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प्रवर्तन निदेशालय का रिट अधिकार क्षेत्र

संदर्भ 

  • हाल ही में, सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम संवैधानिक प्रश्न पर विचार करने की सहमति व्यक्त की है। प्रश्न यह है कि क्या प्रवर्तन निदेशालय (ED) को संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट याचिका दायर करने का वैधानिक अधिकार (locus standi) प्राप्त है? 
  • यह प्रश्न एक दीर्घकालिक कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि में उभरा है जो एक केंद्रीय जांच एजेंसी (ED) और केरल व तमिलनाडु राज्य सरकारों के बीच चल रहा है। इस मामले के परिणाम केंद्र-राज्य संबंधों, संघीय संतुलन तथा जांच एजेंसियों की स्वायत्तता पर व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।

मामले की पृष्ठभूमि 

  • इस विवाद की जड़ वर्ष 2020 के केरल गोल्ड स्मगलिंग प्रकरण में है जिसमें तिरुवनंतपुरम हवाई अड्डे पर यू.ए.ई. से आए राजनयिक बैगेज के माध्यम से सोने की तस्करी का खुलासा हुआ था।
  • इस संदर्भ में ईडी ने विदेशी मुद्रा प्रबंधन अधिनियम, 1999 (FEMA) और धन शोधन निवारण अधिनियम, 2002 (PMLA) के प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया। जांच के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री सहित केरल सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोप लगाए गए। 
  • इसके पश्चात ईडी ने केरल उच्च न्यायालय का रुख करते हुए आवश्यक अभिलेखों तक पहुँच के लिए परमादेश (Mandamus) रिट तथा अधिकार क्षेत्र के अभाव के आधार पर राज्य सरकार की एक अधिसूचना को निरस्त कराने के लिए उत्प्रेषण (Certiorari) रिट की मांग की। 

रिट याचिका का अर्थ 

  • रिट याचिका एक संवैधानिक उपाय है जिसके माध्यम से उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) अथवा सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) से मौलिक अधिकारों के संरक्षण या कानूनी त्रुटियों के सुधार के लिए आदेश प्राप्त किया जाता है। 
  • यह उपाय सामान्यतः तब अपनाया जाता है जब अन्य वैधानिक विकल्प अप्रभावी सिद्ध होते हैं। इसके जरिए सार्वजनिक प्राधिकरणों को कानून के अनुरूप कार्य करने अथवा अवैध गतिविधियों से विरत रहने का निर्देश दिया जाता है। 

रिट के प्रमुख प्रकार

  • बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) : अवैध निरुद्धि से मुक्ति
  • परमादेश (Mandamus) : वैधानिक कर्तव्य के पालन का आदेश
  • निषेध (Prohibition) : अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण पर रोक
  • उत्प्रेषण (Certiorari) : अवैध या त्रुटिपूर्ण आदेश को रद्द करना
  • अधिकार-पृच्छा (Quo Warranto) : सार्वजनिक पद पर नियुक्ति की अवैधता को चुनौती

अपवाद

  • संविधान के अनुच्छेद 361 के अनुसार राष्ट्रपति या राज्यपाल के विरुद्ध उनके संवैधानिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित मामलों में परमादेश रिट जारी नहीं किया जा सकता है।
  • सामान्यतः रिट निजी व्यक्तियों या संस्थाओं के विरुद्ध स्वीकार्य नहीं होती है जब तक यह आरोप न हो कि राज्य ने किसी निजी पक्ष के साथ मिलकर संवैधानिक या वैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है। 

केंद्रीय संवैधानिक प्रश्न

क्या ईडी अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट क्षेत्राधिकार का सहारा ले सकती है ?

  • अनुच्छेद 226 उच्च न्यायालयों को मौलिक अधिकारों के प्रवर्तन तथा ‘किसी अन्य उद्देश्य’ के लिए रिट जारी करने की शक्ति प्रदान करता है। 
  • परंपरागत रूप से इस अधिकार का प्रयोग नागरिकों, विधिक व्यक्तियों (Juristic Persons) तथा उन संस्थाओं द्वारा किया जाता रहा है जिनके पास प्रवर्तनीय कानूनी अधिकार हों।

क्या प्रवर्तन निदेशालय को भी इस श्रेणी में शामिल किया जा सकता है ?

