संदर्भ
- भारत के नवीनतम राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-6) के प्रारंभिक निष्कर्षों ने देश में मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य, संस्थागत प्रसव, पोषण और डिजिटल सशक्तिकरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति का संकेत दिया है। हालांकि, इस सर्वेक्षण की तथ्य-पत्रिका (फैक्ट शीट) में कई महत्वपूर्ण संकेतकों को हटाए जाने से नीति विशेषज्ञों और शोधकर्ताओं के बीच गंभीर सवाल भी खड़े हुए हैं।
- केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा 29 मई को जारी एनएफएचएस-6 की फैक्ट शीट वर्ष 2023-24 के आंकड़ों पर आधारित है। सर्वेक्षण के लिए मणिपुर को छोड़कर सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लगभग 6.8 लाख परिवारों से जानकारी एकत्र की गई। प्रारंभिक निष्कर्षों में कई क्षेत्रों में सुधार दर्ज किया गया है, लेकिन रिपोर्ट का दायरा पिछले संस्करण की तुलना में काफी सीमित दिखाई देता है।
संकेतकों की संख्या में पहली बार कमी
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण का इतिहास लगातार विस्तार का रहा है। प्रत्येक नए संस्करण में पुराने संकेतकों को बनाए रखते हुए नए विषयों को जोड़ा जाता रहा है।
- वर्ष 2015-16 के एनएफएचएस-4 में 114 प्रमुख संकेतक शामिल थे।
- एनएफएचएस-5 (वर्ष 2019-21) में इनकी संख्या बढ़कर 131 हो गई थी।
- एनएफएचएस-6 (2023-24) की फैक्ट शीट में केवल 101 संकेतकों को शामिल किया गया है।
विश्लेषण से पता चलता है कि इस बार 43 संकेतकों को हटाया गया है और 13 नए संकेतक जोड़े गए हैं, जिसके परिणामस्वरूप कुल 30 संकेतकों की शुद्ध कमी दर्ज हुई है। यह पहली बार है जब सर्वेक्षण के दायरे में विस्तार के बजाय कटौती की गई है।
किन महत्वपूर्ण संकेतकों को हटाया गया?
- एनएफएचएस-6 से कई ऐसे संकेतक गायब हैं जो वर्षों से सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक विकास की निगरानी का आधार रहे हैं। इनमें;
- एनीमिया,
- नवजात एवं शिशु मृत्यु दर,
- पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर,
- जन्म के समय लिंगानुपात,
- स्वच्छता सुविधाओं की उपलब्धता,
- स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन का उपयोग तथा
- कैंसर स्क्रीनिंग जैसे संकेतक शामिल हैं।
- इन संकेतकों की अनुपस्थिति इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि इनमें से कई सीधे तौर पर सरकार की प्रमुख योजनाओं और विकास कार्यक्रमों की प्रगति को मापने में उपयोग किए जाते रहे हैं।
एनीमिया संकेतक क्यों हटाया गया ?
- सबसे अधिक चर्चा एनीमिया संबंधी आंकड़ों को हटाए जाने को लेकर हो रही है। एनएफएचएस-4 और एनएफएचएस-5 के बीच एनीमिया की स्थिति में लगातार गिरावट दर्ज की गई थी। बच्चों, महिलाओं और गर्भवती महिलाओं - तीनों वर्गों में एनीमिया के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई थी।
- विशेषज्ञों के अनुसार, इस वृद्धि को लेकर लंबे समय से डेटा संग्रहण पद्धति पर सवाल उठते रहे हैं। एनएफएचएस में एनीमिया मापने के लिए उंगली से रक्त का नमूना लेकर पोर्टेबल उपकरण के माध्यम से हीमोग्लोबिन की जांच की जाती थी। कई शोधकर्ताओं का मानना था कि यह पद्धति एनीमिया की वास्तविक स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर दर्शा सकती है।
- इसी कारण एनएफएचएस-6 में एनीमिया से जुड़े प्रश्नों और परीक्षणों को शामिल नहीं किया गया। सरकार का कहना है कि अब एनीमिया और पोषण संबंधी कमियों की निगरानी राष्ट्रीय पोषण संस्थान (NIN) द्वारा संचालित एक विशेष ‘आहार एवं बायोमार्कर सर्वेक्षण’ के माध्यम से की जाएगी, जिसमें नसों से लिए गए रक्त नमूनों का उपयोग किया जाता है और इसे अधिक सटीक माना जाता है।
नए विषयों को भी मिला स्थान
- हालांकि कुछ पुराने संकेतकों को हटाया गया है, लेकिन एनएफएचएस-6 में बदलती सामाजिक और आर्थिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए कुछ नए विषय जोड़े गए हैं।
- प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT),
- स्वयं सहायता समूहों की सदस्यता,
- डिजिटल साक्षरता,
- डिजिटल वित्तीय लेनदेन तथा
- हेपेटाइटिस-बी और हेपेटाइटिस-सी की जांच जैसे विषय शामिल हैं।
- इसके अतिरिक्त बच्चों में हेपेटाइटिस-बी संक्रमण की पहचान के लिए सूखे रक्त नमूनों के संग्रह की व्यवस्था भी की गई है।
