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भारत का डेटा सेंटर और प्रच्छन्न जल संकट

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 3: बुनियादी ढाँचाः ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे आदि; सूचना प्रौद्योगिकी, कंप्यूटर, पर्यावरण प्रभाव का आकलन)

संदर्भ

भारत अपनी डिजिटल क्षमताओं का विस्तार करने की होड़ में पानी की कमी वाले क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर स्थापित कर रहा है जिससे भारत के डिजिटल विकास की लंबी अवधि की वहनीयता के बारे में चिंताएँ बढ़ रही हैं।

संबंधित प्रमुख बिंदु 

  • भारत तेज़ी से स्वयं को डेटा सेंटर के लिए एक वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित कर रहा है जो दुनिया के डिजिटल संचालन को शक्ति देने वाला रीढ़ की हड्डी जैसा बुनियादी ढाँचा है।
  • ये सुविधाएँ ऑनलाइन गतिविधियों, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) सिस्टम और क्लाउड सेवाओं द्वारा उत्पन्न बड़ी मात्रा में डेटा को भंडारण व प्रसंस्कृत (स्टोर एवं प्रोसेस) करती हैं।
  • हालांकि, इस तकनीकी छलांग के पीछे एक गंभीर पर्यावरणीय चुनौती छिपी है अर्थात सर्वर को ठंडा करने और सिस्टम की दक्षता बनाए रखने के लिए पानी की भारी आवश्यकता।

भारत का उभरता हुआ डेटा सेंटर हब

  • 1990 के दशक में डेटा सेंटर का उद्भव हुआ किंतु क्लाउड कंप्यूटिंग, इंटरनेट की पहुँच और AI वर्कलोड के उदय ने इनकी मांग को तेज़ी से बढ़ा दिया है।
  • मैकिन्से एंड कंपनी (2024) का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक नई डेटा सेंटर क्षमता का 70% AI-संबंधित संचालन के लिए होगा।
  • डेलॉइट की एक रिपोर्ट (2025) के अनुसार, भारत में अब प्रमुख टियर-1 शहरों में लगभग 150 चालू डेटा सेंटर हैं जिनकी कुल IT लोड क्षमता 1,200-1,300 मेगावाट है।
  • रिपोर्ट में भविष्यवाणी की गई है कि भारत 2024 और 2026 के बीच एशिया-प्रशांत क्षेत्र में सर्वाधिक क्षमता वृद्धि दर्ज करेगा जो जापान व सिंगापुर जैसे देशों को पीछे छोड़ देगा।
  • निम्न परिचालन लागत, कुशल कार्यबल और रणनीतिक स्थान भारत के लिए लाभकारी है जो इसे वैश्विक पसंदीदा स्थान बनाते हैं किंतु ये लाभ बढ़ती पर्यावरणीय लागत को छिपाते हैं।

डेटा सेंटर और उनके लिए पानी की आवश्यकता 

  • एक डेटा सेंटर में उच्च-प्रदर्शन वाले सर्वर, राउटर व स्टोरेज सिस्टम होते हैं और इसमें से सभी संचालन के दौरान काफी ताप उत्पन्न करते हैं।
  • अधिकांश सुविधाएँ पानी आधारित कूलिंग सिस्टम का उपयोग करती हैं जो अधिक गर्मी से बचाने के लिए भूजल या पृष्ठीय जल स्रोतों से पानी प्रयोग करते हैं।
  • पानी आधारित कूलिंग वाले 1 मेगावाट के डेटा सेंटर में प्राय: सालाना लगभग 26 मिलियन लीटर पानी की खपत होती है।
  • 30 मेगावाट की क्षमता वाली योटा की सुविधा संभावित रूप से प्रतिवर्ष 780 मिलियन लीटर पानी का उपयोग कर सकती है जो लगभग 15,830 शहरी निवासियों की वार्षिक घरेलू पानी की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त है। 
    • हालाँकि, योटा का दावा है कि वह एयर-बेस्ड कूलिंग टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करता है जिससे पानी का प्रयोग 6 मिलियन लीटर वार्षिक तक सीमित रहता है किंतु उसकी कुल मंज़ूर सीमा सालाना 43 मिलियन लीटर है।

छिपी हुई लागत: पानी की कमी और पर्यावरणीय प्रभाव

  • वर्ल्ड रिसोर्स इंस्टीट्यूट के एक्वाडक्ट वॉटर रिस्क एटलस के अनुसार, भारत सर्वाधिक पानी की कमी वाले 25 देशों में से एक है।
  • पहले से ही पानी की कमी वाले इलाकों में इनकी अधिक संख्या क्षेत्रीय जल संकट को अधिक बढ़ा सकती है क्योंकि डेटा सेंटर बहुत ज़्यादा पानी का प्रयोग करते हैं।
  • वर्ष 2025 के प्लैनेट ट्रैकर के एक एनालिसिस में पाया गया कि भारत में 50 डेटा सेंटर ‘अत्यधिक’ पानी की कमी वाले क्षेत्रों में स्थित हैं जो एशिया में इंडोनेशिया के बाद दूसरे स्थान पर है।
  • इन सुविधाओं का वॉटर फुटप्रिंट जलवायु, आकार एवं तकनीक के हिसाब से अलग-अलग होता है किंतु कुल मिलाकर वे भूजल की स्थिरता के लिए एक बड़ा खतरा पैदा करते हैं।

