संदर्भ
- हाल के वर्षों में भारत के शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (Net FDI) में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। इस स्थिति को लेकर आर्थिक जगत में दो अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं। आलोचकों का मानना है कि घटता हुआ शुद्ध एफडीआई विदेशी निवेशकों के कमजोर होते भरोसे का संकेत है। दूसरी ओर, सरकार और मुख्य आर्थिक सलाहकार इस बात पर जोर देते हैं कि सकल एफडीआई प्रवाह अभी भी मजबूत बना हुआ है तथा विनिर्माण क्षेत्र में निवेश बढ़ रहा है। उनके अनुसार शुद्ध एफडीआई में कमी का मुख्य कारण विदेशी निवेशकों द्वारा लाभ और पूँजी की वापसी तथा भारतीय कंपनियों के विदेशों में बढ़ते निवेश हैं।
- हालांकि यह बहस एक अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न को नजरअंदाज कर देती है। केवल कुल निवेश आंकड़ों पर ध्यान केंद्रित करने से अंतरराष्ट्रीय पूंजी के बदलते स्वरूप और भुगतान संतुलन (Balance of Payments) की उन प्रक्रियाओं की अनदेखी होती है जो एफडीआई के वास्तविक प्रभाव को निर्धारित करती हैं।
शुद्ध एफडीआई में तेज गिरावट
- भुगतान संतुलन की पद्धति के अनुसार शुद्ध एफडीआई की गणना विदेशी निवेश के कुल अंतर्प्रवाह और बहिर्प्रवाह के अंतर के रूप में की जाती है, जिसमें पूँजी की वापसी को भी शामिल किया जाता है।
- भारत का शुद्ध एफडीआई वर्ष 2020-21 में 44 अरब डॉलर के उच्चतम स्तर पर था, लेकिन 2024-25 में यह घटकर 1 अरब डॉलर से भी कम रह गया।
- वर्ष 2025-26 में इसमें कुछ सुधार हुआ और यह 7.6 अरब डॉलर तक पहुँचा। इसी अवधि में सकल एफडीआई प्रवाह 94.6 अरब डॉलर दर्ज किया गया।
- भारत की उदार एफडीआई नीति, जिसकी शुरुआत 1991 के आर्थिक सुधारों के साथ हुई थी, मूल रूप से प्रौद्योगिकी हस्तांतरण, निर्यात वृद्धि और विदेशी मुद्रा संरक्षण जैसे लक्ष्यों पर आधारित थी। समय के साथ नीति का फोकस निवेश की गुणवत्ता की बजाय अधिकाधिक पूँजी आकर्षित करने पर केंद्रित हो गया। परिणामस्वरूप भविष्य में उत्पन्न होने वाले बाहरी भुगतान दायित्वों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया।
एफडीआई के तीन अलग-अलग स्वरूप
आमतौर पर एफडीआई को एक समान और दीर्घकालिक निवेश माना जाता है, लेकिन वास्तव में इसके विभिन्न प्रकार हैं जिनकी प्रकृति और उद्देश्य अलग-अलग होते हैं।
- पहली श्रेणी वास्तविक एफडीआई (Real FDI या RFDI) की है। इसमें पारंपरिक बहुराष्ट्रीय कंपनियां शामिल होती हैं जो तकनीक, प्रबंधन क्षमता और वैश्विक ब्रांड के साथ उत्पादन या सेवाओं की स्थापना करती हैं। यह निवेश अपेक्षाकृत स्थायी और विकासोन्मुख माना जाता है।
- दूसरी श्रेणी वित्तीय निवेशकों की है, जिसमें निजी इक्विटी फंड, वेंचर कैपिटल फर्म, सॉवरेन वेल्थ फंड और एसेट मैनेजर शामिल होते हैं। इनका मुख्य उद्देश्य दीर्घकालिक औद्योगिक विकास नहीं बल्कि निवेश पर अधिकतम वित्तीय लाभ अर्जित करना और उपयुक्त समय पर बाहर निकलना होता है।
- तीसरी श्रेणी प्रवासी भारतीयों और विशेष प्रयोजन वाहनों (SPVs) के माध्यम से आने वाले निवेश की है। इसमें ऑफशोर वित्तीय केंद्रों के जरिए भेजी गई पूँजी तथा कई मामलों में भारतीय धन की राउंड-ट्रिपिंग भी शामिल हो सकती है।
