भारत को वर्ष 2026 के लिए ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता सौंपी गई

  • ब्राजील ने आधिकारिक तौर पर वर्ष 2026 के लिए ब्रिक्स (BRICS) की अध्यक्षता भारत को सौंप दी है। 
  • इस क्रम में भारत 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। यह अवसर न केवल भारत की कूटनीतिक सक्रियता को दर्शाता है, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की भूमिका को भी रेखांकित करता है।
  • भारत ने अपनी ब्रिक्स अध्यक्षता को चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित किया है— समुत्थानशीलता (Resilience), नवाचार (Innovation), सहयोग (Cooperation) और पर्यावरणीय स्थिरता/संधारणीयता (Sustainability)।

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता का महत्त्व

1. वैश्विक शासन में सुधार

भारत का दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (IMF, विश्व बैंक, UNSC आदि) को तोड़ने के बजाय उनमें सुधार करने का है।

  • भारत पश्चिमी प्रभुत्व से संतुलन स्थापित करते हुए
  • विकासशील देशों की प्रतिनिधित्व की कमी को दूर करने की वकालत करता है।

यह दृष्टिकोण भारत को एक उत्तरदायी सुधारवादी शक्ति (Reformist Power) के रूप में प्रस्तुत करता है।

2. ग्लोबल साउथ का नेतृत्व और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था

भारत स्वयं को ग्लोबल साउथ और विकसित पश्चिम के बीच एक सेतु के रूप में स्थापित कर रहा है।

  • विकासशील देशों की वित्त, विकास, ऋण, जलवायु और तकनीक संबंधी चिंताओं को
  • वैश्विक मंच पर प्रभावी ढंग से उठाने का अवसर भारत को मिलेगा।

यह ब्रिक्स को बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) का मजबूत आधार बनाता है।

3. डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का वैश्वीकरण

भारत की UPI, आधार, डिजीलॉकर जैसी DPI पहलों को

  • कम लागत, समावेशी और मापन योग्य विकास मॉडल के रूप में
  • ग्लोबल साउथ के लिए प्रस्तुत किया जा सकता है।

यह भारत की सॉफ्ट पावर और तकनीकी नेतृत्व को सुदृढ़ करेगा।

4. रणनीतिक स्वायत्तता और बहु-संरेखण

ब्रिक्स मंच भारत को यह अवसर देता है कि वह

  • पश्चिम-नेतृत्व वाले समूहों (G7, Quad आदि)
  • और चीन जैसे देशों के साथ संतुलन बनाते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे।

यह भारत की Multi-alignment नीति का व्यावहारिक उदाहरण है।

ब्रिक्स (BRICS)

ब्रिक्स की उत्पत्ति

  • ब्रिक्स का संक्षिप्त नाम "BRICS" सर्वप्रथम 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील द्वारा तैयार किया गया था। 
  • उन्होंने ब्राजील, रूस, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं की विकास संभावनाओं पर एक रिपोर्ट में यह शब्द प्रस्तुत किया, जिसमें यह बताया गया कि ये चार देश मिलकर विश्व के उत्पादन और जनसंख्या का एक महत्वपूर्ण हिस्सा दर्शाते हैं।
  • 2006 में, इन चार देशों ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) की आम बहस के दौरान विदेश मंत्रियों की वार्षिक बैठकों के रूप में एक अनौपचारिक राजनयिक समन्वय की शुरुआत की।
  • इन सफल चर्चाओं के बाद यह तय किया गया कि यह संवाद राष्ट्राध्यक्षों और शासनाध्यक्षों के स्तर पर वार्षिक शिखर सम्मेलनों के माध्यम से जारी रहेगा।
  • 2010 में दक्षिण अफ्रीका को इस समूह में शामिल किया गया, जिससे इसका नाम "BRICS" हो गया।

प्रमुख बिंदु :-

  • ब्रिक्स विश्व की प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतर-सरकारी अनौपचारिक समूह है। 
  • स्थापना - सितंबर 2006  
    • पहला ब्रिक शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में रूस में आयोजित किया गया था ।
  • शुरुआत - ब्राजील, रूस, भारत और चीन 
  • मूल नाम - ब्रिक (BRIC)
  • पहला नया सदस्य - दक्षिण अफ्रीका सितंबर 2010 
  • नया नाम - ब्रिक्स (BRICS ) 
    • (B-Brazil, R-Russia, I-India, C-China और S-South Africa)
  • नए सदस्य (BRICS+) मिस्र,इथियोपिया,ईरान,इंडोनेशिया,सऊदी अरब,संयुक्त अरब अमीरात (UAE).

