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आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026

संदर्भ

केंद्र सरकार ने डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध सामग्री को अधिक प्रभावी ढंग से नियंत्रित करने के उद्देश्य से आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का मसौदा प्रस्तावित किया है। इस प्रस्ताव का मुख्य लक्ष्य अश्लील सामग्री पर नियंत्रण स्थापित करना और सभी प्रकार की डिजिटल सामग्री के लिए अनिवार्य आयु-आधारित वर्गीकरण प्रणाली लागू करना है। 

भारत में ऑनलाइन सामग्री विनियमन की पृष्ठभूमि 

  • बीते कुछ वर्षों में ओटीटी प्लेटफॉर्म, सोशल मीडिया नेटवर्क और उपयोगकर्ता-निर्मित सामग्री के तेजी से विस्तार के कारण भारत का डिजिटल इकोसिस्टम अभूतपूर्व रूप से विकसित हुआ है। इस डिजिटल प्रसार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक मंच प्रदान किया है और विविध विचारों को सामने लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • हालाँकि, इस ओपन डिजिटल वातावरण के साथ कई गंभीर चुनौतियाँ भी उभरकर सामने आई हैं। अश्लीलता, घृणास्पद भाषण, भ्रामक सूचनाओं और अन्य हानिकारक सामग्री की बढ़ती उपस्थिति (विशेषकर बच्चों व किशोरों के लिए) नीतिगत एवं सामाजिक चिंता का विषय बन गई है। 
  • वर्तमान में भारत में ऑनलाइन सामग्री का विनियमन मुख्यतः सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 तथा आईटी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया नैतिकता संहिता) नियम, 2021 के तहत किया जाता है। ये प्रावधान डिजिटल मध्यस्थों और मीडिया प्लेटफॉर्म्स के लिए आचार संहिता व उत्तरदायित्व तय करते हैं।
  • इसके बावजूद सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और ओटीटी प्लेटफॉर्म पर प्रसारित कंटेंट को लेकर बार-बार उत्पन्न होने वाले विवादों ने मौजूदा नियमों की सीमाओं को उजागर किया है। कई मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ी है जिससे यह स्पष्ट हुआ है कि मौजूदा नियामक ढांचा बदलते डिजिटल परिदृश्य के अनुरूप पूरी तरह पर्याप्त नहीं है।
  • इसी पृष्ठभूमि में आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का मसौदा सामने आया है। इसका उद्देश्य डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के लिए अधिक स्पष्ट, विस्तृत एवं प्रभावी सामग्री वर्गीकरण प्रणाली विकसित करना तथा अनुपालन से जुड़े दायित्वों को सुदृढ़ करना है। प्रस्तावित नियम डिजिटल स्वतंत्रता और सामाजिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माने जा रहे हैं।

आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 के मसौदे का कानूनी आधार 

  • आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का मसौदा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 87(1) के अंतर्गत प्रस्तावित किया गया है। 
  • इन प्रस्तावित नियमों को अधिनियम की धारा 67, 67ए और 67बी के साथ संयुक्त रूप से पढ़ा जाना है जो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से अश्लील, यौन रूप से स्पष्ट तथा बाल यौन शोषण से संबंधित सामग्री के प्रकाशन व प्रसारण को नियंत्रित करती हैं।
  • इस नियमावली का प्रस्ताव सर्वोच्च न्यायालय के एक महत्वपूर्ण निर्देश की पृष्ठभूमि में सामने आया है। न्यायालय ने सरकार से डिजिटल प्लेटफार्मों पर सामग्री के नियमन के संदर्भ में दो संवैधानिक मूल्यों के बीच संतुलन स्थापित करने पर जोर दिया था- 
    • अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत नागरिकों को प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
    • अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राज्य को प्राप्त वह शक्ति, जिसके माध्यम से नैतिकता, शालीनता व सार्वजनिक व्यवस्था जैसे आधारों पर युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। 

आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 के मसौदे की प्रमुख विशेषताएँ 

अश्लील सामग्री की परिभाषा 

आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का मसौदा अश्लील सामग्री की परिभाषा तय करने में काफी हद तक केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के अंतर्गत निर्धारित कार्यक्रम संहिता से प्रेरित है। इसके अनुसार, ऐसी कोई भी सामग्री अश्लील मानी जाएगी जो कामुक प्रकृति की हो, कामुक रुचियों को उकसाती हो या दर्शकों को नैतिक रूप से भ्रष्ट व दूषित करने की प्रवृत्ति रखती हो। 

निषिद्ध सामग्री की व्यापक श्रेणियाँ 

  • प्रस्तावित मसौदे में निषिद्ध सामग्री की सूची को पहले की तुलना में कहीं अधिक विस्तृत किया गया है। इसके अंतर्गत ऐसी सामग्री को प्रतिबंधित किया गया है जो—
    • किसी धर्म, समुदाय, जाति या राष्ट्रीयता के विरुद्ध हमला करती हो
    • सांप्रदायिक भावना या हिंसा को बढ़ावा देती हो
    • मानहानिकारक या जानबूझकर भ्रामक जानकारी प्रस्तुत करती हो
    • महिलाओं, बच्चों अथवा दिव्यांग व्यक्तियों को अपमानित या नीचा दिखाती हो
    • अपराध, हिंसा या अश्लीलता को वांछनीय या स्वीकार्य रूप में प्रस्तुत करती हो
    • बच्चों को लक्षित करते हुए अश्लील भाषा, दृश्य या संकेतों का प्रयोग करती हो 
  • इन प्रावधानों के माध्यम से डिजिटल सामग्री की जांच व निगरानी का दायरा उल्लेखनीय रूप से बढ़ा दिया गया है। 

अनिवार्य आयु-आधारित वर्गीकरण प्रणाली

  • मसौदे की एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक विशेषता यह है कि इसमें सभी डिजिटल सामग्री के लिए फिल्म प्रमाणन जैसी अनिवार्य आयु-आधारित वर्गीकरण प्रणाली प्रस्तावित की गई है। इसके तहत सामग्री को निम्नलिखित श्रेणियों में वर्गीकृत किया जाएगा—
    • U : सभी आयु वर्ग के लिए उपयुक्त
    • 7+, 13+, 16+ : आयु-विशिष्ट सामग्री
    • केवल वयस्कों के लिए
    • विशेष पेशेवर दर्शकों (जैसे डॉक्टर, वैज्ञानिक आदि) के लिए निर्धारित सामग्री 
  • प्रत्येक डिजिटल सामग्री के साथ उसकी आयु-रेटिंग के अलावा सामग्री विवरण भी प्रदर्शित करना अनिवार्य होगा, जिसमें यह बताया जाएगा कि उसमें हिंसा, यौन संदर्भ, नग्नता, नशीले पदार्थ, अभद्र भाषा या डरावने दृश्य शामिल हैं या नहीं। 

माता-पिता नियंत्रण और आयु सत्यापन 

  • मसौदा नियमों के अंतर्गत बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को मजबूत करने के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं। इसके अनुसार— 
    • 13 वर्ष या उससे अधिक आयु वर्ग के लिए उपयुक्त सामग्री पर माता-पिता नियंत्रण तंत्र अनिवार्य होगा
    • केवल वयस्कों के लिए उपलब्ध सामग्री के लिए विश्वसनीय आयु-सत्यापन प्रणाली लागू करनी होगी 
  • इन प्रावधानों के कारण ओटीटी प्लेटफॉर्म और सोशल मीडिया मध्यस्थों पर अनुपालन से जुड़े दायित्वों में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। 