- वर्ष 2022-23 से दिसंबर 2025-26 तक के प्रेषण-स्तरीय आँकड़ों से पता चलता है कि प्रभावी एफडीआई प्रवाह में वास्तविक एफडीआई की हिस्सेदारी 41.9 प्रतिशत रही, जबकि वित्तीय निवेशकों का योगदान 40.5 प्रतिशत था। शेष 17.6 प्रतिशत निवेश प्रवासी भारतीयों और भारत से जुड़े एसपीवी के माध्यम से आया।
वित्तीय निवेशकों की बढ़ती भूमिका
- वित्तीय निवेशकों का व्यवसाय मॉडल स्वाभाविक रूप से भविष्य में निवेश से बाहर निकलने पर आधारित होता है। यही कारण है कि समय के साथ इनके निवेश से बड़े पैमाने पर पूँजी की वापसी होती है।
- इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण 2025 में सामने आया, जब सिंगापुर की टेमासेक ने श्नाइडर इलेक्ट्रिक इंडिया में अपनी हिस्सेदारी बेच दी। वर्ष 2020 में किए गए 637 मिलियन डॉलर के निवेश से उसे लगभग 6.4 अरब डॉलर का प्रतिफल प्राप्त हुआ।
- कैलेंडर वर्ष 2025 में कुल 52 अरब डॉलर का विनिवेश दर्ज किया गया, जिसमें से 29 अरब डॉलर केवल 45 बड़े निजी इक्विटी और वेंचर कैपिटल निवेशकों के बाहर निकलने से संबंधित था।
विनिर्माण क्षेत्र में वास्तविक निवेश का क्षरण
- प्रभावी एफडीआई प्रवाह का विश्लेषण बताता है कि भारत के विनिर्माण क्षेत्र में वास्तविक एफडीआई का अनुपात लगातार घट रहा है। लगातार तीन चार-वर्षीय अवधियों में इस क्षेत्र में निवेश में कमी दर्ज की गई है।
- सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि हालिया चार-वर्षीय अवधि में विनिर्माण क्षेत्र में वास्तविक एफडीआई का हिस्सा कुल प्रभावी एफडीआई प्रवाह का मात्र 10.6 प्रतिशत रह गया। इससे संकेत मिलता है कि सकल निवेश आंकड़ों में दिखाई देने वाली मजबूती का बड़ा हिस्सा उत्पादन क्षमता निर्माण से जुड़ा नहीं है।
एफडीआई के माध्यम से नवीन पूंजी नहीं
- सकल एफडीआई आंकड़ों की एक प्रमुख सीमा यह है कि इनमें वास्तविक नए निवेश और कॉर्पोरेट संरचना में हुए बदलावों को एक साथ गिना जाता है।
- समूह के भीतर स्वामित्व पुनर्गठन, विलय-अधिग्रहण, शेयर अदला-बदली तथा बाहरी वाणिज्यिक उधार या परिवर्तनीय डिबेंचरों को इक्विटी में बदलना ऐसे लेनदेन हैं जो एफडीआई के रूप में दर्ज तो होते हैं, लेकिन इनसे देश में नई पूँजी का आगमन नहीं होता।
- वर्ष 2014-15 से दिसंबर 2025-26 तक भारत में आए लगभग 560 अरब डॉलर के इक्विटी एफडीआई में से करीब 40 अरब डॉलर ऐसे ही लेनदेन से जुड़े थे। बॉश और मीशो जैसे बड़े सौदों ने कई बार वार्षिक एफडीआई प्रवाह के आंकड़ों को प्रभावित किया है।
शुद्ध एफडीआई में गिरावट की वास्तविक वजह
- सरकारी स्तर पर अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि लाभ का देश में प्रेषण शुद्ध एफडीआई को कम करता है, लेकिन भुगतान संतुलन के नियमों के अनुसार यह पूरी तरह सही नहीं है।
- विदेशी निवेशकों को दिए गए लाभांश चालू खाते में निवेश आय के रूप में दर्ज किए जाते हैं। इससे चालू खाता घाटा बढ़ सकता है, लेकिन शुद्ध एफडीआई के आंकड़े सीधे प्रभावित नहीं होते। वास्तव में शुद्ध एफडीआई में कमी का मुख्य कारण विनिवेश और पूँजी की वापसी है, जो वित्तीय खाते में दर्ज होते हैं।
क्या बढ़ता ओएफडीआई परिपक्वता का संकेत है?
