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वर्तमान वैश्विक भू-राजनीतिक परिदृश्य में भारत की स्थिति 

(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 2: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार; भारत के हितों पर विकसित एवं विकासशील देशों की नीतियों तथा राजनीति का प्रभाव; प्रवासी भारतीय)

संदर्भ

वैश्विक भू-राजनीति परिवर्तनशील है और संघर्षों, आर्थिक अस्थिरता एवं बदलते गठबंधनों के कारण पारंपरिक शक्ति संरेखण में परिवर्तन हो रहे हैं। ऐसे में भारत को अपने हितों की सुरक्षा के लिए इन परिवर्तनों से निपटने की आवश्यकता है।

प्रमुख वैश्विक प्रवृत्ति 

  • एकध्रुवीयता का ह्रास : चीन के उदय और रूस की हठधर्मिता से अमेरिकी प्रभाव को चुनौती
    • चीन एवं रूस के बीच राजनयिक संबंधों की स्थापना की 75वीं वर्षगांठ के अवसर पर रूसी राष्ट्रपति की चीन की आधिकारिक यात्रा
    • CAATSA जैसे अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद विभिन्न देशों द्वारा रूसे से कच्चे तेल की खरीद
  • खंडित बहुपक्षवाद : विश्व व्यापार संगठन, संयुक्त राष्ट्र और अन्य संस्थाएँ विश्वसनीयता व प्रभावशीलता के संकट का सामना कर रही हैं।
    • रूस-यूक्रेन संघर्ष तथा इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष में कोई प्रभावी भूमिका निभाने में सक्षम न होना। 
  • क्षेत्रीय संघर्ष : यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया तनाव और हिंद-प्रशांत सैन्यीकरण से वैश्विक शासन पर दबाव बढ़ रहा है।
  • आर्थिक राष्ट्रवाद : आपूर्ति श्रृंखला का विखंडन, प्रौद्योगिकी प्रतिबंध और संरक्षणवाद।
    • अमेरिका द्वारा विभिन्न देशों पर उच्च आयात शुल्क आरोपित करना। 

भारत के प्रति विभिन्न देशों व समूहों की प्रतिक्रिया 

ऑपरेशन सिंदूर : कूटनीति की वास्तविक जाँच

  • पहलगाम हमले में शामिल पाकिस्तान के आतंकवादी समूहों को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवादी घोषित किया गया (22 अप्रैल, 2025)।
  • भारत की निर्णायक जवाबी सैन्य कार्रवाई के बाद मिली-जुली वैश्विक प्रतिक्रियाएँ आईं।
  • अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा व्यापार लाभ के माध्यम से युद्धविराम कराने के दावे ने नैरेटिव नियंत्रण चुनौतियों को उजागर किया।
  • हालाँकि, भारतीय संसद ने ट्रम्प के दाव को पूर्णतया ख़ारिज कर दिया। 
  • अमेरिका ने टी.आर.एफ. को वैश्विक आतंकी संगठन नामित किया। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् निगरानी दल ने भी पहलगाम हमले में टी.आर.एफ. की भूमिका को स्वीकार किया।

अमेरिका के साथ व्यापार संघर्ष 

  • भारत-अमेरिका निसार उपग्रह प्रक्षेपण के दिन ही अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर 25% टैरिफ लगा दिया।
  • रूस से संबंधित आयातों के बावजूद रूसी तेल आयात पर टैरिफ बढ़ने का खतरा।
  • ‘अमेरिका फ़र्स्ट’ नीतियाँ अमेरिकी कंपनियों को भारत में निवेश करने से हतोत्साहित कर रही हैं।
  • चीन के साथ अमेरिका के पुनः जुड़ाव (जैसे- चीन को एनवीडिया चिप की बिक्री की अनुमति देना) के कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर असंगत ध्यान।

यूरोपीय संघ के साथ तनावपूर्ण संबंध

  • भारत की वाडिनार रिफाइनरी (रोसनेफ्ट की हिस्सेदारी) पर यूरोपीय संघ के प्रतिबंध ऊर्जा सुरक्षा को लक्षित करते हैं।
  • यूरोपीय संघ का कार्बन सीमा कर तथा डिजिटल व्यापार बाधाएँ अभी भी लागू हैं।
  • यूरोपीय संघ के देश रूसी तेल/गैस का आयात जारी रखे हुए हैं जबकि भारत से रूसी आपूर्ति में कटौती करने का आग्रह करते हैं।
  • भारत को उम्मीद है कि हालिया भारत-ब्रिटेन व्यापार समझौता यूरोपीय संघ पर विभिन्न माँगों को कम करने का दबाव डाल सकता है।

