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संक्रामक रोग और वैश्विक अन्याय

संदर्भ 

  • वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा के क्षेत्र में एक कड़वी विडंबना लंबे समय से बनी हुई है। वस्तुतः संक्रामक रोग तो सीमाओं और देशों के बीच भेदभाव नहीं करते, लेकिन उनका उपचार और उनसे निपटने के संसाधन निश्चित रूप से भेदभावपूर्ण हैं। चिकित्सा अनुसंधान में सबसे महत्वपूर्ण रोगजनक (पैथोजन) डेटा प्रदान करने वाले विकासशील देश अक्सर उनके परिणामों और जीवन रक्षक दवाओं से सबसे अंत में लाभान्वित होते हैं। 

जोखिम का साझाकरण और लाभ का एकाधिकार  

  • अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका के निम्न और मध्यम आय वाले देश (एलएमआईसी) अक्सर नए उभरते रोगों के केंद्र होते हैं। 
  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की मौजूदा व्यवस्था के तहत इन देशों से उम्मीद की जाती है कि वे अपने जैविक नमूनों और जीनोमिक डेटा को दुनिया के साथ साझा करें। हालांकि, इस डेटा का उपयोग कर टीके और दवाएं (वीटीडी) बनाने वाले अमीर देशों पर उन उत्पादों को समय पर और उचित कीमत पर उपलब्ध कराने का कोई कानूनी दायित्व नहीं है। 

कोविड-19 का सबक 

  • पीपुल्स वैक्सीन एलायंस के अनुसार, दुनिया की मात्र 13-14% आबादी वाले अमीर देशों ने आधे से अधिक वैक्सीन आपूर्ति पर कब्जा कर लिया। 
  • कोवैक्स (COVAX) पहल अपने लक्ष्यों में विफल रही और तकनीकी साझाकरण के प्रयासों को प्रमुख दवा निर्माताओं ने ठुकरा दिया।
  • इस वैक्सीन असमानता के कारण लगभग 13 लाख ऐसी मौतें हुईं जिन्हें रोका जा सकता था, और वैश्विक अर्थव्यवस्था को 28 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ। 

इबोला और द्विपक्षीय समझौतों का संकट  

  • असमानता का यह पैटर्न केवल कोविड तक सीमित नहीं है। इबोला की दवा इनमाज़ेब की एक खुराक की कीमत लगभग 6,900 डॉलर (लगभग 5.8 लाख रुपये) है, जो उन गरीब समुदायों की पहुंच से बाहर है जिन्होंने अनुसंधान के लिए अपने रक्त के नमूने दिए थे। 
  • इसी तरह, अमेरिका द्वारा कई अफ्रीकी देशों के साथ किए गए हालिया समझौते 25 वर्षों तक डेटा साझा करने की मांग करते हैं, जिसके बदले में केवल 5 वर्षों के लिए सीमित वित्तीय सहायता दी जा रही है। 

पीएबीएस (PABS): समानता की ओर एक कानूनी कदम 

  • मई 2025 में अपनाए गए महामारी समझौते में अभी भी रोगजनक पहुंच और लाभ साझाकरण (पैथोजन एक्सेस एंड बेनिफिट शेयरिंग - पीएबीएस) परिशिष्ट का अभाव है। 
  • वस्तुतः पीएबीएस का मुख्य उद्देश्य नमूना साझाकरण को गारंटीकृत लाभों से कानूनी रूप से जोड़ना है। इसके मुख्य प्रस्ताव निम्नलिखित हैं:  
    • अनिवार्य आपूर्ति : महामारी के दौरान निर्माताओं को अपने उत्पादन का 20% डब्ल्यूएचओ को देना होगा (10% मुफ्त और 10% किफायती दर पर)।
    • तकनीक हस्तांतरण : विकासशील देशों में उत्पादन क्षमता बढ़ाने के लिए लाइसेंस और तकनीक साझा करना।
    • पारदर्शिता : डेटा साझाकरण और समझौतों में अधिक जवाबदेही सुनिश्चित करना।  