- भारतीय कंपनियों द्वारा विदेशों में बढ़ते निवेश (OFDI) को अक्सर कॉर्पोरेट परिपक्वता और वैश्विक विस्तार का प्रमाण माना जाता है। लेकिन इस धारणा की भी सावधानीपूर्वक जाँच आवश्यक है।
- वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच भारत के कुल 65 अरब डॉलर के विदेशी निवेश में लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा वित्तीय, बीमा और व्यावसायिक सेवाओं (FIB) क्षेत्र में गया। इनमें से बड़ी मात्रा सिंगापुर और संयुक्त अरब अमीरात जैसे वित्तीय केंद्रों में स्थित होल्डिंग कंपनियों और एसपीवी में निवेश की गई।
- उदाहरण के तौर पर, टाटा मोटर्स की सहायक कंपनी ने इटली की आईवीईसीओ समूह के अधिग्रहण के लिए सिंगापुर स्थित एक एफआईबी इकाई में 405 मिलियन डॉलर का निवेश किया। ऐसे मामलों में निवेश का अंतिम उद्देश्य किसी अन्य देश में परिचालन गतिविधियों का विस्तार होता है।
गिफ्ट सिटी और पूंजी प्रवाह की जटिलता
- गिफ्ट सिटी के उभरते वित्तीय केंद्र के रूप में विकसित होने से पूँजी प्रवाह की तस्वीर और जटिल हो गई है। गिफ्ट सिटी को जाने वाला ओएफडीआई 2023-24 के 246 मिलियन डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 1.18 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
- इसी अवधि में वहाँ से आने वाला एफडीआई भी बढ़ा है। यह स्थिति बताती है कि पूँजी अब विभिन्न वित्तीय अधिकार क्षेत्रों के बीच अधिक सक्रिय रूप से घूम रही है, जिससे वास्तविक निवेश और पूँजी पुनर्चक्रण के बीच अंतर करना कठिन होता जा रहा है।
बहिर्प्रवाह के बढ़ते चैनल
- वर्ष 2022-23 से 2025-26 के बीच भारत को 317.8 अरब डॉलर का सकल एफडीआई प्राप्त हुआ। लेकिन इसी अवधि में कई माध्यमों से भारी मात्रा में पूँजी बाहर भी गई।
- विनिवेश और पूँजी वापसी के जरिए लगभग 178.9 अरब डॉलर बाहर निकले। पुनर्निवेशित आय को छोड़कर लाभांश भुगतान के रूप में 118.9 अरब डॉलर भेजे गए। इसके अतिरिक्त बौद्धिक संपदा और रॉयल्टी भुगतान के रूप में 46.6 अरब डॉलर का बहिर्प्रवाह हुआ।
- यदि तकनीकी सेवाओं और ओएफडीआई को अलग भी रखा जाए, तब भी विनिवेश, लाभांश और आईपीआर भुगतान के रूप में कुल 344.4 अरब डॉलर देश से बाहर गए। इसका अर्थ है कि नई एफडीआई पूँजी के प्रत्येक एक डॉलर के मुकाबले लगभग 1.5 डॉलर विभिन्न माध्यमों से बाहर चले गए।
- यह अनुपात पिछले दशक में लगातार बढ़ा है। 2014-15 से 2017-18 के दौरान प्रत्येक डॉलर के बदले 56 सेंट बाहर जाते थे। 2018-19 से 2021-22 के बीच यह बढ़कर 70 सेंट हुआ और अब यह अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच चुका है।
निष्कर्ष
- भारत में एफडीआई को लेकर चल रही बहस अक्सर अधूरी तस्वीर पेश करती है। केवल सकल या शुद्ध निवेश के आंकड़ों के आधार पर निष्कर्ष निकालना पर्याप्त नहीं है। यह समझना आवश्यक है कि निवेश किस प्रकार का है, उसका उद्देश्य क्या है, वह किस क्षेत्र में जा रहा है और भविष्य में उससे जुड़े भुगतान दायित्व कितने बड़े होंगे।
- वास्तविक औद्योगिक विकास, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और बाहरी क्षेत्र की स्थिरता का आकलन तभी संभव है जब एफडीआई के विभिन्न स्वरूपों, निवेशकों की प्रकृति और पूँजी के आवागमन के तंत्र का गहन विश्लेषण किया जाए। इसलिए भारत को एफडीआई पर अधिक सूक्ष्म, तथ्याधारित और व्यापक सार्वजनिक विमर्श की आवश्यकता है।