पर्यावरणीय मंज़ूरी और निगरानी में कमियां

  • उत्तर प्रदेश में डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स को राज्य-स्तरीय विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (SEAC) की सिफारिशों के आधार पर राज्य-स्तरीय पर्यावरण प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण (SEIAA) से पर्यावरणीय मंज़ूरी की ज़रूरत होती है।
  • योटा को 2020 में मंज़ूरी मिली थी किंतु यह शर्त थी कि उसे केंद्रीय भूजल प्राधिकरण (CGWA) से भूजल निकालने की अनुमति लेनी होगी।
  • हालाँकि, अधिकारियों ने यह पुष्टि नहीं की है कि ऐसी अनुमति दी गई थी या नहीं, और कंपनी का कहना है कि कोई बोरवेल नहीं खोदा गया है।
  • इसके अलावा सस्टेनेबिलिटी प्रैक्टिस में कॉर्पोरेट पारदर्शिता की बढ़ती मांगों के बावजूद योटा ने पर्यावरण, सामाजिक एवं शासन (ESG) रिपोर्ट प्रकाशित नहीं की है।

स्थानीय प्रभाव और आगे की राह 

  • भारत के दो प्रमुख IT हब बेंगलुरु एवं गौतम बुद्ध नगर में जांच से पता चलता है कि तकनीकी प्रगति व स्थानीय जल सुरक्षा के बीच तनाव बढ़ रहा है।
  • निवासी घटते भूजल स्तर और पानी की अपर्याप्त उपलब्धता की रोज़ाना की वास्तविकता का सामना करते हैं जबकि कंपनियां नवाचार व आर्थिक विकास पर ज़ोर देती हैं।
  • मज़बूत पर्यावरणीय नियमों, पारदर्शिता एवं पानी बचाने वाली तकनीक के बिना भारत का डिजिटल विस्तार मौजूदा असमानताओं व पर्यावरणीय गिरावट को अधिक गंभीर कर सकता है।

डेटा सेंटर कूलिंग तकनीक के बारे में 

  • इवेपोरेटिव कूलिंग (दक्ष किंतु अधिक जल की खपत): यह सर्वर से ऊष्मा हटाने के लिए पानी का इस्तेमाल करता है जो उच्च ऊर्जा दक्षता प्रदान करता है। हालांकि, इसमें लगातार पानी की ज़रूरत होती है, विशेषकर गर्म या सूखे इलाकों में, जिससे यह उन जगहों पर कम टिकाऊ होता है जहाँ पानी की कमी है।
    • बेंगलुरु या नोएडा जैसे शहरों में, जहाँ ताज़े पानी के संसाधन पहले से ही कम हैं, इवेपोरेटिव सिस्टम की लगातार पानी की आपूर्ति पर निर्भरता से पर्यावरण संबंधी गंभीर चिंताएँ पैदा होती हैं।
  • एयर-कूल्ड चिलर: ये बड़े पंखों का इस्तेमाल करके ऊष्मा नष्ट करते हैं। ये प्रणाली बहुत कम या बिल्कुल भी पानी प्रयोग नहीं करते हैं जिससे ये पानी की कमी वाले इलाकों में आकर्षक होते हैं।
    • हालांकि, इन्हें पानी आधारित सिस्टम की तुलना में काफी ज़्यादा बिजली की ज़रूरत होती है जो उनके पर्यावरणीय लाभ को खत्म कर सकता है यदि पावर ग्रिड जीवाश्म ईंधन पर बहुत अधिक निर्भर है।
  • लिक्विड कूलिंग टेक्नोलॉजी: इसमें सर्वर व चिप्स को एक विशिष्ट डाइइलेक्ट्रिक (नॉन-कंडक्टिव) फ्लूइड में डुबोया जाता है जो सीधे कंपोनेंट्स से ऊष्मा सोख लेता है। फिर फ्लूइड ऊष्मा को एक हीट एक्सचेंजर में ट्रांसफर करता है जहाँ इसे दोबारा सर्कुलेट करने से पहले ठंडा किया जाता है।
    • इमर्शन कूलिंग से ऊर्जा की काफी बचत होती है और यह इवेपोरेटिव या एयर-बेस्ड सिस्टम की तुलना में बहुत कम पानी इस्तेमाल करता है। हालांकि, इसमें शुरुआती लागत ज़्यादा होती है किंतु यह दक्षता, विश्वसनीयता एवं पर्यावरणीय वहनीयता के मामले में लंबे समय तक लाभ देता है।
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