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भारत की हरित शासन पहल (2025-2030)

संदर्भ 

  • भारत ने अपनी प्राकृतिक विरासत को बचाने और स्थानीय समुदायों को सशक्त बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) और राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण (NBA) ने “जैव विविधता संरक्षण प्रतिबद्धताओं को सुनिश्चित करने के लिए संस्थागत क्षमताओं को मजबूत करना” नामक एक पांच वर्षीय महत्वाकांक्षी परियोजना की शुरुआत की है। 

परियोजना से संबंधित प्रमुख बिंदु  

  • यह परियोजना केवल संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ग्राम पंचायत विकास योजनाओं (GPDP) को हरित रूप देने और स्थानीय संस्थानों को वित्तीय रूप से आत्मनिर्भर बनाने का एक अभिनव प्रयास है। 

वैश्विक सहयोग और निवेश  

  • यह पहल भारत सरकार, वैश्विक पर्यावरण सुविधा (GEF) और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) के बीच एक त्रिपक्षीय गठबंधन का परिणाम है। 
  • वर्ष 2025-2030 की अवधि के लिए इस परियोजना को 4.88 मिलियन अमेरिकी डॉलर का अनुदान दिया गया है, जो पारिस्थितिक तंत्र को मजबूत करने के प्रति अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय प्रतिबद्धता को दर्शाता है।  

प्रमुख कार्यक्षेत्र: दो महत्वपूर्ण पारिस्थितिक भू-भाग 

परियोजना का क्रियान्वयन भारत के दो सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में किया जा रहा है:

  • तमिलनाडु (सत्यमंगलम भू-भाग): पश्चिमी और पूर्वी घाटों के संगम पर स्थित यह क्षेत्र मुदुमलाई और सत्यमंगलम बाघ अभयारण्यों का घर है। यहाँ वन-सीमावर्ती समुदायों के पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को सरकारी योजनाओं (GPDP) में शामिल किया जाएगा ताकि वन्यजीव गलियारों का संरक्षण सुनिश्चित हो सके। 
  • मेघालय (गारो हिल्स): नोकरेक जैवमंडल अभयारण्य और बालपक्रम राष्ट्रीय उद्यान जैसे क्षेत्रों में फैली यह परियोजना ग्राम रोजगार परिषदों (VECs) के माध्यम से समुदाय-नेतृत्व वाले संरक्षण को बढ़ावा देगी। 

परियोजना के मुख्य स्तंभ और उद्देश्य 

परियोजना को तीन प्रमुख उद्देश्यों के आधार पर डिजाइन किया गया है:

  • जैव विविधता को मुख्यधारा में लाना: पंचायती राज संस्थानों (PRI) और जैव विविधता प्रबंधन समितियों (BMC) को सशक्त बनाना ताकि विकास योजनाओं में प्रकृति संरक्षण को प्राथमिकता मिले। इसके लिए एक बहु-हितधारक मंच तैयार किया जाएगा जिसमें सरकारी विभागों के साथ-साथ नागरिक समाज की भी भागीदारी होगी। 
  • अभिनव वित्तपोषण (Innovative Financing): संरक्षण को आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने के लिए एक्सेस और बेनिफिट शेयरिंग (ABS), सीएसआर सह-वित्तपोषण और हरित सूक्ष्म उद्यमों (Green Micro-enterprises) को सक्रिय किया जाएगा। इससे स्थानीय समुदायों के लिए स्थायी आजीविका के नए द्वार खुलेंगे। 
  • क्षमता निर्माण और ज्ञान प्रबंधन: महिलाओं, अनुसूचित जातियों और आदिवासी समुदायों की शासन में भूमिका बढ़ाना और सफल मॉडलों को राष्ट्रव्यापी स्तर पर लागू करने के लिए व्यवस्थित दस्तावेज तैयार करना।  

भविष्य की राह

  • यह परियोजना भारत की राष्ट्रीय जैव विविधता रणनीति और कार्य योजना (NBSAP 2024-2030) और वैश्विक 30x30 लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है। 
  • बॉटम-अप (जमीनी स्तर से ऊपर) दृष्टिकोण अपनाते हुए, यह सुनिश्चित किया जा रहा है कि संरक्षण केवल फाइलों तक सीमित न रहे, बल्कि ग्राम सभाओं और स्थानीय समुदायों के जीवन का हिस्सा बने। 

वस्तुतः तमिलनाडु और मेघालय के विजन 2030 दस्तावेजों के साथ तालमेल बिठाते हुए, यह परियोजना भारत को एक ऐसे भविष्य की ओर ले जा रही है जहाँ प्रगति और प्रकृति एक साथ चल सकें। यह परियोजना संपूर्ण सरकार और संपूर्ण समाज की भागीदारी का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। 

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