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भारत में कोर मुद्रास्फीति : वर्तमान परिदृश्य और RBI की नीतियाँ

(प्रारंभिक परीक्षा: भारतीय अर्थव्यवस्था)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय)

संदर्भ 

फरवरी 2023 से फरवरी 2025 के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अपनी प्रमुख ‘रेपो’ दर को 6.5% पर स्थिर रखा। इस अवधि में औसत उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति दर लगभग 5.2% और उपभोक्ता खाद्य मुद्रास्फीति (CFPI) 7.6% के स्तर पर रही। इसका प्रभाव नीति-निर्माण एवं आर्थिक स्थिरता दोनों पर पड़ा है।

कोर मुद्रास्फीति के बारे में

  • परिभाषा : कोर मुद्रास्फीति दर की गणना उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) से खाद्य एवं ईंधन से संबंधित वस्तुओं को निकालकर की जाती है अर्थात कोर मुद्रास्फीति में खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव को शामिल नहीं किया जाता है। इसके आकलन में किसी अर्थव्यवस्था में माँग एवं उत्पादन के पारंपरिक ढाँचे के बाहर के मदों पर ध्यान नहीं दिया जाता है।
    • सामान्य शब्दों में, यदि खाद्य एवं ईंधन (ऊर्जा) की कीमतों में वृद्धि होती है किंतु अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं की कीमतों में वृद्धि नहीं होती है तो भी कोर मुद्रास्फीति स्थिर बनी रह सकती है।
    • यह मुद्रास्फीति के अंतर्निहित प्रवृत्तियों को दर्शाता है जो केंद्रीय बैंक को यह तय करने में मदद कर सकता है कि ब्याज दरों को कब एवं कैसे समायोजित करना है। 
  • उद्देश्य : अधिक स्थिर एवं दीर्घकालिक पूर्ति व मांग की प्रवृत्तियों को समझना।
  • कोर मुद्रास्फीति का औसत : फरवरी 2023 से जनवरी 2025 तक कोर मुद्रास्फीति का औसत 4.1% था।
    • यह दर RBI के मध्यम अवधि के कोर मुद्रास्फीति लक्ष्य 4% के आस-पास रही है।

कोर मुद्रास्फीति का महत्त्व

  • RBI एवं नीति आयोग कोर मुद्रास्फीति को प्रमुख मानते हैं क्योंकि खाद्य व ईंधन की कीमतें मौसम, युद्ध तथा आपूर्ति श्रृंखला जैसे बाह्य कारणों से अस्थिर होती हैं। 
  • कोर मुद्रास्फीति से पता चलता है कि अर्थव्यवस्था की ‘बुनियादी’ मांग एवं लागत दबाव क्या हैं।
  • यह मौद्रिक नीति के लिए एक स्थिर आधार प्रदान करता है जिससे आर्थिक गतिविधियों को दीर्घकालिक तरीके से प्रभावित किया जा सके।

आर.बी.आई. द्वारा ब्याज दरों में कटौती तथा महंगाई पर प्रभाव

  • आर.बी.आई. ने 8 फरवरी, 2023 से 6 फरवरी, 2025 तक रेपो दर को 6.5% पर रखा।
  • इसके बाद RBI ने दो बार रेपो दर में 0.25-0.25% की कटौती की, जो वर्तमान में 6% पर है। यह कटौती तब हुई जब कोर मुद्रास्फीति 3.1% तक गिर गई थी।

ब्याज दरों में कटौती के कारण

  • कोर मुद्रास्फीति में गिरावट को देखते हुए आर.बी.आई. ने दरों में कटौती की है ताकि उधार (ऋण देना) देना सस्ता हो सके और आर्थिक गति को बढ़ावा दिया जा सके।
  • ब्याज दरें कम होने से कंपनियों एवं उपभोक्ताओं के लिए क्रेडिट सस्ता (धन की उपलब्धता अधिक) होता है, जिससे माँग बढ़ती है।

आर.बी.आई. द्वारा दरों में कटौती का प्रभाव

  • ब्याज दरों में कटौती से शुरुआती चरण में उधार सस्ता हुआ, जिससे उपभोग एवं निवेश प्रोत्साहित हुए।
  • हालाँकि, खाद्य एवं ईंधन की कीमतों में वृद्धि के चलते महंगाई अवरोधों को पूरी तरह से नियंत्रण में नहीं किया जा सका है।
  • सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सुधार दर और श्रम बाजार की स्थिति पर सकारात्मक प्रभाव देखा गया है।

