संदर्भ
- भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी और उससे जनित सुरक्षा का संकट लंबे समय से एक जटिल सामाजिक और विनियामक मुद्दा रहा है। इस संवेदनशील विषय पर एक ऐतिहासिक और निर्णायक कदम उठाते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने मई 2026 में अपने एक महत्वपूर्ण फैसले के तहत सार्वजनिक स्थानों पर नागरिकों की सुरक्षा को सर्वोपरि माना है।
प्रमुख बिंदु
- न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संदीप मेहता और एनवी अंजारी की तीन सदस्यीय पीठ ने अपने नवंबर 2025 के आदेश में संशोधन करने से साफ इनकार कर दिया। अदालत का यह रुख स्पष्ट करता है कि शैक्षणिक संस्थानों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों और बस डिपो जैसे अत्यधिक भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थलों से आवारा कुत्तों को हटाना अनिवार्य है और नसबंदी या टीकाकरण के बाद भी उन्हें इन संवेदनशील परिसरों में दोबारा नहीं छोड़ा जा सकता।
- यह निर्णय पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 और पशु जन्म नियंत्रण (ABC) नियम, 2023 की उस व्याख्या को खारिज करता है जिसके तहत आवारा कुत्तों को बिना किसी वर्गीकरण के हर सार्वजनिक स्थान पर रहने का पूर्ण अधिकार देने का तर्क दिया जाता था।
जीवन का अधिकार और संवैधानिक संतुलन
- सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को सीधे तौर पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार) से जोड़ा है। वस्तुतः अदालत ने स्पष्ट किया कि प्रत्येक नागरिक को सार्वजनिक स्थानों पर किसी भी प्रकार के शारीरिक हमले, क्षति या कुत्ते के काटने के निरंतर भय से मुक्त होकर घूमने का अधिकार है।
न्यायालय की टिप्पणी
- जब मनुष्यों की सुरक्षा और संवेदनशील प्राणियों (Animals) के कल्याण के हितों के बीच टकराव होगा, तो संवैधानिक संतुलन अनिवार्य रूप से मानव जीवन के संरक्षण की ओर ही झुकेगा। ऐसे में प्रशासनिक तंत्र मूकदर्शक बनकर नागरिकों को जानलेवा खतरों के साए में नहीं छोड़ सकता।
संकट की भयावहता के आंकड़े
अदालत ने अपने फैसले में देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आए कुत्ते के काटने (Dog Bites) के हालिया और चिंताजनक आंकड़ों का विशेष उल्लेख किया :
|
क्षेत्र / स्थान
|
दर्ज मामले (वर्ष 2026)
|
स्थिति की गंभीरता
|
|
तमिलनाडु
|
2.63 लाख मामले (प्रथम 4 माह)
|
17 मौतों की पुष्टि
|
|
उदयपुर
|
1,750 मामले
|
शहरी क्षेत्रों में बढ़ता आतंक
|
|
भीलवाड़ा
|
एक ही दिन में 42 मामले
|
तात्कालिक और आक्रामक हमले
|
|
आईजीआई एयरपोर्ट, नई दिल्ली
|
31 मामले (1 जनवरी से अब तक)
|
सुरक्षा क्षेत्रों और टर्मिनलों तक विस्तार
|
ये आंकड़े दर्शाते हैं कि यह समस्या अब केवल रिहायशी कॉलोनियों तक सीमित नहीं है, बल्कि देश के अति-सुरक्षित हवाई अड्डों और प्रमुख सार्वजनिक केंद्रों तक फैल चुकी है।
प्रमुख नीतिगत निर्देश और प्रशासनिक ढाँचा
सर्वोच्च न्यायालय ने आवारा कुत्तों के संकट से निपटने और दो दशकों की प्रशासनिक शिथिलता को दूर करने के लिए राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को सख्त निर्देश जारी किए हैं:
जिला स्तर पर एबीसी (ABC) केंद्रों की स्थापना
