चर्चा में क्यों ?
- केंद्रीय गृह मंत्रालय ने घोषणा की है कि 1 जनवरी 2027 से नए आपराधिक कानूनों के तहत होने वाली जांच (Investigation) और न्यायिक कार्यवाही (Trial) को पूरी तरह डिजिटल रूप में रिकॉर्ड किया जाएगा। इसके लिए Interoperable Criminal Justice System (ICJS) का देशव्यापी क्रियान्वयन लगभग अंतिम चरण में है।
- यह पहल भारत के आपराधिक न्याय तंत्र को कागज आधारित व्यवस्था से डिजिटल, पारदर्शी और एकीकृत प्रणाली में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

क्या है इंटरऑपरेबल क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम (ICJS) ?
- Interoperable Criminal Justice System (ICJS) भारत सरकार का एक राष्ट्रीय डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जिसका उद्देश्य आपराधिक न्याय प्रणाली से जुड़े सभी प्रमुख संस्थानों को एक साझा डिजिटल नेटवर्क से जोड़ना है।
- इस प्रणाली के अंतर्गत निम्नलिखित संस्थानों को एकीकृत किया जा रहा है -
- पुलिस
- न्यायालय (Courts)
- जेल (Prisons)
- फोरेंसिक विज्ञान प्रयोगशालाएं
- अभियोजन विभाग (Prosecution)
- इस प्लेटफॉर्म के माध्यम से एफआईआर दर्ज होने से लेकर जांच, चार्जशीट, मुकदमे की सुनवाई और अंतिम निर्णय तक की पूरी प्रक्रिया डिजिटल रूप से संचालित की जाएगी।
- सिस्टम का पूरा डेटा भारत सरकार के क्लाउड प्लेटफॉर्म MeghRaj पर सुरक्षित रखा जा रहा है।
नई आपराधिक संहिताओं के बाद ICJS का महत्व क्यों बढ़ा ?
- 1 जुलाई 2024 से लागू तीन नए आपराधिक कानूनों ने डिजिटल प्रक्रियाओं और फोरेंसिक जांच को अधिक महत्व दिया है।
- ये तीन कानून हैं -
- भारतीय न्याय संहिता (Bharatiya Nyaya Sanhita - BNS) – भारतीय दंड संहिता (IPC) का स्थान लिया।
- भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) – दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) का स्थान लिया।
- भारतीय साक्ष्य अधिनियम (Bharatiya Sakshya Sanhita - BSS) – भारतीय साक्ष्य अधिनियम का स्थान लिया।
- इन कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए डिजिटल रिकॉर्ड, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और विभिन्न एजेंसियों के बीच त्वरित समन्वय आवश्यक है।
1 जनवरी 2027 तक क्या होगा ?
- 1 जनवरी 2027 से केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल हो जाएगी।
- इसके तहत जांच की संपूर्ण प्रक्रिया डिजिटल माध्यम से संचालित की जाएगी, न्यायालयीन कार्यवाही का डिजिटल रिकॉर्ड तैयार किया जाएगा, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का सुरक्षित प्रबंधन सुनिश्चित किया जाएगा तथा पुलिस, न्यायालय, जेल, अभियोजन और फोरेंसिक संस्थानों के बीच रियल-टाइम में सूचनाओं का आदान-प्रदान किया जाएगा।
एफआईआर के डिजिटल ट्रांसमिशन में अभी भी बड़ी चुनौती
- हालांकि ICJS का क्रियान्वयन तेजी से आगे बढ़ रहा है, लेकिन वर्तमान आंकड़े बताते हैं कि प्रणाली अभी पूरी तरह प्रभावी नहीं हो सकी है।
- राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार -
- केवल 46% एफआईआर ही डिजिटल रूप से न्यायालयों तक पहुंच पाती हैं।
- अर्थात आधे से अधिक मामलों में पुलिस से अदालत तक डिजिटल डेटा प्रवाह अभी भी अधूरा है।
- यह स्थिति बताती है कि डिजिटल न्याय प्रणाली को पूरी तरह सफल बनाने के लिए अभी काफी कार्य शेष है।
नए कानूनों के तहत दर्ज मामलों की स्थिति
- नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद-
- 74.66 लाख एफआईआर भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अंतर्गत दर्ज हुईं।
- 63,572 जीरो एफआईआर BNSS के तहत दर्ज की गईं।
क्या होती है Zero FIR ?