न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी)

मुख्यालय और स्थापना

  • न्यू डेवलपमेंट बैंक (एनडीबी) का मुख्यालय शंघाई, चीन में स्थित है।
  • इसकी स्थापना का विचार 2012 में नई दिल्ली में आयोजित चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में प्रस्तावित किया गया था।
  • 2014 में फोर्टालेजा में आयोजित छठे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स नेताओं ने एनडीबी की स्थापना के लिए समझौते पर हस्ताक्षर किए।
  • फोर्टालेजा घोषणापत्र में इसे ब्रिक्स देशों के सहयोग को मजबूत करने और सतत व संतुलित विकास में योगदान देने वाला एक प्रमुख संस्थान बताया गया।

आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था (सीआरए)

स्थापना और उद्देश्य

  • ब्रिक्स देशों ने 2014 में फोर्टालेजा घोषणापत्र के तहत आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था (सीआरए) की स्थापना की।
  • इसका उद्देश्य सदस्य देशों को अल्पकालिक तरलता सहायता प्रदान करना और भुगतान संतुलन (बीओपी) संकट से निपटने में मदद करना है।
  • यह वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय सुरक्षा तंत्र को सुदृढ़ करता है।

मुख्य विशेषताएं

  • सीआरए के प्रारंभिक कुल संसाधन 100 बिलियन अमेरिकी डॉलर निर्धारित किए गए।
  • यह मौजूदा अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों, जैसे अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ), के प्रयासों को पूरक बनाता है।
  • मुद्रा विनिमय के माध्यम से अल्पकालिक ऋण सहायता प्रदान करने के लिए इसे डिज़ाइन किया गया है।

ब्रिक्स (BRICS) से जुड़ी प्रमुख चुनौतियाँ

सदस्य देशों के बीच प्रभुत्व और शक्ति असंतुलन

  • ब्रिक्स में चीन, भारत और रूस जैसे बड़े देशों का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक है, जिससे छोटे सदस्य देशों पर उनका प्रभुत्व हावी हो सकता है।
  • यदि ब्रिक्स को उभरती अर्थव्यवस्थाओं का वास्तविक प्रतिनिधि बनना है, तो उसे अन्य महाद्वीपों के देशों को भी समान भागीदारी के साथ शामिल करना होगा।

एजेंडे का सीमित दायरा

  • वर्तमान में ब्रिक्स का फोकस मुख्यतः जलवायु परिवर्तन, विकास वित्त और बुनियादी ढाँचे तक सीमित है।
  • अपनी वैश्विक प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए ब्रिक्स को व्यापार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आपूर्ति शृंखला, स्वास्थ्य और सुरक्षा सहयोग जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी।

सिद्धांतों और राष्ट्रीय हितों के बीच टकराव

  • ब्रिक्स संप्रभुता, समानता और बहुलवाद जैसे सिद्धांतों पर आधारित है, लेकिन सदस्य देशों के राष्ट्रीय हित अक्सर इन सिद्धांतों से टकराते हैं।
  • उदाहरण के लिए, भारत-चीन डोकलाम गतिरोध जैसे घटनाक्रम समूह की एकजुटता को कमजोर करते हैं।

चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) और आंतरिक मतभेद

  • चीन की बेल्ट एंड रोड पहल को लेकर ब्रिक्स के भीतर मतभेद स्पष्ट हैं।
  • भारत इस पहल को अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय संतुलन के लिए चुनौती मानता है, जिससे भारत-चीन संबंधों में तनाव बना रहता है और ब्रिक्स की सामूहिक एकता प्रभावित होती है।

विविधता और हितों का संघर्ष

  • ब्रिक्स देशों की आर्थिक संरचना, राजनीतिक व्यवस्था और विकास प्राथमिकताएँ एक-दूसरे से भिन्न हैं।
  • यह विविधता कई बार संगठन की निर्णय-क्षमता और सामूहिक कार्रवाई में बाधा बन जाती है।

चीन का अत्यधिक आर्थिक प्रभाव

  • ब्रिक्स देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार चीन है, जिससे संगठन में चीनी प्रभाव अत्यधिक बढ़ गया है।
  • इस कारण ब्रिक्स को अक्सर चीन-केंद्रित मंच के रूप में देखा जाता है और अन्य देशों के लिए व्यापार घाटे का संतुलन एक बड़ी चुनौती बन जाता है।

सीमित प्रभावशीलता

  • हालाँकि ब्रिक्स एक शक्तिशाली मंच है, लेकिन वैश्विक शासन सुधार और ग्लोबल साउथ के प्रतिनिधित्व में इसकी उपलब्धियाँ अपेक्षाकृत सीमित रही हैं।
  • चीन के तीव्र आर्थिक उदय ने समूह के भीतर असंतुलन पैदा किया है, जिससे अन्य देशों की भूमिका अपेक्षाकृत कमजोर दिखती है।
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