New
GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM Republic Day offer UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 28th Jan., 2026 GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM Republic Day offer UPTO 75% + 10% Off, Valid Till : 28th Jan., 2026 GS Foundation (P+M) - Delhi : 19th Jan. 2026, 11:30 AM GS Foundation (P+M) - Prayagraj : 09th Jan. 2026, 11:00 AM

टिकाऊ कृषि के चालक के रूप में खादी

(प्रारंभिक परीक्षा: राष्ट्रीय महत्त्व की सामयिक घटनाएँ, भारत का इतिहास और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन)
(मुख्य परीक्षा, सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र- 1 व 3: 18वीं सदी के लगभग मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास- महत्त्वपूर्ण घटनाएँ, व्यक्तित्व, विषय; संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास तथा रोज़गार से संबंधित विषय) 

भूमिका 

  • स्वदेशी और ग्राम स्वराज के गांधीवादी आदर्शों में निहित खादी हाथ से बुने हुए कपड़े से कहीं अधिक का प्रतिनिधित्व करती है। यह आत्मनिर्भरता, श्रम की गरिमा, स्थायी आजीविका और ग्रामीण लचीलेपन का प्रतीक है।
  • आत्मनिर्भर भारत, जलवायु कार्रवाई और समावेशी विकास के समकालीन संदर्भ में खादी कृषि, कुटीर उद्योगों, वहनीयता एवं ग्रामीण रोजगार को जोड़ने वाले एक रणनीतिक साधन के रूप में फिर से उभरी है।

गांधीवादी दर्शन और ग्रामीण आत्मनिर्भरता

  • महात्मा गांधी ने खादी की कल्पना आर्थिक स्वराज प्राप्त करने के एक साधन के रूप में की थी, जिससे गाँव उत्पादन एवं उपभोग की आत्मनिर्भर इकाइयाँ बन सकें।
  • खादी की कताई व पहनाव औपनिवेशिक शोषण के प्रति प्रतिरोध का प्रतीक था, जबकि यह विशेष रूप से कृषि के ऑफ-सीज़न के दौरान घरेलू स्तर पर आजीविका सुनिश्चित करता था। इस दर्शन ने ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं को मजबूत करने और बाहरी बाजारों पर निर्भरता कम करने में खादी की भूमिका की नींव रखी।

संस्थागतकरण और खेत से कपड़े तक संबंध

  • स्वतंत्रता के बाद वर्ष 1957 में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग (KVIC) की स्थापना ने खादी को एक संरचित ग्रामीण विकास साधन में बदल दिया। खादी की मूल्य श्रृंखला सीधे कृषि को कुटीर उद्योगों से जोड़ती है
  • यह खेतों से कपास, रेशम उत्पादन से रेशम, भेड़ पालन से ऊन, कृषि आधारित खेती से जूट जैसे कच्चे माल का प्रयोग स्रोत के रूप में करती है। 
  • यह खेत से कपड़े तक का पारिस्थितिकी तंत्र किसानों, कताई करने वालों, बुनकरों एवं संबंधित श्रमिकों के लिए रोजगार पैदा करता है, स्थानीय संसाधनों का अधिकतम उपयोग करता है और पारंपरिक कौशल को संरक्षित करता है।

खादी-कृषि सहजीवन एवं आजीविका सुरक्षा

  • खादी छोटे एवं सीमांत किसानों के लिए, विशेषकर कृषि के कमजोर समय के दौरान आय विविधीकरण प्रदान करती है। ऑफ-सीज़न में रोजगार प्रदान करके यह आजीविका सुरक्षा को बढ़ाता है और जलवायु आघातों व फसल खराब होने की भेद्यता को कम करता है।
  • महिलाओं को घर-आधारित कताई एवं बुनाई के माध्यम से महत्वपूर्ण लाभ होता है जिससे बड़े पूंजी या प्रवासन की आवश्यकता के बिना आर्थिक स्वतंत्रता व सामाजिक सशक्तिकरण को बढ़ावा मिलता है।

आर्थिक योगदान एवं ग्रामीण रोजगार

  • खादी एवं ग्रामोद्योग एक प्रमुख ग्रामीण आर्थिक इंजन के रूप में उभरे हैं-
    • टर्नओवर (वित्त वर्ष 2024-25): 1.70 लाख करोड़ रुपए 
    • रोजगार: लगभग 1.94 करोड़ लोग (2013-14 में 1.30 करोड़ से बढ़कर)
    • KVIC टर्नओवर (वित्त वर्ष 2023-24): 1.55 लाख करोड़ रुपए
    • बिक्री में बढ़ोतरी: 2013-14 से 400% और उत्पादन में बढ़ोतरी 315%
    • नई नौकरियों का सृजन (पिछले दशक में): 10.17 लाख, जो 81% रोज़गार वृद्धि को दर्शाती हैं।
  • संकट के कारण होने वाले पलायन को कम करके और गाँव की अर्थव्यवस्थाओं को मज़बूत करके खादी GDP वृद्धि, ग्रामीण औद्योगीकरण और किसानों की आय दोगुनी करने के लक्ष्य में योगदान देती है।

