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वृक्षों की पर्यावरणीय भूमिका : नैतिक दृष्टिकोण

परिचय

वृक्ष केवल निष्क्रिय व सौंदर्यपूर्ण वस्तुएँ नहीं हैं, बल्कि पर्यावरण को आकार देने वाले महत्वपूर्ण तत्व हैं। हाल के शोधों ने वृक्षों के पर्यावरणीय लाभों, जैसे- हवा को साफ करना, बाढ़ रोकना और कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषण को उनकी पर्यावरण को नियंत्रित करने की क्षमता का परिणाम बताया है। वृक्ष बारिश लाने, पानी का पुनर्वितरण करने एवं मृदा निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

वृक्षों की पर्यावरणीय भूमिका

  • वृक्षों को प्राय: केवल हरे-भरे दृश्य या पर्यावरणीय सजावट के रूप में देखा जाता है किंतु वास्तव में वे पृथ्वी के पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माता हैं। हजारों वर्षों के विकास के बाद वृक्षों ने पानी, हवा, आग एवं मृदा जैसे मूल तत्वों को नियंत्रित करने की क्षमता विकसित की है। 
  • हैरियट रिक्स (The Genius of Trees, 2025, Bodley Head) के अनुसार, वृक्ष परिवर्तन के शिकार नहीं, बल्कि परिवर्तन के सक्रिय कारक हैं। लगभग 40,000 साल पहले जब आधुनिक मानव विकसित हुए, तब पृथ्वी पर अनुमानित छह ट्रिलियन वृक्ष थे, जिन्होंने हवा, पानी के प्रवाह और अन्य प्रजातियों के साथ संबंधों को पहले ही बदल दिया था।
  • वृक्ष न केवल बारिश लाते हैं, बल्कि वाष्पीकरण के माध्यम से पानी को वापस वायुमंडल में भेजते हैं। उनकी जड़ें मिट्टी के नीचे पानी को एकत्रित व पुनर्वितरित करती हैं। 
  • यह प्रक्रिया इतनी प्रभावी है कि वृक्ष जलवायु परिवर्तन के दौरान भी पानी को बेहतर ढंग से नियंत्रित कर सकते हैं। नैतिक दृष्टिकोण से वृक्षों का यह योगदान उनके संरक्षण की जिम्मेदारी याद दिलाता है क्योंकि वे जीवन के लिए आवश्यक तत्वों को संतुलित रखते हैं।

वुड वाइड वेब: वृक्षों का संचार नेटवर्क

  • वृक्ष केवल अपने लिए नहीं, बल्कि अन्य प्रजातियों के साथ भी संवाद और सहयोग करते हैं। हाल के शोधों ने ‘वुड वाइड वेब’ की अवधारणा को सामने लाया है जिसमें वृक्ष मिट्टी के नीचे कवक (फंगी) के साथ जटिल नेटवर्क बनाते हैं। इस नेटवर्क के माध्यम से वृक्ष संसाधनों (जैसे- पोषक तत्व एवं पानी) का आदान-प्रदान करते हैं। 
  • सुज़ैन सिमार्ड (Finding the Mother Tree: Discovering the Wisdom of the Forest, 2021, Allen Lane) का कहना है कि वृक्ष एक-दूसरे से ‘बात’ करते हैं और ‘प्रेम’ दिखाते हैं जो उनकी सामुदायिक भावना को दर्शाता है।
  • हालाँकि, कुछ वैज्ञानिक इस मानवीकरण पर सवाल उठाते हैं किंतु यह स्पष्ट है कि वृक्षों का यह नेटवर्क पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करता है। 
  • नैतिक रूप से यह सिखाता है कि प्रकृति में हर प्रजाति एक-दूसरे पर निर्भर है। वृक्षों का यह सहयोगी व्यवहार मानव समाज को सहकारिता और सामुदायिकता की प्रेरणा देता है।

वृक्षों का ऐतिहासिक योगदान

  • लगभग 400 मिलियन वर्षों से वृक्ष पृथ्वी पर सबसे बड़े जीवों में से हैं। उनके सहयोग से चट्टान टूटकर मिट्टी बनी, पानी का नदियों में प्रवाह हुआ और ऑक्सीजन उत्सर्जन होकर वायुमंडल जीवन के लिए अनुकूल बना। बिना वृक्षों के पृथ्वी एक रेगिस्तान होती। यह ऐतिहासिक योगदान वृक्षों के प्रति कृतज्ञता का भाव जगाता है। 
  • नैतिक दृष्टिकोण से यह समझना होगा कि वृक्षों ने पृथ्वी को रहने योग्य बनाया है और उनकी रक्षा करना मानव का कर्तव्य है।

पवित्र वृक्ष और नैतिक मूल्य

  • वसुधा राय (Sacred: The Mysticism, Science, Recipes and Rituals, Ebury 2025) अपनी पुस्तक में पीपल, बरगद, रुद्राक्ष एवं देवदार जैसे ‘पवित्र’ वृक्षों के वैज्ञानिक व आध्यात्मिक महत्व को उजागर करती हैं। 
  • भारत में लगभग पचास प्रजातियों को पवित्र माना जाता है जो हमारी सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं से जुड़ी हैं। राय बताती हैं कि इन वृक्षों का महत्व केवल आध्यात्मिक नहीं है बल्कि वैज्ञानिक भी है क्योंकि ये पारिस्थितिकी तंत्र को समर्थन देते हैं।
  • नैतिक दृष्टिकोण से प्रत्येक वृक्ष को पवित्र मानना चाहिए क्योंकि प्रत्येक वृक्ष बैक्टीरिया, कीड़े, मधुमक्खियाँ, पक्षी एवं स्तनधारी प्रजातियों को सहारा देता है। प्राचीन शास्त्रों में कहा गया है कि हर पत्ती, टहनी एवं तना प्रकृति की आत्माओं का घर है। 
  • एक प्राचीन कथा में एक गुरु अपने शिष्य से कहते हैं कि वह जंगल में ऐसा पौधा ढूँढे जिसका कोई उपयोग न हो। शिष्य खाली हाथ लौटता है क्योंकि उसे एक भी ऐसा पौधा नहीं मिलता है। यह कथा सिखाती है कि प्रकृति का हर हिस्सा मूल्यवान है और मानव को इसे संरक्षित करने की नैतिक जिम्मेदारी लेनी चाहिए।

निष्कर्ष

वृक्ष केवल पर्यावरण के सजावटी हिस्से नहीं हैं; वे जीवन के संरक्षक और पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माता हैं। ‘वुड वाइड वेब’ के माध्यम से उनका सहयोगी नेटवर्क एवं पवित्रता का वैज्ञानिक आधार हमें प्रकृति के प्रति सम्मान और संरक्षण की प्रेरणा देता है। नैतिक रूप से यह समझना होगा कि वृक्षों का संरक्षण केवल पर्यावरणीय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक जिम्मेदारी भी है। मानव को वृक्षों के साथ अपने सहजीवी संबंध को पुनर्जनन करना होगा ताकि हम एक स्वस्थ और संतुलित पृथ्वी को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रख सकें।

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