महंगाई में योगदान देने वाले प्रमुख कारक

  • कृषि उत्पादन पर मौसम की स्थिति, जैसे- वर्षा, तापमान एवं अन्य मौसमी घटनाएँ (एल नीनो) का प्रभाव
  • अंतर्राष्ट्रीय कृषि वस्तुओं की आपूर्ति व मांग
  • युद्ध एवं भू-राजनीतिक घटनाओं का प्रभाव, जैसे- रूस-यूक्रेन युद्ध
  • पेट्रोलियम उत्पादों की वैश्विक कीमतें एवं उत्पादन नीति
  • अमेरिकी डॉलर के सापेक्ष रुपए के मूल्य का महंगाई पर प्रभाव पड़ता है।
    • फरवरी 2025 में रुपए का डॉलर के मुकाबले स्तर लगभग 85.5 रहा है जिसने महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद की।
  • विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) के निवेश प्रवाह में उतार-चढ़ाव।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की व्यापार नीतियों में बदलाव।

भविष्य की संभावनाएँ

जलवायु एवं कृषि

  • एल नीनो के अंत के बाद पिछले मानसून में सामान्य से अधिक वर्षा हुई जिससे कृषि उत्पादन बेहतर रहा।
  • अप्रैल 2025 में FAO खाद्य मूल्य सूचकांक 128.3 अंक पर था जो मार्च 2022 के उच्चतम की तुलना में काफी कम है।
  • वर्ष 2025-26 में अमेरिका सहित कई देशों का गेहूँ, चावल, मक्का एवं आयलसीड उत्पादन रिकॉर्ड स्तर पर रहने की उम्मीद है।

ईंधन एवं तेल की कीमतें

  • ब्रेंट कच्चे तेल की कीमत $65 प्रति बैरल से ऊपर ट्रेड कर रही है जो पिछले वर्ष की तुलना में कम है।
  • इससे घरेलू ऊर्जा कीमतें स्थिर रहने की संभावना है और ईंधन महंगाई दबाव कम होगा।

मुद्रा स्थिरता एवं वैश्विक आर्थिक स्थिति

रुपए का डॉलर के मुकाबले स्तर लगभग 85-86 के बीच स्थिर हुआ है। विदेशी मुद्रा भंडार में भी सुधार हुआ है जो भारत की आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करता है।

मौद्रिक नीति की दिशा

  • दीर्घकालिक कोर मुद्रास्फीति, लक्ष्य के आसपास होने के कारण आर.बी.आई. को दरों में और कटौती करने का अवसर मिल सकता है।
  • खाद्य एवं ईंधन की अस्थिर महंगाई दरों की अधिक चिंता नहीं करनी पड़ेगी क्योंकि वे मौद्रिक नीति से नियंत्रित नहीं होते हैं।

आगे की राह

  • मौसमी अनिश्चितताओं से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र में तकनीकी सुधार।
  • कृषि उत्पादन में विविधता और आपूर्ति श्रृंखला अवसंरचना को मजबूत करना।
  • मौद्रिक नीति को कोर महंगाई पर केंद्रित करना।
  • खाद्य एवं ईंधन महंगाई के लिए आपूर्ति पक्ष नीति, जैसे- कृषि सब्सिडी, भंडारण एवं आयात नीति कार्यान्वित।
  • रुपए की स्थिरता को बनाए रखना आवश्यक है ताकि आयात महंगाई को नियंत्रित किया जा सके।
  • विदेशी निवेशकों का विश्वास बनाए रखना वित्तीय सुदृढ़ता के लिए आवश्यक।

निष्कर्ष

मुद्रास्फीति प्रबंधन में आर.बी.आई. एवं सरकार की समन्वित नीतियाँ महत्वपूर्ण हैं। वर्तमान अनुकूल परिस्थितियाँ स्थिरता का अवसर प्रदान करती हैं, बशर्ते नीतियाँ सावधानीपूर्वक लागू हों।

मुख्य बिंदु (अप्रैल 2025)

  • भारत में अप्रैल 2025 में सामान्य CPI मुद्रास्फीति 3.16% थी, जो जुलाई 2019 के बाद न्यूनतम है।
  • खाद्य मुद्रास्फीति (CFPI) 1.8% पर है जो अक्तूबर 2021 के बाद सबसे निम्न स्तर है।
  • कोर मुद्रास्फीति 4.2% पर है जो RBI के 4% लक्ष्य से ऊपर है, जिससे दर में अतिरिक्त कटौती पर सवाल उठते हैं।
  • RBI ने फरवरी एवं अप्रैल 2025 में रेपो दर को 6.5% से घटाकर 6% किया।
  • मुद्रास्फीति के प्रबंधन में आपूर्ति-पक्ष कारक (जैसे- मौसम, वैश्विक कीमतें) और मांग-पक्ष कारक दोनों महत्वपूर्ण हैं।
  • रुपए में स्थिरता, सस्ते आयात एवं बेहतर खाद्य आपूर्ति से मुद्रास्फीति नियंत्रण में रहने की संभावना है।
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