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कृषि संकट के रूप में भारी धातु प्रदूषण

(सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।)

संदर्भ 

हाल ही में डाउन टू अर्थ पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, विश्व की लगभग 14 से 17% कृषि भूमि (यानी लगभग 242 मिलियन हेक्टेयर) विषैले भारी धातुओं जैसे आर्सेनिक, कैडमियम, सीसा, क्रोमियम, और निकेल से प्रदूषित है। 

रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष 

  • रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में लगभग 90 करोड़ से 1.4 अरब लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ मृदा में भारी धातुओं का स्तर कृषि और मानव स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित सीमाओं से अधिक है।​
  • प्रदूषण का स्रोत: भारी धातु प्रदूषण प्राकृतिक स्रोतों (जैसे चट्टानों का क्षरण) और मानवीय गतिविधियों (जैसे खनन, औद्योगिक उत्सर्जन, और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग) दोनों से उत्पन्न होता है।​
  • कैडमियम की व्यापकता: कैडमियम सबसे व्यापक रूप से पाया गया प्रदूषक है, विशेष रूप से दक्षिण और पूर्वी एशिया, मध्य पूर्व, और अफ्रीका के क्षेत्रों में।​
  • स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी पर प्रभाव: भारी धातुओं से प्रदूषित मृदा फसल की पैदावार को कम करने के साथ ही खाद्य शृंखला के माध्यम से मानव और पशु स्वास्थ्य को भी खतरे में डालती है, जिससे कैंसर, अंग क्षति, और तंत्रिका संबंधी विकार जैसे गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं।​
  • भविष्य की चुनौतियाँ: हरित प्रौद्योगिकियों (जैसे इलेक्ट्रिक वाहनों और सौर पैनलों) के लिए आवश्यक धातुओं की बढ़ती मांग के कारण यह प्रदूषण और बढ़ सकता है।​

सिफारिशें

  • अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: भारी धातु प्रदूषण सीमाओं से परे है; इसलिए, देशों को मिलकर इस समस्या का समाधान करना होगा।​
  • नीतिगत हस्तक्षेप: प्रभावित क्षेत्रों की पहचान करके, मृदा गुणवत्ता की निगरानी और सुरक्षित कृषि प्रथाओं को अपनाने की आवश्यकता है।​
  • जैव सुदृढ़ीकरण और सतत कृषि: जैव सुदृढ़ीकरण (biofortification) और जैविक खेती जैसी तकनीकों को बढ़ावा देना चाहिए ताकि मृदा की गुणवत्ता और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।​

भारतीय कृषि क्षेत्र में भारी धातु प्रदूषण की स्थिति

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के नेतृत्व में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि उच्च उपज देने वाली चावल और गेहूं की किस्मों में आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों जैसे जिंक और आयरन की मात्रा में कमी आई है, जबकि आर्सेनिक जैसे विषैले तत्वों की मात्रा में वृद्धि हुई है।
    • विशेष रूप से, चावल में आर्सेनिक की मात्रा में 1,493% की वृद्धि देखी गई है।​

भारी धातु प्रदूषण के प्रभाव 

मृदा पर प्रभाव

  • मृदा की उर्वरता में कमी : भारी धातुएँ (जैसे लेड, कैडमियम, आर्सेनिक) मृदा के सूक्ष्मजीवों और पोषक तत्वों को नष्ट कर देती हैं।
  • मृदा की संरचना में बदलाव : धातुएँ मृदा के भौतिक, रासायनिक और जैविक गुणों को नष्ट कर देती हैं।
  • मृदा का अम्लीकरण : कुछ धातुएँ मृदा का pH घटाकर उसे अम्लीय बनाती हैं, जिससे पौधों के लिए पोषक तत्वों का अवशोषण कठिन हो जाता है।

पौधों पर प्रभाव

  • फसल की गुणवत्ता और उत्पादन में गिरावट : भारी धातुएँ पौधों की वृद्धि, अंकुरण और उपज को बाधित करती हैं।
  • जैव संचयन (Bioaccumulation) : पौधे भारी धातुओं को अवशोषित कर लेते हैं, जो खाद्य शृंखला में प्रवेश कर जाती हैं।
  • विषाक्तता के लक्षण : पत्तियों में पीला पड़ना, झड़ना, जड़ों का काला होना आदि समस्याएँ।

मानव स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ : भारी धातुओं से युक्त अनाजों  के सेवन से मनुष्यों में कैंसर, किडनी खराबी, तंत्रिका तंत्र विकार जैसे रोग हो सकते हैं।
  • मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य पर प्रभाव :  लेड जैसी धातुएँ गर्भावस्था में जटिलताएं और जन्म दोष उत्पन्न कर सकती हैं।

