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गुट्टाला शिलालेख: भारत में सूखे का प्रथम ऐतिहासिक दस्तावेज

(प्रारंभिक परीक्षा : भारत का इतिहास)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1: भारतीय संस्कृति में प्राचीन काल से आधुनिक काल तक के कला के रूप, साहित्य और वास्तुकला के मुख्य पहलू)

संदर्भ 

कर्नाटक के हावेरी जिले से प्राप्त एक शिलालेख में सूखे के कारण 6,307 लोगों की मृत्यु का उल्लेख है। यह शिलालेख भारत में किसी प्राकृतिक आपदा से जुड़ा पहला ऐतिहासिक दस्तावेज बन गया है। 

शिलालेख से संबंधित प्रमुख बिंदु 

  • प्राप्ति स्थल : यह शिलालेख कर्नाटक के हावेरी ज़िले के गुत्ताला गाँव में चंद्रशेखर मंदिर के पास प्राप्त हुआ। 
  • खोजकर्ता : इसकी खोज राज्य पुरातत्व विभाग, हम्पी के निदेशक आर. शेजेश्वर द्वारा की गई।
  • शिलालेख की तिथि : शक संवत् 1461, विकारी संवत्सर, भाद्रपद शुक्ल पंचमी 
    • आधुनिक कैलेंडर के अनुसार यह 18 अगस्त, 1539 ईस्वी का दिन था। 

क्या आप जानते हैं?

  • संवत्सर वैदिक साहित्य में ‘वर्ष’ के लिए एक संस्कृत शब्द है। भारतीय कैलेंडर में संवत्सर को हिंदू राशि चक्र (अर्थात राशि) के एक चिह्न से दूसरे में अपनी औसत गति के सापेक्ष पारगमन करने में लगने वाले समय के रूप में परिभाषित किया गया है। 
  • सरल शब्दों में ‘वर्ष’ के नाम को ‘संवत्सर’ कहते हैं। ये दिन एवं महीनों के नाम की तरह ही होते हैं। संवत्सर की संख्या 60 हैं। जैसे 12 महीने पूरे होने के बाद फिर से नया (पहला) महीना प्रारंभ होता है, उसी प्रकार 60 संवत पूरे हो जाने पर फिर पहला संवत्सर का प्रारंभ हो जाता है।
  • ये सभी 60 संवत्सर 20-20 के समूह में क्रमशः ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश को समर्पित होते हैं। पहला संवत्सर ‘प्रभव’, बीसवाँ संवत्सर ‘अव्यय (व्यय)’, इक्कीसवाँ संवत्सर ‘सर्वजित’, चालीसवाँ संवत्सर ‘पराभव’, इकतालीसवाँ संवत्सर ‘प्लवंग’, साठवाँ संवत्सर ‘अक्षय (क्षय)’ है।
  • इसके अतिरिक्त कुछ अन्य संवत्सर इस प्रकार हैं- विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, युवा, ईश्वर, चित्रभानु, विरोधी, विकृति, मन्मथ, विकारी, शार्वरी, कीलक, सौम्य, साधारण, राक्षस, पिंगल, सिद्धार्थी, रौद्र, दुर्मति, रक्ताक्षी।
  • भाषा एवं लिपि : यह शिलालेख कन्नड़ भाषा एवं लिपि में है।
  • प्राप्त जानकारी : शिलालेख में उल्लेख है कि सूखा (जिसे ‘बरा’ कहा गया है) के कारण 6,307 लोगों की मौत हुई तथा उनके शवों को गुट्टावालाला निवासी नानिदेवा ओडेया के पुत्र मारुलैया ओडेया द्वारा दफनाया गया।
    • यह कार्य तिम्मारसा स्वामी (स्थानीय शासक) के लिए पुण्य के उद्देश्य से किया गया था और इसमें भगवान बसवेश्वर के चरणों में श्रद्धांजलि अर्पित की गई थी।
    • शिलालेख के साथ एक मूर्ति भी प्राप्त हुई है जिसमें मारुलैया ओडेया को सिर पर दो या तीन शवों से भरी टोकरी ले जाते हुए दर्शाया गया है।

शिलालेख का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व

यह शिलालेख भारत के इतिहास को समझने का एक प्राथमिक स्रोत हैं। साहित्यिक ग्रंथों के विपरीत ये प्रत्यक्ष एवं समकालीन साक्ष्य प्रदान करते हैं। गुट्टाला शिलालेख जैसे दस्तावेज सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, प्रशासनिक व्यवस्थाओं एवं प्राकृतिक आपदाओं के प्रभाव को समझने में मदद करते हैं। 

  • प्राकृतिक आपदाओं का पहला प्रत्यक्ष दस्तावेजी प्रमाण : यह शिलालेख भारत में प्राकृतिक आपदा से जुड़ी त्रासदी का पहला प्रत्यक्ष व स्पष्ट विवरण प्रस्तुत करता है। यह सूखे जैसी प्राकृतिक आपदा के मानवीय प्रभाव को स्पष्ट रूप से दर्ज करता है जो भारतीय इतिहास में दुर्लभ है। 
  • सामाजिक–सांस्कृतिक महत्व : यह शिलालेख उस समय की सामाजिक एवं धार्मिक संरचना को दर्शाता है। मारुलैया ओडेया द्वारा शवों को दफनाने का कार्य और भगवान बसवेश्वर के प्रति नमन यह दर्शाता है कि धार्मिक विश्वास एवं पुण्य अर्जन की अवधारणा उस समय के समाज में गहरे तक समाई थी। 
  • प्रशासनिक संदर्भ : यह शिलालेख प्रशासनिक संरचना, जैसे- ‘सीमे’ (प्रादेशिक इकाई) और उसके शासक तिम्मारसा स्वामी की जानकारी भी देता है। यह सामाजिक एकजुटता और आपदा प्रबंधन के प्रारंभिक स्वरूप को भी दर्शाता है।
  • पर्यावरणीय एवं जलवायु अध्ययन : यह शिलालेख जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक आपदाओं के ऐतिहासिक पैटर्न को समझने में सहायक हो सकता है। श्री मुनिरत्नम के अनुसार, ऐसे अभिलेखों का तुलनात्मक अध्ययन जलवायु पैटर्न, जनसांख्यिकीय परिवर्तन व प्रशासनिक प्रतिक्रियाओं को समझने में मदद कर सकता है। 
    • यह आधुनिक पर्यावरणीय अध्ययनों व आपदा प्रबंधन नीतियों के लिए भी प्रासंगिक है।

चंद्रशेखर मंदिर के बारे में

  • परिचय : चंद्रशेखर मंदिर एक प्राचीन एवं ऐतिहासिक हिंदू मंदिर है जो कर्नाटक राज्य के हावेरी ज़िले में स्थित गुट्टाला नामक गाँव में स्थित है।
  • आराध्य : यह मंदिर भगवान चंद्रशेखर (शिव का एक रूप) को समर्पित है।
    • चंद्रशेखर रूप में शिव जी को ‘चंद्रमा को सिर पर धारण करने वाले’ के रूप में पूजा जाता है।
  • स्थापत्य शैली : इस मंदिर का निर्माण दक्षिण भारतीय मंदिर वास्तुकला द्रविड़ शैली की परंपरा के अनुरूप है जिसमें नक्काशीदार पत्थर की दीवारें, स्तंभ व मंडप देखे जा सकते हैं।
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