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वैश्विक बाघ दिवस-2025 : भारत की बाघ संरक्षण में अग्रणी भूमिका

(प्रारंभिक परीक्षा: समसामयिक घटनाक्रम, पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ 

29 जुलाई, 2025 को केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने नई दिल्ली में आयोजित ‘वैश्विक बाघ दिवस-2025’ समारोह की अध्यक्षता की।

वैश्विक बाघ दिवस-2025 के बारे में

  • परिचय : यह दिवस प्रत्येक वर्ष 29 जुलाई को मनाया जाता है, जो कि बाघों (पैंथेरा टाइग्रिस) के संरक्षण और उनके प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा के उद्देश्य से जागरूकता बढ़ाने के लिए समर्पित है।
  • उद्देश्य : यह दिन बाघों के समक्ष आने वाले खतरों, जैसे- आवास क्षति, अवैध शिकार और मानव-वन्यजीव संघर्ष, के प्रति जागरूकता प्रसार व संरक्षण प्रयासों को प्रोत्साहित करने का अवसर प्रदान करता है।
  • स्थापना : इसकी स्थापना वर्ष 2010 में रूस के सेंट पीटर्सबर्ग में आयोजित टाइगर समिट में हुई, जहाँ 13 बाघ-रेंज देशों (भारत, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मलेशिया, रूस आदि) ने बाघ संरक्षण के लिए प्रतिबद्धता जताई।
  • Tx2 पहल : इस समिट में ‘Tx2’ कार्यक्रम शुरू किया गया, जिसका लक्ष्य वर्ष 2022 तक वैश्विक बाघ आबादी को दोगुना करना था। 
  • भारत की भूमिका : भारत ने प्रोजेक्ट टाइगर (1973) और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के माध्यम से बाघ संरक्षण में उल्लेखनीय योगदान दिया है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • बाघों की घटती आबादी : विश्व वन्यजीव कोष (WWF) के अनुसार, एक सदी पहले विश्व में लगभग 1,00,000 बाघ थे, जो अब घटकर लगभग 5,500 रह गए हैं। इसमें से भारत में लगभग 3,682 बाघ (2022 की गणना) हैं।
  • भारत में प्रगति : वर्ष 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर शुरू होने के बाद से भारत में बाघ अभयारण्यों की संख्या 9 से बढ़कर 58 हो गई है जो बाघ संरक्षण में भारत की सफलता को दर्शाता है।
  • मध्य प्रदेश की उपलब्धि : वर्ष 2022 की बाघ गणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में 785 बाघ हैं जोकि भारत में सर्वाधिक है।

महत्व

  • पारिस्थितिक संतुलन : बाघ शीर्ष शिकारी के रूप में पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखते हैं। उनकी उपस्थिति स्वस्थ जंगलों और जैव विविधता का प्रतीक है।
  • सांस्कृतिक महत्व : बाघ भारत का राष्ट्रीय पशु है और शक्ति, साहस एवं सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है।
  • आर्थिक लाभ : बाघ अभयारण्य पर्यटन को बढ़ावा देते हैं जिससे स्थानीय समुदायों को रोजगार प्राप्त होता है।
  • वैश्विक नेतृत्व : भारत में विश्व की लगभग 75% बाघ आबादी पाई जाती है और भारत IBCA के माध्यम से 24 देशों के साथ बाघ एवं अन्य बड़ी बिल्लियों के संरक्षण में नेतृत्व कर रहा है।
  • जागरूकता एवं शिक्षा : वैश्विक बाघ दिवस के आयोजन (जैसे- प्रदर्शनियाँ, वृक्षारोपण और शैक्षिक कार्यक्रम) युवाओं व समुदायों में संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाते हैं।
  • संरक्षण उपलब्धियाँ : भारत में बाघों की आबादी वर्ष 2006 से 2018 तक 6% वार्षिक दर से बढ़ी है जो प्रोजेक्ट टाइगर एवं NTCA की सफलता को दर्शाता है।

2025 समारोह की मुख्य विशेषताएँ

  • वृक्षारोपण अभियान : पर्यावरण मंत्री ने 58 बाघ अभयारण्यों में 1 लाख से अधिक देशी पौधों के रोपण का शुभारंभ किया, जो विश्व के सबसे बड़े वृक्षारोपण अभियानों में से एक है। प्रत्येक अभयारण्य में 2,000 पौधे लगाए जाएंगे।
  • प्लास्टिक-मुक्त अभयारण्य : ‘प्लास्टिक-मुक्त बाघ अभयारण्य’ अभियान शुरू किया गया, जिसका लक्ष्य एकल-उपयोग प्लास्टिक को समाप्त करना है।
  • इको-शॉप प्रदर्शनी : नई दिल्ली में इको-शॉप प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें बाघ अभयारण्यों से समुदाय-आधारित पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद प्रदर्शित किए गए।
  • NTCA पुरस्कार : सात श्रेणियों में पुरस्कार वितरित किए गए, जो वन्यजीव संरक्षण, शिकार रोधी गतिविधियों व सामुदायिक भागीदारी में उत्कृष्ट योगदान को सम्मानित करते हैं।
  • एक पेड़ माँ के नाम : नागरिकों से ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान के तहत अपनी माँ और धरती माँ के सम्मान में पौधा लगाने का आह्वान किया गया।

काजीरंगा टाइगर रिजर्व: भारत में तीसरा सर्वाधिक बाघ घनत्व

  • बांदीपुर एवं कॉर्बेट टाइगर रिज़र्व के बाद असम का काजीरंगा टाइगर रिजर्व (KTR) भारत में तीसरा सर्वाधिक बाघ घनत्व वाला क्षेत्र बन गया है।
  • वैश्विक बाघ दिवस पर असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने बाघ स्थिति रिपोर्ट-2024 को ऑनलाइन जारी किया।
    • रिपोर्ट के अनुसार, KTR में प्रति 100 वर्ग किमी. में 18.65 बाघों का घनत्व है, जो कर्नाटक के बांदीपुर (19.83) और उत्तराखंड के कॉर्बेट (19.56) के बाद तीसरे स्थान पर है।
    • KTR में वर्ष 2024 में 148 बाघ दर्ज किए गए, जो 2022 के 104 बाघों से उल्लेखनीय वृद्धि दर्शाता है।
  • यह सर्वेक्षण राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) और वन्यजीव संस्थान (WII) के प्रोटोकॉल के अनुसार आयोजित किया गया।
  • स्थानिक रूप से स्पष्ट कैप्चर-रिकैप्चर विधि का उपयोग किया गया जो पारंपरिक गणना विधियों की तुलना में अधिक सटीक और पारिस्थितिक रूप से प्रासंगिक है।
  • बाघों की पहचान दाहिनी ओर की धारीदार पैटर्न के आधार पर की गई।
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