- Zero FIR वह शिकायत होती है जिसे किसी भी पुलिस थाने में, क्षेत्राधिकार की परवाह किए बिना, दर्ज कराया जा सकता है।
- बाद में इसे संबंधित पुलिस स्टेशन को भेज दिया जाता है।
- इनमें से लगभग 13,000 मामले उसी राज्य के विभिन्न जिलों में स्थानांतरित किए गए।
- गृह मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि कोई भी पुलिस अधिकारी Zero FIR दर्ज करने से इंकार नहीं कर सकता।
CCTNS: डिजिटल एफआईआर की रीढ़
- देशभर में एफआईआर दर्ज करने का कार्य Crime and Criminal Tracking Network & Systems (CCTNS) के माध्यम से किया जा रहा है।
- इसकी प्रमुख विशेषताएँ -
- लगभग 16,000 पुलिस स्टेशनों को जोड़ता है।
- 23 भारतीय भाषाओं में एफआईआर दर्ज की जा सकती है।
- भाषिणी (Bhashini) ऐप के माध्यम से जीरो एफआईआर का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद संभव है।
- इससे राज्यों के बीच मामलों के स्थानांतरण में आसानी होगी।
राज्यों की प्रगति
- अब तक हरियाणा, गोवा, असम, पंजाब और चंडीगढ़ ने आपराधिक न्याय प्रणाली के डिजिटलीकरण के सभी प्रमुख मानकों को लागू कर दिया है।
- इसके अतिरिक्त दिल्ली सहित 23 राज्य एवं केंद्रशासित प्रदेश राष्ट्रीय औसत से बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं।
- पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में इंटरनेट कनेक्टिविटी अभी भी प्रमुख बाधा बनी हुई है।
फोरेंसिक अवसंरचना का तेजी से विस्तार
- नए कानूनों के अनुसार सात वर्ष या उससे अधिक सजा वाले अपराधों में अपराध स्थल की फोरेंसिक जांच अनिवार्य कर दी गई है।
- इसी कारण फोरेंसिक सुविधाओं का विस्तार किया जा रहा है।
- प्रमुख उपलब्धियाँ
- 2023 में फोरेंसिक प्रयोगशालाएं - 129
- 2025 में बढ़कर -154
- दो वर्षों में 25 नई प्रयोगशालाएं स्थापित हुईं।
- 700 से अधिक मोबाइल फोरेंसिक यूनिट्स तैनात की गईं।
फोरेंसिक मामलों की बढ़ती संख्या
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वर्ष
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प्राप्त मामले
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लंबित मामले
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2023
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8,44,589
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4,64,879
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2025
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11,11,798
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3,90,786
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नई आपराधिक संहिताओं के क्रियान्वयन में प्रगति
- राष्ट्रीय स्तर पर नई आपराधिक संहिताओं का कार्यान्वयन स्कोर -
- जनवरी 2025 - 46.47%
- जून 2026 - 70.06%
अन्य उपलब्धियाँ
- 60 दिन में चार्जशीट दाखिल करने की अनुपालना 51% से बढ़कर 67%
- 90 दिन में चार्जशीट अनुपालना 40% से बढ़कर 61%
- 46.5 लाख डिजिटल साक्ष्य (Sakshya ID) तैयार किए गए।
- 56.74 लाख ई-समन जारी किए गए।
राष्ट्रीय पुलिस डेटाबेस कितना बड़ा है ?
- 31 मई 2026 तक राष्ट्रीय पुलिस डेटाबेस में -
- 37.68 करोड़ पुलिस रिकॉर्ड
- 9.9 करोड़ एफआईआर
- 7.64 करोड़ चार्जशीट उपलब्ध थीं।
- यह डेटाबेस पुलिस एवं जांच एजेंसियों के लिए देश का सबसे बड़ा डिजिटल आपराधिक रिकॉर्ड भंडार बन चुका है।
मुख्य चुनौतियाँ
- यद्यपि ICJS तेजी से आगे बढ़ रहा है, फिर भी कई महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बनी हुई हैं -
- दूरदराज़ एवं पूर्वोत्तर क्षेत्रों में इंटरनेट कनेक्टिविटी मजबूत करना।
- सभी राज्यों में एक समान डिजिटल प्रक्रियाएं लागू करना।
- पुलिस, न्यायालय, जेल, अभियोजन एवं फोरेंसिक संस्थानों के बीच वास्तविक इंटरऑपरेबिलिटी सुनिश्चित करना।
- अधिकारियों एवं कर्मचारियों को डिजिटल प्लेटफॉर्म के उपयोग का व्यापक प्रशिक्षण देना।
- डेटा सुरक्षा, साइबर सुरक्षा एवं गोपनीयता सुनिश्चित करना।
ICJS का महत्व
- यदि ICJS का प्रभावी क्रियान्वयन सफल होता है तो भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यापक परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं -
- जांच की गति बढ़ेगी।
- चार्जशीट और मुकदमों में देरी कम होगी।
- इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों का बेहतर प्रबंधन संभव होगा।
- विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय मजबूत होगा।
- न्याय प्रक्रिया अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनेगी।
- नागरिकों को तेज और प्रभावी न्याय मिलने की संभावना बढ़ेगी।
निष्कर्ष
भारत का आपराधिक न्याय तंत्र एक ऐतिहासिक डिजिटल परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। Interoperable Criminal Justice System (ICJS) केवल एक तकनीकी परियोजना नहीं, बल्कि न्याय प्रणाली को अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी, दक्ष और नागरिक-केंद्रित बनाने की दिशा में एक व्यापक सुधार है। हालांकि केवल 46% एफआईआर का डिजिटल रूप से न्यायालयों तक पहुंचना यह संकेत देता है कि अभी कई व्यावहारिक चुनौतियाँ शेष हैं। इसलिए 1 जनवरी 2027 का लक्ष्य तभी सफल माना जाएगा जब डिजिटल प्रणाली केवल कागजों पर नहीं, बल्कि देशभर में रोजमर्रा की न्यायिक प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा बन जाए।