संदर्भ
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने हाल ही में पत्रकारों एवं डिजिटल कंटेंट निर्माताओं को कड़ी चेतावनी दी है कि सोशल व डिजिटल प्लेटफॉर्म पर मीडिया संचालन में निर्धारित आचार संहिता का सख्ती से पालन करना अनिवार्य है अन्यथा उन्हें मानहानि या उगाही जैसी आपराधिक कार्रवाई सहित कानूनी परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
डिजिटल मीडिया एवं आचार संहिता का उद्देश्य
- डिजिटल मीडिया के लिए आचार संहिता दिशानिर्देश और नियामक मानकों का एक समूह है जो ऑनलाइन पत्रकारिता में सटीकता, निष्पक्षता एवं जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।
- भारत में यह मुख्यत: ‘सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021’ (Information Technology (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, 2021) के तहत लागू होता है जो डिजिटल समाचार प्रकाशकों को ‘पत्रकारिता आचरण मानदंड (Norms of Journalistic Conduct)’ का पालन करने के लिए बाध्य करता है।
डिजिटल मीडिया और नैतिकता से जुड़े तथ्य
- विस्तृत उपयोगकर्ता आधार: वर्ष 2026 तक भारत में 1.03 अरब से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं जिनमें लगभग 80 करोड़ लोग सोशल मीडिया पर सक्रिय हैं। इसका अर्थ यह है कि अपुष्ट डिजिटल सामग्री का प्रभाव तुरंत एवं व्यापक होता है।
- डीपफेक का खतरा: वर्ष 2026 के आईटी संशोधन नियमों ने ‘कृत्रिम रूप से उत्पन्न जानकारी (Synthetically Generated Information: SGI)’ को लक्षित किया है। इसके अंतर्गत प्लेटफॉर्म्स को एआई-निर्मित सामग्री को स्पष्ट रूप से चिह्नित करना अनिवार्य है ताकि भ्रामक प्रतिरूपण रोका जा सके।
- अनुपालन समय-सीमा में कमी: नवीनतम नियमों के तहत आपत्तिजनक या मानहानिकारक सामग्री हटाने की समय-सीमा 36 घंटे से घटाकर 3 घंटे कर दी गई है।
- विश्वास का संकट: वर्ष 2025 की रॉयटर्स डिजिटल न्यूज़ रिपोर्ट के अनुसार, केवल 36% भारतीय समाचार उपभोक्ता मीडिया पर समग्र रूप से भरोसा करते हैं। इसका मुख्य कारण सनसनीखेज ‘क्लिकबेट’ सामग्री और प्रकाशन से पूर्व सत्यापन की कमी है।
डिजिटल मीडिया द्वारा आचार संहिता के पालन की आवश्यकता
- चरित्र हनन रोकना: अप्रमाणित सामग्री किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा को सत्य सामने आने से पहले ही नुकसान पहुंचा सकती है। उदाहरण: उत्तराखंड उच्च न्यायालय के मामले में एक अपुष्ट सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर SBI शाखा प्रबंधक के विरुद्ध तत्काल कार्रवाई शुरू कर दी गई, जबकि मूल शिकायत वापस ले ली गई थी।
- वायरल झूठी खबरों को रोकना: डिजिटल माध्यम झूठी जानकारी को तेजी से फैलाते हैं। उदाहरण: वरिष्ठ अभिनेता धर्मेन्द्र के निधन की झूठी अफवाह व्यापक रूप से फैली, जिससे उनके परिवार और प्रशंसकों में अनावश्यक चिंता उत्पन्न हुई।
- लोक-व्यवस्था बनाए रखना: संवेदनशील मुद्दों पर भ्रामक रिपोर्टिंग वास्तविक हिंसा को भड़का सकती है। उदाहरण: वर्ष 2025 के अंत में म्यांमार का एक वीडियो मणिपुर हिंसा के रूप में फैलाया गया, जिससे साम्प्रदायिक सौहार्द पर खतरा उत्पन्न हुआ, जिसे बाद में फैक्ट-चेकर्स ने स्पष्ट किया।
