संदर्भ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हालिया बयानों ने भारत के ऊर्जा क्षेत्र में एक नई हलचल उत्पन्न कर दी है। राष्ट्रपति ट्रम्प ने संकेत दिया है कि भारत अमेरिका से अधिक कच्चा तेल खरीदने पर सहमत हुआ है जिसमें वेनेजुएला का तेल भी शामिल हो सकता है। हालाँकि आधिकारिक संयुक्त बयान में इसका उल्लेख नहीं है किंतु इस संभावित बदलाव ने भारतीय तेल विशेषज्ञों और रिफाइनरी संचालकों के बीच तकनीकी व आर्थिक बहस छेड़ दी है।
तकनीकी चुनौतियां: तेल का भारी बोझ
- वेनेजुएला का कच्चा तेल अपने ‘भारी’ (Heavy) स्वरूप के लिए जाना जाता है जो भारतीय रिफाइनरियों के लिए कई जटिलताएँ प्रस्तुत करता है। हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) और भारत पेट्रोलियम (BPCL) के शीर्ष अधिकारियों ने इस तेल की प्रकृति पर निम्नलिखित चिंताएँ जताई हैं-
- उच्च श्यानता (High Viscosity): वेनेजुएला का तेल बहुत गाढ़ा होता है। रिफाइनरी के उपकरण एक निश्चित श्यानता के लिए डिजाइन किए जाते हैं। श्यानता अधिक होने पर पाइपों और वाल्वों में दबाव बढ़ जाता है जिससे परिचालन जोखिम बढ़ता है।
- अम्लीय प्रवृत्ति (High Acid Number): इस तेल में रसायनों और अम्लों की मात्रा अधिक होती है। यदि यह प्रणाली की क्षमता से अधिक हो जाए, तो पूरी रिफाइनिंग प्रणाली (पाइप, वेसल व इनलेट) में संक्षारण (Corrosion) यानी जंग लगने का खतरा पैदा हो जाता है।
- अशुद्धियाँ: इसमें धातु और नाइट्रोजन की मात्रा अधिक होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इसे सीधे संसाधित नहीं किया जा सकता है। इसे कम-से-कम 10-15% हल्के कच्चे तेल के साथ मिलाना अनिवार्य होगा।
परिचालन और लॉजिस्टिक्स की बाधाएँ
- रिफाइनरियों को इस प्रकार के तेल के लिए पुनः कैलिब्रेट (Recalibrate) करना असंभव तो नहीं है किंतु इसमें समय व संसाधनों की आवश्यकता होती है। मुख्य चुनौतियाँ निम्नलिखित हैं-
- उत्प्रेरक (Catalysts): रिफाइनिंग प्रक्रिया में इस्तेमाल होने वाले रसायन कच्चे तेल के प्रकार पर निर्भर करते हैं। अचानक तेल का प्रकार बदलने पर बाजार से तुरंत हजारों टन नए उत्प्रेरक जुटाना मुश्किल होता है।
- भंडारण की कमी: अतिरिक्त और अलग प्रकार के तेल को रखने के लिए भारत के पास वर्तमान में पर्याप्त भंडारण क्षमता का अभाव है।
- बीमा और शिपिंग: वेनेजुएला से तेल लाने की शिपिंग लागत और बीमा, मध्य पूर्व की तुलना में 5 गुना और रूस की तुलना में 2 गुना अधिक है।
आर्थिक और रणनीतिक लाभ
- इन चुनौतियों के बावजूद आर्थिक पक्ष काफी आकर्षक है। एस.बी.आई. रिसर्च (SBI Research) के अनुसार:
- यदि भारतीय रिफाइनर प्रति बैरल $10-12 की छूट प्राप्त करने में सफल रहते हैं तो भारत के ईंधन आयात बिल में $3 अरब की बड़ी बचत हो सकती है।
- रिलायंस जैसी कंपनियां, जिनके पास जामनगर में भारी तेल को संसाधित करने की उन्नत क्षमता है, पहले ही बड़े टैंकर (VLCC) किराए पर ले चुकी हैं।
आगे की राह: कूटनीति और बाजार की स्थिति
- भारत का विदेश मंत्रालय वेनेजुएला के साथ पुराने संबंधों को पुनर्जीवित करने के लिए तैयार है। वर्ष 2019-20 तक भारत की तेल टोकरी में वेनेजुएला की हिस्सेदारी 13% तक थी, जो अब मात्र 1-2% रह गई है।
- हालाँकि, वेनेजुएला में निवेश करना एक जोखिम भरा सौदा भी है। वहाँ की राजनीतिक अनिश्चितता और उत्पादन में आई भारी गिरावट (2010 के 2.5 मिलियन बैरल से घटकर अब 0.88 मिलियन बैरल) आपूर्ति की निरंतरता पर सवाल खड़े करती है। फिलहाल, इंडियन ऑयल और हिंदुस्तान पेट्रोलियम ने अप्रैल डिलीवरी के लिए ऑर्डर दिए हैं जो इस नई ऊर्जा रणनीति की पहली अग्निपरीक्षा होगी।
निष्कर्ष
भारत के लिए वेनेजुएला का तेल एक ‘दोधारी तलवार’ जैसा है। यदि तकनीकी सीमाओं और शिपिंग लागतों को संतुलित कर लिया जाए, तो यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा व अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ा गेम-चेंजर साबित हो सकता है।