- साथ ही, पिछले सर्वेक्षण में हटाए गए जैविक एचआईवी परीक्षण को दोबारा शामिल किया गया है, हालांकि एचआईवी/एड्स (HIV/AIDS) से संबंधित जागरूकता और व्यवहार संबंधी प्रश्नों को किस हद तक बरकरार रखा गया है, यह अभी स्पष्ट नहीं है।
स्वच्छता और उज्ज्वला योजना से जुड़े आंकड़ों की अनुपस्थिति
- देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी ऐसे घरों में रहती थी जहाँ शौचालय की सुविधा उपलब्ध थी। इसी प्रकार 58.6 प्रतिशत परिवार स्वच्छ ईंधन का उपयोग कर रहे थे। ये दोनों संकेतक क्रमशः स्वच्छ भारत मिशन और प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना जैसी प्रमुख सरकारी पहलों की प्रगति को मापने के महत्वपूर्ण माध्यम थे।
- यद्यपि एनएफएचएस-6 में इन दोनों संकेतकों को शामिल नहीं किया गया है, जिससे इन योजनाओं के सामाजिक प्रभाव का आकलन करने के लिए एक महत्वपूर्ण स्रोत कम हो गया है।
मृत्यु दर और लिंगानुपात संबंधी आंकड़ों का अभाव
- नवजात, शिशु और पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु दर जैसे संकेतकों को भी हटा दिया गया है। यद्यपि इन आंकड़ों को सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (SRS) के माध्यम से उपलब्ध कराया जाएगा, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि एनएफएचएस की तरह विस्तृत जिला-स्तरीय और सामाजिक-आर्थिक विश्लेषण वहाँ उपलब्ध नहीं होता।
- इसी प्रकार कुल लिंगानुपात और जन्म के समय लिंगानुपात से जुड़े आंकड़ों का भी अभाव है। जन्म के समय लिंगानुपात लंबे समय से भ्रूण लिंग चयन जैसी सामाजिक चुनौतियों की निगरानी का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है।
स्वास्थ्य और पोषण के क्षेत्र में सुधार के संकेत
इन सीमाओं के बावजूद एनएफएचएस-6 कई क्षेत्रों में सकारात्मक बदलावों की तस्वीर प्रस्तुत करता है।
- कम से कम चार प्रसव-पूर्व जांच कराने वाली महिलाओं की संख्या में लगभग सात प्रतिशत अंकों की वृद्धि हुई है। संस्थागत प्रसव में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे मातृ और शिशु मृत्यु दर में कमी आने की संभावना बढ़ती है।
- महिलाओं में इंटरनेट उपयोग भी तेजी से बढ़ा है, जो डिजिटल समावेशन और तकनीकी पहुंच में सुधार का संकेत देता है। आंध्र प्रदेश में महिलाओं द्वारा इंटरनेट उपयोग का प्रतिशत 21 प्रतिशत से बढ़कर 63.6 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
- घरेलू हिंसा का सामना करने वाली विवाहित महिलाओं का अनुपात भी घटकर 22.3 प्रतिशत रह गया है, जबकि पिछले सर्वेक्षण में यह 29.3 प्रतिशत था।
- इसके अलावा पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में नाटेपन (स्टंटिंग) की दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है, जो बाल पोषण में सुधार की ओर संकेत करती है।
चिंता के बिंदु
जहां कई संकेतकों में सुधार देखने को मिला है, वहीं कुछ महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थिति चिंताजनक बनी हुई है।
- छह माह से कम आयु के बच्चों को केवल स्तनपान कराने की दर में लगभग आठ प्रतिशत अंकों की गिरावट आई है। हरियाणा में यह गिरावट सबसे अधिक दर्ज की गई है।
- आधुनिक गर्भनिरोधक साधनों का उपयोग भी 56.4 प्रतिशत से घटकर 52.7 प्रतिशत हो गया है। इसके अलावा महिलाओं में अधिक वजन और मोटापे की समस्या देश के लगभग सभी राज्यों में बढ़ती दिखाई दे रही है।
निष्कर्ष
- एनएफएचएस-6 भारत के स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक विकास की मिश्रित तस्वीर प्रस्तुत करता है। एक ओर मातृ स्वास्थ्य, संस्थागत प्रसव, डिजिटल सशक्तिकरण और बाल पोषण जैसे क्षेत्रों में प्रगति दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर कई महत्वपूर्ण संकेतकों को हटाए जाने से व्यापक निगरानी और नीति निर्माण की प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं।
- विशेषज्ञों का मानना है कि एनीमिया, मृत्यु दर, लिंगानुपात, स्वच्छता और स्वच्छ ईंधन जैसे संकेतकों की अनुपस्थिति भविष्य में शोध और नीतिगत मूल्यांकन को प्रभावित कर सकती है। ऐसे में यह आवश्यक होगा कि सरकार और संबंधित संस्थान इन आंकड़ों के लिए वैकल्पिक एवं विश्वसनीय स्रोतों को समय पर सार्वजनिक करें, ताकि देश के सामाजिक और स्वास्थ्य विकास की वास्तविक तस्वीर सामने आती रहे।