संदर्भ
भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में पशुधन केवल कृषि का सहायक क्षेत्र नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की आजीविका, पोषण और आय का महत्वपूर्ण आधार है। ऐसे में पशुओं को संक्रामक रोगों से सुरक्षित रखना किसानों की आर्थिक स्थिति और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों के लिए आवश्यक है। इसी उद्देश्य से सितंबर 2019 में राष्ट्रीय पशु रोग नियंत्रण कार्यक्रम (एनएडीसीपी) की शुरुआत की गई। इसका मुख्य लक्ष्य देशव्यापी टीकाकरण, निगरानी और वैज्ञानिक रोग नियंत्रण के माध्यम से खुरपका-मुंहपका रोग (एफएमडी) तथा ब्रूसेलोसिस पर नियंत्रण और इनके उन्मूलन की दिशा में आगे बढ़ना है।
पशुधन स्वास्थ्य क्यों महत्वपूर्ण है?
- 2019 की 20वीं पशुधन गणना के अनुसार भारत में लगभग 535.78 करोड़ पशुधन हैं, जिनमें 302.79 करोड़ गोवंशीय पशु शामिल हैं।
- एफएमडी और ब्रूसेलोसिस जैसे रोग पशुओं की उत्पादकता, प्रजनन क्षमता और दूध उत्पादन को प्रभावित करते हैं। एफएमडी गाय, भैंस, भेड़, बकरी और सुअर जैसे विभाजित खुर वाले पशुओं को प्रभावित करने वाला अत्यंत संक्रामक वायरल रोग है।
- इससे दूध उत्पादन, विकास, प्रजनन और कार्य क्षमता में कमी आती है। दूसरी ओर, ब्रूसेलोसिस मुख्य रूप से गायों और भैंसों की प्रजनन क्षमता को प्रभावित करता है और इससे दुग्ध एवं मांस उत्पादन पर प्रतिकूल असर पड़ता है। मवेशियों में इसके प्रभावी उपचार का अभाव होने के कारण टीकाकरण इसका प्रमुख बचाव उपाय है।
व्यापक टीकाकरण और निगरानी
- एनएडीसीपी के तहत एफएमडी से बचाव के लिए पात्र पशुओं का हर छह महीने में टीकाकरण करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं 4 से 8 महीने की बछियों को ब्रूसेलोसिस का जीवनकाल में एक बार टीका लगाया जाता है। अब तक कार्यक्रम के अंतर्गत 147.16 करोड़ एफएमडी वैक्सीन खुराक दी जा चुकी हैं, जिससे 8.04 करोड़ किसानों को लाभ मिला है।
- टीकाकरण के साथ-साथ सीरो-निगरानी और सीरो-सर्विलांस पर भी जोर दिया गया है। टीकाकरण के बाद किए गए आकलन में एफएमडी वायरस के सेरोटाइप ओ, ए और एशिया-1 के विरुद्ध औसत सुरक्षात्मक प्रतिरक्षा क्रमशः 78.1 प्रतिशत, 71.7 प्रतिशत और 77.6 प्रतिशत पाई गई। इसके सकारात्मक परिणाम रोग के मामलों में कमी के रूप में दिखाई दे रहे हैं। एफएमडी के रिपोर्टेड मामले 2019 में 132 से घटकर 2025 में 40 रह गए। पिछले तीन वर्षों में एशिया-1 से संबंधित एफएमडी का कोई मामला सामने नहीं आया है।
- ब्रूसेलोसिस के मामले भी 2019 के 22 से घटकर 2025 में 15 रह गए। 2025 में टीकाकरण के बाद गायों की बछियों में सेरोकनवर्जन दर 75.63 प्रतिशत और भैंस की बछियों में 67.17 प्रतिशत दर्ज की गई। ये आंकड़े कार्यक्रम के तहत विकसित प्रतिरक्षा और बेहतर रोग नियंत्रण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति दर्शाते हैं।
डिजिटल तकनीक और पशु चिकित्सा सेवाओं का विस्तार
- एनएडीसीपी की एक बड़ी विशेषता इसका डिजिटल एकीकरण है। भारत पशुधन पोर्टल पर जुलाई 2026 तक 39 करोड़ से अधिक पशु पंजीकृत किए जा चुके हैं। प्रत्येक पशु को 12 अंकों की विशिष्ट टैग आईडी दी जाती है, जिससे उसके टीकाकरण और स्वास्थ्य संबंधी जानकारी को ट्रैक किया जा सकता है। इससे रोग की निगरानी, पशुओं की ट्रेसबिलिटी और योजनाओं के डेटा-आधारित क्रियान्वयन को मजबूती मिली है।