जल स्रोतों पर प्रभाव

  • जल प्रदूषण : भारी धातुएँ भूमिगत जल और सतही जल में मिलकर जल प्रदूषण उत्पन्न करती हैं।
  • पेयजल संकट :  दूषित जल मानव और पशुओं के लिए अनुपयोगी हो जाता है।

पारिस्थितिकी तंत्र पर प्रभाव

  • जैव विविधता में गिरावट : भारी धातुओं के संदूषण से मृदा में उपस्थित लाभकारी जीवों की मृत्यु से पारिस्थितिक संतुलन प्रभावित होता है।
  • खाद्य शृंखला में विषाक्तता का संचयन : छोटे जीवों से लेकर बड़े जीवों तक धातुएँ जमा होती जाती हैं, जिससे पूरी पारिस्थितिकी पर असर पड़ता है।

भारी धातु प्रदूषण से निपटने के भारत के प्रयास

कानून और नीतियां

  • पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 यह भारी धातु प्रदूषण रोकथाम और नियंत्रण के लिए व्यापक कानूनी ढाँचा प्रदान करता है।
  • खतरनाक अपशिष्ट प्रबंधन नियम, 2016 : औद्योगिक अपशिष्ट और भारी धातु उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपाय।
  • मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना (2015) : किसानों को उनकी मृदा में धातुओं सहित पोषक तत्वों की स्थिति की जानकारी देकर संतुलित उर्वरक उपयोग को बढ़ावा देना।

प्रदूषण नियंत्रण निकाय  

  • केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCBs) मृदा में प्रदूषकों की निगरानी और आवश्यक कार्रवाई करते हैं।
  • राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) : प्रदूषण फैलाने वालों पर दंड लगाकर प्रदूषण नियंत्रण को लागू करता है।

तकनीकी उपाय

  • फाइटो-रिमेडिएशन तकनीक : पौधों के माध्यम से भारी धातुओं को अवशोषित कर मृदा को शुद्ध करने की तकनीक को बढ़ावा देना।
  • जैव उर्वरक और जैविक खेती : रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का न्यूनतम प्रयोग कर मृदा प्रदूषण को रोकना।
  • रीसाइकलिंग और अपशिष्ट प्रबंधन : ई-कचरा, बैटरियों आदि से निकलने वाले भारी धातुओं का उचित निपटान।

जन जागरूकता अभियान

  • सरकार द्वारा स्वच्छ भारत मिशन, मिशन लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट (LiFE) जैसे अभियानों के माध्यम से जनभागीदारी को बढ़ावा देना।
  • औद्योगिक इकाइयों और किसानों को प्रशिक्षण व जागरूकता कार्यक्रमों के माध्यम से सतत खेती व अपशिष्ट प्रबंधन के उपाय सिखाना।

अनुसंधान और नवाचार

  • वैज्ञानिक संस्थानों द्वारा मृदा प्रदूषण का अध्ययन और उसकी रोकथाम के लिए नई तकनीकों का विकास।
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) और विभिन्न विश्वविद्यालयों द्वारा शोध परियोजनाओं का संचालन।

प्रभाव:

  • फसलों की पोषण गुणवत्ता में गिरावट।
  • खाद्य श्रृंखला के माध्यम से मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव जैसे कैंसर, तंत्रिका विकार और अंगों की क्षति।
  • मृदा उत्पादकता में कमी, जिससे वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर खतरा उत्पन्न।

चुनौतियाँ:

  • हरित प्रौद्योगिकियों (जैसे इलेक्ट्रिक वाहन, सौर पैनल) के लिए धातुओं की बढ़ती मांग प्रदूषण को और बढ़ा सकती है।
  • सीमित जागरूकता और संसाधनों की कमी से प्रदूषित कृषि भूमि का उपचार कठिन।

समाधान एवं सिफारिशें:

  • प्रभावित क्षेत्रों की शीघ्र पहचान और नियमित मृदा गुणवत्ता निगरानी।
  • स्वच्छ कृषि प्रथाओं का प्रोत्साहन जैसे जैविक खेती और फसल विविधीकरण।
  • अंतरराष्ट्रीय सहयोग के माध्यम से तकनीकी और वित्तीय सहायता।
  • नीतिगत पहल: जैसे सुरक्षित उर्वरकों का उपयोग सुनिश्चित करना, औद्योगिक अपशिष्ट प्रबंधन को सख्त करना।
  • जैव सुदृढ़ीकरण (Biofortification) के माध्यम से पौष्टिक फसलों का विकास।
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