- कमजोर वर्गों की सुरक्षा: नैतिक मानदंड बच्चों और अपराध पीड़ितों के द्वितीयक उत्पीड़न को रोकते हैं। उदाहरण: 2025 के अंत में अरुणाचल प्रेस क्लब को माफी मांगनी पड़ी, जब एक डिजिटल चैनल ने बाल शोषण मामले की नाबालिग पीड़िता का साक्षात्कार अनैतिक रूप से प्रकाशित किया।
- लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा: नैतिक पत्रकारिता सुनिश्चित करती है कि मतदाताओं को तथ्यात्मक जानकारी मिले, न कि प्रचार या भुगतान की गई खबरें। उदाहरण: वर्ष 2025-26 के राज्य चुनावों में भारतीय निर्वाचन आयोग ने कई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स को ‘साइलेंस पीरियड’ के उल्लंघन में एग्जिट पोल और पक्षपाती सामग्री प्रकाशित करने पर चिह्नित किया।
लागू करने में चुनौतियाँ
- क्लिक आधारित अर्थव्यवस्था: विज्ञापन-आधारित मॉडल प्राय: संतुलित रिपोर्टिंग के बजाय सनसनीखेज कंटेंट को प्रोत्साहित करते हैं। उदाहरण: वर्ष 2025 में कई डिजिटल पोर्टल्स ने अस्पताल में भर्ती हस्तियों की फुटेज लीक की, केवल व्यूज़ और विज्ञापन आय बढ़ाने के लिए।
- गुमनामी और फर्जी पोर्टल: कई डिजिटल मंच बिना पंजीकृत संपादक या भौतिक पते के संचालित होते हैं। उदाहरण: 2026 में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को व्हाट्सएप आधारित समाचार समूहों को नोटिस देने में कठिनाई हुई।
- गति बनाम सटीकता: पहले खबर देने की होड़ में सत्यापन की प्रक्रिया अक्सर नजरअंदाज हो जाती है। उदाहरण: उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता ने संबंधित पक्षों से पुष्टि किए बिना मीडिया सामग्री प्रसारित की।
- तकनीकी चुनौतियाँ (एआई/डीपफेक): छोटे कंटेंट निर्माताओं के लिए वास्तविक और कृत्रिम मीडिया में अंतर करना कठिन हो रहा है। उदाहरण: 2026 में कई क्षेत्रीय पत्रकारों ने अनजाने में एआई-निर्मित राजनीतिक ऑडियो को वास्तविक लीक समझकर साझा किया।
- कमजोर स्व-नियमन: तीन-स्तरीय व्यवस्था होने के बावजूद छोटे प्रकाशक अक्सर स्व-नियामक निकायों को नजरअंदाज करते हैं। उदाहरण: 2025 में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि मीडिया नैतिकता उल्लंघन पर लगे जुर्माने प्रभावहीन हैं, क्योंकि सनसनीखेज लाभ दंड से अधिक है।
आगे की राह
- अनिवार्य पंजीकरण: सभी डिजिटल समाचार प्रकाशकों को MIB के साथ पंजीकरण करना अनिवार्य किया जाए।
- सत्यापन-प्रथम नीति: निजी व्यक्तियों या आपराधिक आरोपों से जुड़ी सामग्री प्रकाशित करने से पहले सत्यापन अनिवार्य हो।
- एआई-लेबलिंग का पालन: 2026 के आईटी नियमों के तहत सभी कृत्रिम सामग्री को स्पष्ट वॉटरमार्क और लेबल के साथ प्रस्तुत किया जाए।
- कानूनी साक्षरता: राज्य सरकारें पत्रकारों के लिए ‘पत्रकारिता आचरण मानदंड’ और भारतीय न्याय संहिता के मानहानि संबंधी प्रावधानों पर कार्यशालाएं आयोजित करें।
- स्तरीय दंड प्रणाली: डिजिटल प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग करने वाले पुनरावृत्ति अपराधियों के लिए कड़े वित्तीय और कानूनी दंड लागू किए जाएं।
निष्कर्ष
उत्तराखंड उच्च न्यायालय की चेतावनी यह याद दिलाती है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ डिजिटल गैर-जिम्मेदारी के बोझ तले कमजोर नहीं पड़ सकता। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अर्थ चरित्र हनन या अपुष्ट अफवाहों के प्रसार की अनुमति नहीं है। डिजिटल मीडिया को विश्वसनीय सूचना स्रोत बने रहने के लिए अपनी तेज़ गति को सत्यनिष्ठा और नैतिक संयम के साथ संतुलित करना होगा।