- पशुपालकों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए 4,019 मोबाइल पशु चिकित्सा इकाइयां 29 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संचालित हैं। टोल-फ्री नंबर 1962 के माध्यम से ये इकाइयां घर-घर पशु चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराती हैं। अब तक 136 लाख किसानों को लाभ मिला है और 276 लाख पशुओं का उपचार किया गया है।
उत्पादकता और दूध उत्पादन में सुधार
- पशु स्वास्थ्य में सुधार का सीधा संबंध पशुधन उत्पादकता से है। देशी और मिश्रित नस्ल के मवेशियों की वार्षिक उत्पादकता 2014-15 में 927 किलोग्राम से बढ़कर 2024-25 में 1,343.2 किलोग्राम हो गई, यानी 44.89 प्रतिशत वृद्धि। इसी अवधि में भैंसों की उत्पादकता 1,880 से बढ़कर 2,365.2 किलोग्राम हुई।
- भारत में गोवंशीय पशुओं की औसत उत्पादकता भी 1,640 किलोग्राम से बढ़कर 2,250 किलोग्राम प्रति पशु प्रति वर्ष हो गई। इसी प्रकार देश का दूध उत्पादन 146.31 मिलियन टन से बढ़कर 247.87 मिलियन टन हो गया, जो लगभग 69.4 प्रतिशत वृद्धि है। सरकार का लक्ष्य 2030 तक औसत दूध उत्पादकता को 3,000 किलोग्राम प्रति पशु प्रति वर्ष तक पहुंचाना है।
वन हेल्थ और महामारी की तैयारी
- एनएडीसीपी का महत्व केवल पशुधन तक सीमित नहीं है। पशु, मानव और पर्यावरण के स्वास्थ्य की परस्पर निर्भरता को ध्यान में रखते हुए यह वन हेल्थ दृष्टिकोण को भी मजबूत करता है। पशु रोगों की शीघ्र पहचान और नियंत्रण से मनुष्यों में फैलने वाले जूनोटिक रोगों के जोखिम को कम किया जा सकता है।
- 2024 में शुरू की गई 25 मिलियन अमेरिकी डॉलर की महामारी कोष परियोजना पशु स्वास्थ्य प्रणालियों को मजबूत करने, जीनोमिक और पर्यावरणीय निगरानी बढ़ाने तथा प्रयोगशाला अवसंरचना के उन्नयन में सहयोग कर रही है। इसके साथ मानक पशु चिकित्सा उपचार दिशानिर्देश और पशु रोगों के लिए संकट प्रबंधन योजना भी महामारी और रोग प्रकोप से निपटने की क्षमता बढ़ाते हैं।
आगे की राह
- वित्तीय वर्ष 2026-27 में पशुधन स्वास्थ्य एवं रोग नियंत्रण कार्यक्रम के लिए 2,010 करोड़ रुपये का कुल बजट परिव्यय निर्धारित किया गया है। भविष्य में एफएमडी-मुक्त स्थिति की दिशा में आगे बढ़ने, जीनोमिक निगरानी, एआई आधारित रोग विश्लेषण, बेहतर प्रयोगशाला क्षमता और जलवायु-अनुकूल निगरानी प्रणालियों को मजबूत करना महत्वपूर्ण होगा।
- कुल मिलाकर, एनएडीसीपी ने भारत में पशु स्वास्थ्य को टीकाकरण से आगे बढ़ाकर निगरानी, डिजिटल डेटा, मोबाइल पशु चिकित्सा सेवाओं, अनुसंधान, वन हेल्थ और महामारी तैयारी से जोड़ दिया है। एफएमडी और ब्रूसेलोसिस के मामलों में कमी, पशुओं में बेहतर प्रतिरक्षा और दूध उत्पादकता में वृद्धि इसके प्रभाव को दर्शाती है। स्वस्थ पशुधन का अर्थ स्वस्थ किसान, बेहतर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और मजबूत खाद्य सुरक्षा है। इसलिए रोग-मुक्त पशुधन का निर्माण विकसित भारत 2047 की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार बनेगा।