उच्च न्यायालयों का दृष्टिकोण (केरल एवं मद्रास) 

  • केरल उच्च न्यायालय (2021) और तत्पश्चात मद्रास उच्च न्यायालय ने यह मत व्यक्त किया कि ईडी एक वैधानिक निकाय है, जिसे स्वतंत्र शक्तियां प्राप्त हैं।
  • ईडी के अधिकारी अर्ध-न्यायिक प्रकृति के कार्यों का निर्वहन करते हैं। इस आधार पर न्यायालयों ने माना कि ईडी को मात्र केंद्र सरकार का एक विभाग नहीं माना जा सकता और उसे न्यायालय में याचिका दायर करने का अधिकार है।

केरल एवं तमिलनाडु सरकारों के तर्क (सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष)

  • ईडी कोई ज्यूरिस्टिक पर्सन (न्यायिक इकाई) नहीं है बल्कि केंद्र सरकार का एक प्रशासनिक विभाग है। 
  • FEMA और PMLA में ईडी को मुकदमा दायर करने की स्पष्ट वैधानिक अनुमति नहीं दी गई है। 
  • ईडी को रिट याचिका दायर करने की छूट देने से अनुच्छेद 131 कमजोर पड़ सकता है जोकि केंद्र-राज्य विवादों के लिए सर्वोच्च न्यायालय का विशिष्ट मूल अधिकार क्षेत्र निर्धारित करता है।
  • इससे केंद्र सरकार संवैधानिक संरक्षा उपायों को दरकिनार कर सकेगी। 
  • केरल सरकार ने यह भी तर्क दिया कि उच्च न्यायालय द्वारा ईडी की याचिका की पोषणीयता पर उठाई गई आपत्ति को ‘मामूली तकनीकी दोष’ करार देना अनुचित है।
  • उन्होंने आंध्र प्रदेश राज्य बनाम भारत संघ (2012) तथा मुख्य वन संरक्षक बनाम कलेक्टर (2003) के निर्णयों का हवाला दिया, जिनमें कहा गया था कि केवल ज्यूरिस्टिक पर्सन ही सरकारों के विरुद्ध वाद दायर कर सकते हैं।

केंद्र सरकार/ईडी का पक्ष 

  • रिट याचिकाएं ईडी के उप-निदेशक द्वारा आधिकारिक हैसियत में दायर की गई थीं।
  • ईडी के अधिकारी सामान्य सिविल सेवक नहीं हैं बल्कि FEMA और PMLA के तहत उन्हें स्वतंत्र वैधानिक शक्तियां प्रदान की गई हैं।
  • यदि ईडी को रिट क्षेत्राधिकार से वंचित किया गया, तो इससे प्रभावी कानून प्रवर्तन में बाधा उत्पन्न होगी और अनावश्यक प्रक्रियात्मक अड़चनें बढ़ेंगी। 

सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणियां 

सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि यह प्रश्न केवल तकनीकी प्रकृति का नहीं है बल्कि इसका संवैधानिक एवं संघीय महत्व है। इसी कारण मामले को विस्तृत सुनवाई हेतु स्वीकार किया गया है। 

प्रमुख चुनौतियाँ 

  • केंद्र व राज्यों के बीच संघीय सीमाओं का अस्पष्ट होना
  • स्पष्ट विधायी समर्थन के बिना ईडी की शक्तियों का विस्तार
  • संवैधानिक उपायों के माध्यम से कार्यपालिका के अतिक्रमण की आशंका
  • अनुच्छेद 131 की विशिष्टता पर प्रतिकूल प्रभाव

संभावित प्रभाव 

  • यदि ईडी को रिट याचिका दायर करने की अनुमति दी जाती है तो उसे आर.बी.आई. जैसे अन्य संवैधानिक या वैधानिक निकायों के समकक्ष माना जा सकता है जिससे केंद्रीय जांच एजेंसियों की भूमिका एवं प्रभाव बढ़ेगा।
  • यदि यह अनुमति नहीं दी जाती है तो केंद्र-राज्य विवाद अनुच्छेद 131 तक सीमित रहेंगे, जिससे राज्यों की स्वायत्तता को अधिक संरक्षण मिलेगा। 

आगे की दिशा 

  • FEMA और PMLA में ईडी की विधिक स्थिति को स्पष्ट किया जाना चाहिए। 
  • केंद्रीय एजेंसियों के locus standi को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश विकसित किए जाएँ।
  • सहकारी संघवाद को अधिक सुदृढ़ किया जाए।
  • संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान करते हुए जांच की प्रभावशीलता सुनिश्चित की जाए।

निष्कर्ष 

  • सर्वोच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय रिट क्षेत्राधिकार की सीमा, केंद्रीय जांच एजेंसियों की संस्थागत भूमिका तथा संघवाद व कार्यपालिका की शक्तियों की संवैधानिक मर्यादा पर दूरगामी प्रभाव डालेगा।
  • यह मामला केवल प्रक्रिया से जुड़ा नहीं है, बल्कि संवैधानिक अनुशासन, संघीय ढांचे और शक्ति संतुलन से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न को सामने रखता है।
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