भारत में प्रत्येक वर्ष लगभग 70 लाख से 1 करोड़ युवा श्रम बाजार में प्रवेश करते हैं। यह पीढ़ी पहले की तुलना में अधिक शिक्षित है और बेहतर रोजगार की अपेक्षा रखती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या भारतीय अर्थव्यवस्था युवाओं और महिलाओं के लिए पर्याप्त और गुणवत्तापूर्ण रोजगार उपलब्ध करा सकती है तथा अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को आर्थिक विकास में बदल सकती है।
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 के अनुसार श्रम बाजार में सुधार के संकेत मिले हैं। रोजगार और महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ी है, नियमित वेतनभोगी नौकरियों में वृद्धि हुई है और युवाओं के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं। इसके बावजूद कौशल प्रशिक्षण की कमी, शिक्षा और रोजगार के बीच अंतर, महिलाओं की सीमित भागीदारी जैसी चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं।
जनसांख्यिकी लाभांश के बिंदु
रोजगार में सकारात्मक संकेत
रिपोर्ट के अनुसार श्रम बल सहभागिता दर 59 प्रतिशत, कार्यबल सहभागिता दर 57 प्रतिशत और बेरोजगारी दर लगभग 3 प्रतिशत है। यह रोजगार के लिहाज से सकारात्मक संकेत माने जा रहे हैं।
वर्ष 2024 की तुलना में युवा बेरोजगारी में कमी आई है और ग्रामीण तथा शहरी दोनों क्षेत्रों में युवाओं की भागीदारी बढ़ी है। महिलाओं की श्रम भागीदारी में भी लगातार सुधार देखा गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की श्रम बल सहभागिता दर सितंबर 2025 तक लगातार बढ़ती रही और मई के बाद अपने उच्चतम स्तर पर पहुँची। इससे यह स्पष्ट होता है कि रोजगार बाजार धीरे-धीरे अधिक समावेशी बन रहा है।
रोजगार की गुणवत्ता में भी सुधार दिखाई देता है। नियमित वेतनभोगी रोजगार का हिस्सा 22 प्रतिशत से बढ़कर 24 प्रतिशत हो गया है। पुरुषों और महिलाओं दोनों में इस श्रेणी के रोजगार में वृद्धि हुई है।
दूसरी ओर, स्वरोजगार का हिस्सा 58 प्रतिशत से घटकर 56 प्रतिशत रह गया है। चूँकि नियमित वेतनभोगी नौकरियाँ अधिक आय और सामाजिक सुरक्षा जैसी सुविधाएँ प्रदान करती हैं, इसलिए यह बदलाव महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
महिलाओं की आय और अवसरों में सुधार
वेतन के आँकड़ों से भी सकारात्मक बदलाव दिखाई देते हैं। नियमित वेतनभोगी नौकरियों में महिलाओं की आय में 7 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई, जबकि पुरुषों की आय में 6 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
स्वरोजगार में महिलाओं की आय 9 प्रतिशत और पुरुषों की आय 8 प्रतिशत बढ़ी। आकस्मिक श्रम में भी महिलाओं की मजदूरी में 5 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जबकि पुरुषों के वेतन में लगभग कोई बदलाव नहीं आया।
हालाँकि, आय में लैंगिक असमानता अभी भी बनी हुई है। वेतनभोगी नौकरियों में महिलाएँ पुरुषों की तुलना में लगभग 76 प्रतिशत आय अर्जित करती हैं। दिहाड़ी मजदूरी में यह अनुपात लगभग 69 प्रतिशत और स्वरोजगार में केवल 36 प्रतिशत है। इसके बावजूद, औपचारिक रोजगार की ओर बढ़ते कदम महिलाओं को अधिक आर्थिक लाभ दिलाने लगे हैं।
संरचनात्मक बदलाव और नए अवसर
भारत की अर्थव्यवस्था में भी धीरे-धीरे संरचनात्मक बदलाव हो रहे हैं। कृषि क्षेत्र में रोजगार का हिस्सा घटकर 43 प्रतिशत रह गया है, जबकि विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में रोजगार बढ़ा है।
युवा, विशेषकर महिलाएँ, इन क्षेत्रों में तेजी से प्रवेश कर रही हैं। इसके साथ ही युवा वर्ग में जाति और लिंग आधारित पेशागत विभाजन भी कम हुआ है। वस्तुतः यह शिक्षा तक बढ़ती पहुँच और सामाजिक गतिशीलता का परिणाम माना जा सकता है।
प्रमुख चुनौतियाँ
शिक्षा और रोजगार के बीच अंतर
