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भारत में व्यंग्य की स्वतंत्रता

संदर्भ

हाल ही में, राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए एक व्यंग्यात्मक कार्टून वीडियो की ऑनलाइन उपलब्धता को रोक दिया गया। इस कार्रवाई ने भारत में व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर नई बहस को जन्म दिया है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संवैधानिक ढांचा 

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) प्रत्येक नागरिक को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। 
  • हालांकि, यह अधिकार असीमित नहीं है। अनुच्छेद 19(2) राज्य को यह शक्ति देता है कि वह भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता, नैतिकता तथा अपराध के लिए उकसावे की रोकथाम जैसे आधारों पर उचित प्रतिबंध लगा सके। 
  • व्यंग्य, कार्टून और हास्य-व्यंग्य कला तथा राजनीतिक अभिव्यक्ति के दायरे में आते हैं और इस प्रकार उन्हें अनुच्छेद 19(1)(a) का संरक्षण प्राप्त है। न्यायालयों ने बार-बार यह रेखांकित किया है कि लोकतंत्र में असहमति, आलोचना, अतिशयोक्ति व विडंबना के लिए स्थान होना अनिवार्य है। 

लोकतांत्रिक विमर्श में व्यंग्य की भूमिका 

  • उच्चतम न्यायालय ने अनेक मामलों में व्यंग्य को वैध और आवश्यक कलात्मक अभिव्यक्ति के रूप में स्वीकार किया है।
  • इंडिबिली क्रिएटिव (पी) लिमिटेड बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (2019) में न्यायालय ने कहा कि व्यंग्य समाज की विसंगतियों और पाखंड को उजागर करने का प्रभावी माध्यम है। अदालत ने इसकी उस विशेष क्षमता पर जोर दिया, जिसके जरिए जटिल विचारों को सरल और प्रभावशाली तरीके से प्रस्तुत किया जा सकता है।
  • इसी प्रकार, डी.सी. सक्सेना बनाम भारत के मुख्य न्यायाधीश (1997) में न्यायालय ने चेतावनी दी थी कि सार्वजनिक मुद्दों पर चर्चा को दबाना लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए हानिकारक हो सकता है। 
  • न्यायालयों ने यह भी स्पष्ट किया है कि व्यंग्य को ‘सामान्य समझ वाले व्यक्ति’ के दृष्टिकोण से परखा जाना चाहिए, न कि अत्यधिक संवेदनशील व्यक्ति के नजरिए से।
  • कामा बनाम एम. जोतिसोरूपन (2018) में मद्रास उच्च न्यायालय ने राजनीतिक कार्टून को ‘उपहास का औजार’ बताया, जिसका उद्देश्य सत्ता की चापलूसी करना नहीं बल्कि प्रश्न उठाना और चिंतन को प्रेरित करना है। 

ऑनलाइन सामग्री अवरोध से जुड़ा कानूनी परिप्रेक्ष्य 

यह विवाद सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 और उससे संबंधित नियमों के संदर्भ में सामने आया है। 

धारा 69A का प्रावधान

  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 69A केंद्र सरकार को अनुच्छेद 19(2) में निर्दिष्ट आधारों के अनुरूप ऑनलाइन सामग्री को अवरुद्ध करने का अधिकार प्रदान करती है।
  • ऐसे अवरोध आदेश लिखित रूप में और कारणों सहित होने चाहिए तथा उनकी समीक्षा की व्यवस्था भी होनी चाहिए।
  • श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में उच्चतम न्यायालय ने धारा 69A को संवैधानिक माना किंतु यह भी स्पष्ट किया कि सामग्री को ब्लॉक करने से पहले संबंधित मध्यस्थ और मूल रचनाकार को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए। साथ ही, लगाए गए प्रतिबंध अनुच्छेद 19(2) के दायरे में ही सीमित होने चाहिए। 

आईटी नियमों में संशोधन

  • सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2026 में किए गए संशोधन के अनुसार, सोशल मीडिया मंचों को कथित अवैध सामग्री हटाने के लिए अब 24–36 घंटे के बजाय केवल तीन घंटे का समय दिया गया है। 
  • कर्नाटक उच्च न्यायालय ने सरकार के ‘सहयोग’ (Sahyog) पोर्टल को वैध ठहराया, जो मध्यस्थों को नोटिस भेजने की प्रक्रिया को स्वचालित बनाता है। हालांकि, इस व्यवस्था को लेकर यह चिंता भी जताई गई है कि इससे प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपाय कमजोर हो सकते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, उच्चतम न्यायालय में दायर याचिकाओं में सूचना प्रौद्योगिकी (जनता द्वारा सूचना तक पहुंच अवरुद्ध करने की प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय) नियम, 2009 को चुनौती दी गई है। विशेष आपत्ति उन प्रावधानों पर है जो आपातकालीन स्थिति में बिना पूर्व सूचना के अवरोध की अनुमति देते हैं तथा अवरोध आदेशों को गोपनीय बनाए रखते हैं।  

कलात्मक स्वतंत्रता पर न्यायपालिका का दृष्टिकोण 

  • भारतीय न्यायपालिका ने बार-बार रचनात्मक और व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति के महत्व को स्वीकार किया है।
  • मार्च 2025 के एक फैसले में उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की कि गणराज्य की स्थापना के 75 वर्ष बाद भारत इतना कमजोर नहीं हो सकता कि कविता, स्टैंड-अप कॉमेडी या अन्य कलात्मक अभिव्यक्तियां स्वतः घृणा को जन्म दें।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने भी रचनात्मक स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा है कि व्यंग्य समाज की बुराइयों को अतिशयोक्ति के माध्यम से सामने लाता है। विश्व के अन्य लोकतांत्रिक देशों में भी कार्टून और व्यंग्य को व्यापक स्वतंत्रता दी जाती है क्योंकि उन्हें सार्वजनिक जीवन का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है।
  • उच्चतम न्यायालय ने दार्शनिक अल्बर्ट कैमस का हवाला देते हुए कहा कि कला समाज को जोड़ती है जबकि दमन उसे विभाजित करता है। 

राष्ट्रीय सुरक्षा बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 

  • हाल में जिस व्यंग्यात्मक कार्टून वीडियो को रोका गया, उसमें कथित तौर पर प्रधानमंत्री का चित्रण था। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा, रक्षा और विदेशी संबंधों जैसे आधारों पर अवरुद्ध किया गया।
  • यद्यपि अनुच्छेद 19(2) प्रतिबंधों की अनुमति देता है, न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया है कि ऐसे प्रतिबंध उचित, आनुपातिक एवं प्रक्रियात्मक रूप से न्यायसंगत होने चाहिए।
  • मूल संवैधानिक प्रश्न यह है कि क्या स्वभावतः अतिशयोक्ति और विडंबना पर आधारित व्यंग्य वास्तव में राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए वास्तविक खतरा बन सकता है, या फिर ऐसे मामलों में इन आधारों का प्रयोग अभिव्यक्ति पर अत्यधिक नियंत्रण का उदाहरण है। 
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