चीन की क्षेत्रीय गतिविधियाँ

  • भारत को छोड़कर नए क्षेत्रीय समूहों को बढ़ावा देना (चीन-पाकिस्तान-बांग्लादेश पहल)
  • ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान को समर्थन
  • भारतीय सीमाओं के निकट रणनीतिक परियोजनाएँ (बांग्लादेश में लालमोनिरहाट एयरबेस का पुनरुद्धार, अरुणाचल प्रदेश में स्थानों का नाम बदलना, यारलुंग ज़ंगबो पर विशाल बाँध का निर्माण)
  • व्यापार अधिशेष और आपूर्ति शृंखला निर्भरता (दुर्लभ पृथ्वी तत्त्व, एपी.आई., सुरंग बनाने वाली मशीनें) का लाभ उठाना

क्षेत्रीय एवं वैश्विक संतुलन की चुनौतियाँ

  • अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों में सुधार; आतंक-रोधी उपायों पर पाकिस्तान की प्रशंसा, भारत की चिंताओं के प्रति असंवेदनशीलता।
  • बांग्लादेश में शासन परिवर्तन और म्यांमार की अस्थिरता में अमेरिका की भूमिका भारत के पूर्वोत्तर को प्रभावित करती है।
  • इज़राइल-गाज़ा एवं इज़राइल-ईरान संघर्षों पर भारत के मौन रुख से भू-राजनीतिक प्रभाव कम होने का खतरा है।
  • संघर्षों के आर्थिक एवं तकनीकी प्रवाह को नया रूप देने के साथ ही रणनीतिक स्वायत्तता की परीक्षा जारी है।

भारत की रणनीतिक स्थिति

  • संतुलनकारी रणनीति : भारत ने पश्चिमी शक्तियों एवं रूस दोनों के साथ संबंध बनाए रखने की कोशिश की है, जैसे- क्वाड, ब्रिक्स, एस.सी.ओ. में भागीदारी
  • रणनीतिक स्वायत्तता : गठबंधन के जाल से बचने के लिए स्वतंत्र विदेश नीति को प्राथमिकता देना
  • आर्थिक कूटनीति : जी-20 अध्यक्षता के परिणामों, व्यापार विविधीकरण एवं आपूर्ति शृंखला पहलों का लाभ उठाना
  • वैश्विक दक्षिण नेतृत्व : समतामूलक वैश्विक शासन, ऋण राहत एवं जलवायु न्याय की वकालत करना
  • सुरक्षा पर ध्यान : हिंद-प्रशांत क्षेत्र में जुड़ाव, रक्षा साझेदारी और सीमा तैयारियों को मज़बूत करना

भारत के लिए चुनौतियाँ

  • आर्थिक क्षति के बिना अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता से निपटना
  • पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच रूस के साथ संबंध बनाए रखना
  • खंडित बाज़ारों में ऊर्जा एवं प्रौद्योगिकी तक पहुँच सुनिश्चित करना
  • पाकिस्तान एवं चीन के साथ सीमा तनाव का प्रबंधन

आगे की राह 

वैश्विक जुड़ाव को पुनर्संयोजित करना

  • वैश्विक संघर्षों में निष्क्रिय ‘गैर-भागीदारी’ से हटकर चयनात्मक, हित-प्रेरित सक्रियता की ओर बढ़ना
  • वैश्विक संकटों में मुखर रुख़ साझेदारों के बीच पारस्परिकता को बढ़ा सकता है।

बहु-संरेखण को मज़बूत करना

  • ब्रिक्स, एस.सी.ओ., पूर्वी एशिया मंचों के साथ-साथ क्वाड एवं आई2यू2 (I2U2) के साथ संबंधों को मज़बूत करने पर बल दिया जाना चाहिए।
  • अमेरिका-चीन संबंधों को संतुलित करने के लिए आर.आई.सी. को पुनर्जीवित करने पर विचार करना चाहिए।

व्यापार युद्धों में आर्थिक हितों की सुरक्षा 

  • बाज़ार पहुँच की सुरक्षा के लिए अमेरिका के साथ शीघ्र द्विपक्षीय व्यापार समझौतों पर बातचीत
  • यूरोपीय संघ की वार्ताओं में ब्रिटेन के व्यापार समझौते के प्रभाव का उपयोग

चीन के क्षेत्रीय दबाव का मुकाबला करना

  • चीन के प्रभाव को कम करने के लिए बांग्लादेश, नेपाल, मालदीव एवं आसियान के साथ क्षेत्रीय कूटनीति को बढ़ाने पर विचार किया जाना चाहिए।
  • पड़ोसियों के साथ सीमावर्ती बुनियादी ढाँचे और नदी प्रबंधन कूटनीति में तेज़ी लाने की आवश्यकता है।

ऊर्जा एवं प्रौद्योगिकी सुरक्षा

  • दुर्लभ मृदा और महत्त्वपूर्ण खनिजों के स्रोतों में विविधता लाना
  • अमेरिका-यूरोपीय संघ से परे रणनीतिक प्रौद्योगिकी साझेदारी सुनिश्चित करना
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