हालाँकि कई सकारात्मक संकेत मिले हैं, लेकिन कुछ चुनौतियाँ अब भी गंभीर हैं। सबसे बड़ी चुनौती शिक्षा से रोजगार तक का संक्रमण है। उच्च शिक्षा में नामांकन लगातार बढ़ा है और अब विभिन्न आय वर्गों के लिए कॉलेज शिक्षा अधिक सुलभ हुई है। फिर भी, 2004 से 2023 के बीच हर वर्ष लगभग 50 लाख स्नातक श्रम बाजार में आए, लेकिन उनमें से केवल 28 लाख को ही रोजगार मिल सका।
औपचारिक कौशल प्रशिक्षण की कमी भी एक बड़ी समस्या है। 15 से 59 वर्ष आयु वर्ग के केवल 4 प्रतिशत लोगों ने ही तकनीकी या व्यावसायिक प्रशिक्षण प्राप्त किया है। जबकि जिन लोगों ने कौशल प्रशिक्षण लिया, उनमें रोजगार की संभावना काफी अधिक पाई गई। इससे स्पष्ट है कि कौशल विकास और रोजगार के बीच मजबूत संबंध है।
महिलाओं की कार्यबल में सीमित भागीदारी
महिलाओं की श्रम भागीदारी में सुधार के बावजूद कई सामाजिक बाधाएँ अब भी मौजूद हैं।
पुरुषों द्वारा श्रम बाजार से बाहर रहने का मुख्य कारण शिक्षा बताया गया, जबकि महिलाओं ने बच्चों की देखभाल और घरेलू जिम्मेदारियों को प्रमुख कारण माना। इससे यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं पर अनपेड वर्क (unpaid work) यानी अवैतनिक घरेलू कार्यों का बोझ अधिक है। उदाहरण के लिए, शहरी स्वरोजगार में पुरुष महिलाओं की तुलना में हर सप्ताह लगभग 17.5 घंटे अधिक काम करते हैं। नियमित वेतनभोगी नौकरियों में भी यह अंतर लगभग 8 घंटे प्रति सप्ताह है। यह महिलाओं के सामने मौजूद दोहरे कार्यभार को दर्शाता है।
नीट (NEET) युवाओं की बढ़ती चुनौती
एक अन्य बड़ी चिंता NEET वर्ग है, यानी वे युवा जो न शिक्षा में हैं, न रोजगार में और न किसी प्रशिक्षण में। 15 से 29 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 25 प्रतिशत युवा इस श्रेणी में आते हैं।
इनमें से कई लोग नौकरी की तलाश भी छोड़ चुके हैं, इसलिए वे बेरोजगारी के आँकड़ों में शामिल नहीं हो पाते। यदि समय रहते इन युवाओं को रोजगार और प्रशिक्षण से नहीं जोड़ा गया, तो इससे देश की उत्पादकता और आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
बदलती वैश्विक परिस्थितियाँ
भारत वर्तमान में अपने जनसांख्यिकीय लाभांश के महत्वपूर्ण दौर में है। अनुमान है कि 2030 के बाद कामकाजी आयु वाली आबादी का अनुपात घटने लगेगा। इसका अर्थ है कि भारत के पास सीमित समय है जिसमें वह अपने युवा संसाधन को आर्थिक ताकत में बदल सकता है।
इसके साथ ही वैश्विक परिस्थितियाँ भी तेजी से बदल रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) रोजगार और कौशल की जरूरतों को बदल रही है। हरित अर्थव्यवस्था नए प्रकार के रोजगार पैदा कर रही है, जबकि भू-राजनीतिक बदलाव वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं को प्रभावित कर रहे हैं। ऐसे में भारत को अपने कार्यबल को नई चुनौतियों के अनुरूप तैयार करना होगा।
आगे की दिशा
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2025 के आँकड़े बताते हैं कि भारत का श्रम बाजार सही दिशा में आगे बढ़ रहा है। रोजगार अधिक औपचारिक हो रहा है, वेतन बढ़ रहे हैं और महिलाओं तथा युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार हो रहा है।
हालाँकि, इन उपलब्धियों को दीर्घकालिक आर्थिक विकास में बदलने के लिए और अधिक लक्षित नीतियों की आवश्यकता होगी। उद्योग आधारित कौशल प्रशिक्षण का विस्तार करना, महिलाओं के लिए कार्यस्थल को अधिक अनुकूल बनाना, सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करना और हरित क्षेत्रों में रोजगार बढ़ाना महत्वपूर्ण कदम होंगे।
इसके अलावा, शिक्षुता (Apprenticeship) जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से शिक्षा और रोजगार से दूर हो चुके युवाओं को दोबारा अर्थव्यवस्था से जोड़ना भी आवश्यक होगा। यदि भारत इन चुनौतियों का प्रभावी समाधान कर पाता है, तो उसका जनसांख्यिकीय लाभांश आने वाले वर्षों में आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है।