नीतिगत समर्थन और सरकारी पहल

  • खादी का कृषि एवं ग्रामीण आजीविका के साथ जुड़ाव प्रमुख योजनाओं के माध्यम से मज़बूत होता है-
  • शहद मिशन: अतिरिक्त आय और बेहतर परागण के लिए मधुमक्खी पालन
  • कुम्हार सशक्तिकरण योजना: कुम्हारों के लिए इलेक्ट्रिक चाक व प्रशिक्षण
  • SFURTI: बुनियादी ढाँचे, कौशल व विपणन के लिए क्लस्टर-आधारित विकास
  • PMEGP: स्वरोज़गार के लिए सूक्ष्म-उद्यमों को बढ़ावा
  • आत्मनिर्भर भारत, मेक इन इंडिया और वोकल फॉर लोकल के साथ तालमेल
  • ये पहलें खादी को पारंपरिक आजीविका व आधुनिक ग्रामीण उद्यमिता के बीच एक पुल के रूप में स्थापित करती हैं।

वहनीयता एवं हरित अर्थव्यवस्था में भूमिका 

  • खादी निम्नलिखित के माध्यम से सतत कृषि एवं जलवायु कार्रवाई का समर्थन करती है-
    • जैविक कपास और प्राकृतिक रेशों का उपयोग
    • प्राकृतिक रंगों, न्यूनतम पानी के उपयोग और निम्न रासायनिक इनपुट जैसी पर्यावरण-अनुकूल प्रथाएँ
    • हाथ से कताई एवं बुनाई के परिणामस्वरूप कार्बन उत्सर्जन नगण्य
    • बिजली पर न्यूनतम निर्भरता से निम्न कार्बन व चक्रीय अर्थव्यवस्था मॉडल का समर्थन 
  • खादी भारत की नेट ज़ीरो 2070 प्रतिबद्धता के साथ जुड़ी हुई है और दिखाती है कि पारंपरिक उद्योग हरित विकास को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं।
  • मोटा अनाज मिशन (श्री अन्न) के साथ एकीकरण जलवायु-स्मार्ट आजीविका को अधिक मज़बूत करता है क्योंकि बाजरा को कम पानी की आवश्यकता होती है और यह पोषण बढ़ाता है तथा शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त है।

खादी का आधुनिकीकरण

  • प्रासंगिक बने रहने के लिए खादी ने नवाचार, डिजिटलीकरण एवं बाज़ार विस्तार में आधुनिकीकरण को अपनाया है-
    • ई-खादी प्लेटफ़ॉर्म कारीगरों को सीधे उपभोक्ताओं को बिक्री करने में सक्षम बनाते हैं
    • सौर चरखा मिशन सौर ऊर्जा से चलने वाली कताई को बढ़ावा देता है
    • डिज़ाइन हस्तक्षेप युवाओं व शहरी बाज़ारों को आकर्षित करते हैं
    • खादी इंडिया एवं वोकल फॉर लोकल के माध्यम से ब्रांडिंग
    • खादी महोत्सव जैसे कार्यक्रम और डिजिटल आउटरीच दृश्यता बढ़ाते हैं
  • विश्व स्तर पर खादी एक सतत एवं नैतिक वस्त्र के रूप में पहचान बना रही है जो पर्यावरण के प्रति जागरूक फैशन की अंतर्राष्ट्रीय माँग के अनुरूप है।

निष्कर्ष

  • खादी सरलता, श्रम की गरिमा और आर्थिक स्वतंत्रता का प्रतीक बनी हुई है जबकि यह सतत जीवन एवं समावेशी विकास का प्रतीक बन रही है। कृषि के साथ गहराई से जुड़ी होने के कारण यह स्थानीय उत्पादन, रोज़गार सृजन एवं पर्यावरणीय प्रबंधन के माध्यम से ग्रामीण लचीलेपन को मज़बूत करती है।
  • जैसे-जैसे भारत अमृत काल और India@2047 की ओर बढ़ रहा है, खादी हरित, समावेशी एवं आत्मनिर्भर विकास की पहचान बन सकती है जिससे भारत नैतिक व टिकाऊ उत्पादन में वैश्विक नेतृत्वकर्ता के तौर पर अपनी जगह बना पाएगा।
« »
  • SUN
  • MON
  • TUE
  • WED
  • THU
  • FRI
  • SAT
Have any Query?

Our support team will be happy to assist you!

OR