- न्यायालय ने माना कि पिछले 20 वर्षों में आवारा कुत्तों की आबादी को नियंत्रित करने के लिए बुनियादी ढाँचे का व्यवस्थित विकास नहीं किया गया है। इसलिए, अब प्रत्येक जिले में कम से कम एक पूर्णतः कार्यात्मक पशु जन्म नियंत्रण (Animal Birth Control) केंद्र स्थापित करना अनिवार्य होगा।
- यह केंद्र आधुनिक चिकित्सा उपकरणों, प्रशिक्षित शल्य चिकित्सकों और आवश्यक टीकों से सुसज्जित होना चाहिए। जनसंख्या घनत्व के आधार पर इनकी संख्या बढ़ाई भी जा सकती है।
आक्रामक कुत्तों के लिए इच्छामृत्यु (Euthanasia) की अनुमति
- एक अत्यंत महत्वपूर्ण और कड़े कानूनी प्रावधान के तहत, न्यायालय ने नगर निगम अधिकारियों को रेबीज से पीड़ित, असाध्य रूप से बीमार या अत्यधिक हिंसक और खतरनाक हो चुके कुत्तों के मामलों में इच्छामृत्यु (Euthanasia) जैसे उपाय अपनाने की वैधानिक अनुमति दी है। हालांकि, इसके लिए योग्य पशु चिकित्सा विशेषज्ञों का उचित मूल्यांकन अनिवार्य होगा।
पशु कल्याण संगठनों और फीडर्स का उत्तरदायित्व (Tortious Liability)
- न्यायालय ने उन संगठनों और समूहों पर भी नकेल कसी है जो शैक्षणिक संस्थानों के भीतर आवारा कुत्तों को खाना खिलाने या उनकी देखभाल का दावा करते हैं। अब ऐसे किसी भी छात्र निकाय या कल्याण समूह को संस्थान के प्रमुख के समक्ष एक हलफनामा देकर अपकृत्य दायित्व (Tortious Liability) यानि किसी भी अप्रिय घटना की कानूनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। ऐसा न करने पर परिसर के भीतर कुत्तों को खिलाने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
क्रियान्वयन की रूपरेखा और न्यायिक निगरानी
- चूँकि उच्चतम न्यायालय के लिए दैनिक आधार पर इन निर्देशों की निगरानी करना प्रशासनिक रूप से कठिन है, इसलिए न्यायालय ने देश के सभी उच्च न्यायालयों (High Courts) को इस संबंध में स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लेते हुए निगरानी प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है।
- अदालत ने साफ चेतावनी दी है कि अधिकारियों द्वारा इस कार्य में किसी भी प्रकार की कोताही या उदासीनता को उच्च न्यायालयों द्वारा अत्यंत गंभीरता से लिया जाना चाहिए और दोषी अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना (Contempt of Court) तथा अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की जानी चाहिए।
निष्कर्ष: आगे की राह
- सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला पशु कल्याण समूहों की उन चिंताओं के बीच आया है जो इन उपायों को क्रूरता के समतुल्य मानते रहे हैं। हालांकि, अदालत ने नगर निगम के अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करते हुए स्पष्ट किया है कि सद्भावना से किए गए आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के खिलाफ किसी भी दुर्भावनापूर्ण या परेशान करने वाली कानूनी कार्रवाई को उच्च न्यायालय तुरंत रद्द कर सकते हैं।
- यह ऐतिहासिक निर्णय स्पष्ट करता है कि सह-अस्तित्व की भावना तभी तक प्रासंगिक है जब तक वह मानव जीवन के लिए खतरा न बन जाए। अब पूरी व्यवस्था की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राज्य सरकारें और स्थानीय निकाय कितनी तत्परता से जिला स्तर पर चिकित्सा बुनियादी ढाँचे का निर्माण करते हैं और इस अदालती आदेश को जमीनी हकीकत में बदलते हैं।