमित अधिकार दिया जाए, तो यह धारा 38 के उद्देश्य और सीमा से आगे चला जाएगा।
- अदालत ने इसलिए वकील की मौजूदगी को एक संतुलित व्यवस्था के रूप में स्वीकार किया। वकील पूछताछ स्थल पर ऐसी स्थिति में मौजूद रह सकता है, जहां वह आरोपी को देख सके। हालांकि, उसे जांच की प्रक्रिया में किसी भी प्रकार से हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं होगी।
- यह व्यवस्था आरोपी के कानूनी अधिकारों और जांच एजेंसी की स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है।
वीडियोग्राफी से पारदर्शिता
- सुप्रीम कोर्ट ने पूछताछ और जांच की वीडियोग्राफी को लेकर भी महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया। अदालत के अनुसार, आरोपी को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने की पूरी प्रक्रिया की लगातार वीडियोग्राफी करना आवश्यक नहीं है।
- इसके बजाय वास्तविक पूछताछ सत्र की ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग तथा आरोपी की मौजूदगी में होने वाली खोज या बरामदगी की कार्रवाई की रिकॉर्डिंग पर्याप्त होगी। इससे जांच प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ सकती है और बाद में उत्पन्न होने वाले विवादों की स्थिति में रिकॉर्ड भी उपलब्ध रहेगा।
डिफॉल्ट जमानत और आरोपी के अधिकार
- बीएनएसएस की धारा 187(3) के तहत गंभीर अपराधों में जांच की निर्धारित अवधि 90 दिन और अन्य अपराधों में 60 दिन तक हो सकती है। यदि निर्धारित अवधि में जांच पूरी नहीं होती और कानून की आवश्यक शर्तें पूरी हो जाती हैं, तो आरोपी को डिफॉल्ट जमानत का अधिकार प्राप्त हो सकता है।
- इस प्रकार बीएनएसएस ने जांच एजेंसियों को पुलिस हिरासत के मामले में अधिक लचीलापन दिया है, लेकिन इसके साथ न्यायिक निगरानी और आरोपी के वैधानिक अधिकारों को भी बनाए रखा है।
निष्कर्ष
- सुदा सुरेश फैसला बीएनएसएस के तहत पुलिस हिरासत की नई व्यवस्था को समझने की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसने स्पष्ट किया कि पुलिस हिरासत की अधिकतम अवधि 15 दिन ही रहेगी, लेकिन अब इसे शुरुआती 15 दिनों तक सीमित रखने के बजाय कानून में निर्धारित शुरुआती 40 या 60 दिनों के भीतर अलग-अलग चरणों में दिया जा सकता है। साथ ही, आरोपी को अपनी पसंद के वकील से मिलने का अधिकार है, लेकिन पूछताछ के दौरान वकील की लगातार भौतिक मौजूदगी अनिवार्य नहीं है। वकील आरोपी को देख सकने की स्थिति में मौजूद रह सकता है, लेकिन जांच में हस्तक्षेप नहीं कर सकता।
- अंततः, इस फैसले का मूल संदेश “प्रभावी जांच और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन” है। लोकतांत्रिक न्याय व्यवस्था में पुलिस को अपराध की प्रभावी जांच के लिए पर्याप्त अधिकार मिलना जरूरी है, लेकिन इन अधिकारों का प्रयोग न्यायिक निगरानी, पारदर्शिता और आरोपी के वैधानिक एवं संवैधानिक अधिकारों के अनुरूप होना भी उतना ही आवश्यक है।