विरोध के स्वर और घर्षण के बिंदु 

भारत सहित लगभग 100 विकासशील देश पीएबीएस का समर्थन कर रहे हैं, लेकिन यूरोपीय संघ (ईयू) जैसे विकसित क्षेत्र, जहां बड़ी दवा कंपनियां स्थित हैं, इसका विरोध कर रहे हैं।

  • विकसित देशों की दलील : विकसित देशों का तर्क है कि बाध्यकारी अनुबंध और नौकरशाही नवाचार (इन्नोवेशन) को बाधित कर सकते हैं।
  • असहमति : यूरोपीय संघ डेटा साझाकरण को स्वैच्छिक रखना चाहता है और बौद्धिक संपदा अधिकारों (आईपीआर) पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता है। 

समाधान का सेतु: एक संतुलित मध्य मार्ग

  • वर्तमान में एड्स हेल्थकेयर फाउंडेशन, थर्ड वर्ल्ड नेटवर्क और पब्लिक सिटिजन जैसे प्रभावशाली वैश्विक स्वास्थ्य संगठन यूरोपीय संघ के दृष्टिकोण को कड़ी चुनौती दे रहे हैं। 
  • व्यापारिक हितों और बौद्धिक संपदा (आईपी) प्रावधानों के कारण उत्पादन और मूल्य निर्धारण में जो असंतुलन पैदा हुआ है, वह इस विवाद को और गहरा कर रहा है।  
  • हालांकि, यह स्पष्ट है कि दोनों ही पक्ष अंततः एक निश्चितता (Certainty) चाहते हैं, जहाँ विकासशील देश गारंटीकृत और कानूनी रूप से लागू होने वाले लाभ चाहते हैं, वहीं उच्च आय वाले देश अपनी नवाचार अर्थव्यवस्था को अतिरिक्त बोझ से बचाते हुए एक पूर्वानुमानित प्रणाली की मांग कर रहे हैं। 
  • भविष्य की महामारियों से निपटने के लिए एक स्तरीय प्रणाली (टायर्ड सिस्टम) सबसे व्यावहारिक मध्य मार्ग साबित हो सकती है। इस मॉडल के तहत: 
    • सामान्य समय में : दायित्वों का स्तर सीमित रखा जाए।
    • महामारी के दौरान : सदस्य देशों और निर्माताओं की प्रतिबद्धताओं को बेहद मजबूत और अनिवार्य बनाया जाए।
    • वैश्विक कोष : गरीब देशों की सहायता के लिए एक समर्पित फंड की स्थापना हो, ताकि निर्माताओं पर आर्थिक बोझ का असमान वितरण न हो।  
  • तत्काल रणनीति के रूप में, डेटा की पहुंच, उपयोग, लाभ-साझाकरण, बौद्धिक संपदा अधिकार और विवाद समाधान जैसे अनिवार्य तत्वों को अब मॉडल अनुबंधों का हिस्सा बनाया जाना चाहिए। 
  • जीआईएसएआईडी (GISAID) जैसे प्लेटफार्मों को तब तक अस्थायी मान्यता दी जा सकती है, जब तक वे विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों को पूरी तरह अपना नहीं लेते।
  • साथ ही, बौद्धिक संपदा साझा करने वाले निर्माताओं को दबाव में लाने के बजाय, उन्हें पुरस्कृत करने के लिए एक सकारात्मक तंत्र विकसित करना समय की मांग है। 

आगे की राह  

  • विकसित देशों को वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के साथ अपने विश्वास को बहाल करने की आवश्यकता है, जबकि विकासशील देशों को भुगतान शर्तों पर लचीलापन दिखाना होगा। 
  • अगली महामारी चाहे वह पशुजन्य हो या कृत्रिम शायद ज्यादा दूर नहीं है। अतः हमें  यह समझना होगा कि वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा केवल एक सौदेबाजी नहीं, बल्कि सामूहिक अस्तित्व का प्रश्न है।
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