प्रयोज्यता और प्रवर्तन व्यवस्था 

  • प्रस्तावित आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 के लागू होने के बाद भी आईटी (मध्यस्थ दिशानिर्देश एवं डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के सभी प्रावधान समानांतर रूप से प्रभावी बने रहेंगे।
  • इसके अतिरिक्त, नए मसौदे के तहत नियमों के उल्लंघन पर नागरिक दंड लगाए जाने की संभावना है जिससे ऑनलाइन क्यूरेटेड कंटेंट प्रोवाइडर्स (OCCPs) की नियामक जवाबदेही अधिक कठोर हो जाएगी।

उद्योग एवं हितधारकों द्वारा उठाई गई प्रमुख चिंताएँ 

  • आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 के मसौदे को लेकर उद्योग जगत और विभिन्न हितधारकों ने कई महत्वपूर्ण आपत्तियाँ व आशंकाएँ व्यक्त की हैं। 
  • इनका मुख्य तर्क यह है कि प्रस्तावित नियम पारंपरिक लीनियर टेलीविजन प्रसारण और ऑन-डिमांड डिजिटल कंटेंट के बीच मौजूद मौलिक अंतर को पर्याप्त रूप से नहीं पहचानते।
  • ओटीटी प्लेटफॉर्म सामान्यतः ‘पुल मॉडल’ पर आधारित होते हैं जहाँ दर्शक स्वयं अपनी पसंद की सामग्री सक्रिय रूप से चुनते हैं। इसके विपरीत, टेलीविजन प्रसारण ‘पुश मॉडल’ पर काम करता है जिसमें सामग्री दर्शकों तक स्वतः पहुँचती है। 
  • आलोचकों का कहना है कि प्रसारण युग के अश्लीलता मानकों को सीधे ऐसे आयु-प्रतिबंधित और पासवर्ड-संरक्षित डिजिटल प्लेटफार्मों पर लागू करना रचनात्मक स्वतंत्रता को सीमित कर सकता है। 
  • इसके अतिरिक्त मसौदा नियमों में प्रयुक्त कई शब्द और परिभाषाएँ अत्यधिक व्यापक व व्यक्तिपरक मानी जा रही हैं। इससे मनमानी शिकायतों, चयनात्मक प्रवर्तन एवं नियामक अनिश्चितता को बढ़ावा मिलने की आशंका जताई जा रही है। उद्योग विशेषज्ञों के अनुसार, इस प्रकार का अस्पष्ट नियामक वातावरण ‘निवेश व नवाचार’ दोनों के लिए बाधक हो सकता है।
  • कुल मिलाकर, ये चिंताएँ भारत की उभरती डिजिटल अर्थव्यवस्था में विनियमन और नवाचार के बीच मौजूद तनाव को स्पष्ट रूप से उजागर करती हैं। 

शासन और समाज के लिए महत्व 

  • इन आपत्तियों के बावजूद प्रस्तावित नियमों के मसौदे में सरकार की कुछ प्रमुख नीतिगत प्राथमिकताएँ भी परिलक्षित होती हैं। सरकार का उद्देश्य स्पष्ट रूप से—
    • बच्चों और अन्य संवेदनशील वर्गों को हानिकारक डिजिटल सामग्री से सुरक्षित रखना
    • विभिन्न डिजिटल और प्रसारण प्लेटफार्मों पर सामग्री वर्गीकरण की प्रक्रिया को मानकीकृत करना
    • अनियंत्रित ऑनलाइन अश्लीलता से जुड़ी न्यायिक चिंताओं और सामाजिक दबावों का समाधान करना 
  • इस प्रकार, आईटी (डिजिटल कोड) नियम, 2026 का मसौदा एक ओर जहाँ डिजिटल स्वतंत्रता और रचनात्मकता पर प्रभाव डालने की आशंकाएँ उत्पन्न करता है, वहीं दूसरी ओर यह समाजिक हितों की रक्षा व डिजिटल शासन को सुदृढ़ करने की दिशा में सरकार के प्रयासों को भी दर्शाता है। 
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